ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-३ स्मरणज्ञानात् भिन्नत्वेन बहीरूपतया यदि सोऽर्थो भासेत 'स्मर्यमाणस्य' च यत् 'भासनं' तदेव न स्यात् स्मर्यमाणमेव तत् न स्यात्, अनुभूयमानमेव तत् भवेत् इति यावत् । ननु चैवं कथं स्वलक्षणस्य प्रकाशनम् ? उक्तमेतत्—न इदानीं प्रकाशनम् अपि तु पूर्वकाले एव, तदा चासौ बहिरवभासत । ननु चेदानीं तर्हि किम् ?—विमर्शनम् इति ब्रूमः । ननु प्रकाशनविमर्शनयोः भिन्नकालत्वम् आपतितम् अतः किम् उभयमपि न किंचित् स्यात् अन्योन्यजीवितत्वात् अस्य ?, मैवम्, यस्य हि संवेदनान्येव भिन्नानि तत्त्वम् तस्य इदम् अप्रतिसमाधेयमेव, अस्मद्दर्शने तु भिन्न- काला अपि संविदः तत्कालात्यागेनैव एकताभासनेन स्वतन्त्रः प्रमाता यावदन्तर्मुखतया तावत्यंशे विमृशति तावत् प्रकाशस्य तात्कालिकबहिर्भावावभासो, विमर्शस्य इदानीन्तनान्तर्मुखा स्थितिरेव, एतदेव वेदनाधिकं वेदितृत्वं—वेदनेषु संयोजनवियोजनयोः यथारुचि करणं स्वातन्त्र्यम्, कर्तृत्वं च एतदेव उच्यते घटमहमन्वभूवम् इति वा, स घटः इति वा 'ऐक्यम्' अनुसंधानम् अनुसंधातुरभिन्नम् इति दर्शयितुं यदेव ऐक्यं 'स एव वेदिता' इति सामानाधिकरण्येन दर्शितम् । स्मरण ज्ञान से भिन्न होने के कारण बाहररूप से यदि वह अर्थ स्मरण ज्ञान से भिन्न होकर बाहर में भासित होगा 'स्मर्यमाण' स्मर्यमाण विषय का तो 'भासन' भासित होना होता है, वह स्मर्यमाण विषय हो नहीं होगा, उसे तो अनुभूयमान ही कहा जायेगा । तब फिर स्वलक्षण का प्रकाश कैसे बनेगा ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि प्रकाशन है वह इस समय का नहीं है अपितु पूर्व काल का ही है इस बात को हम पहले कह चुके हैं, तभी यह बाहर में अवभासित होता है। अब शंका करते हैं कि अभी जो वर्तमानकाल में प्रकाशमान हो रहा है वह क्या चीज है ?—यह तो विमर्शन है—ऐसा हम कहते हैं। जब ऐसी बात है तब तो प्रकाशन और विमर्शन में भिन्न- कालत्व आ पड़ेगा; दोनों का भी कुछ अर्थ नहीं है उससे फिर क्या लाभ होगा जब एक दूसरे परस्पर जीवित हैं तो कुछ भी दोनों से होनेवाला नहीं है ? ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जिसका संवेदन ही भिन्न-भिन्न तत्त्व होता है उस बौद्ध के लिए यह अशक्य समर्थन ही है। हमारे शैवाद्वैत दर्शन में तो भिन्न काल के रहते हुए भी संविद्रूप के उस काल को नहीं छोड़ने से ही ऐक्यरूप के आभास होने से स्वतन्त्र प्रभाता माना जाता है, जहाँतक 'संवित्' अन्तर्मुखरूप से रहता है उतने अंश में ही विमर्शन करता है और वहाँतक ही प्रकाश का भी तात्कालिक बाहरी भाव में अवभास होता है, किन्तु विमर्शन की वर्तमानकाल में ही अन्तर्मुखी स्थिति रहती है, यही ज्ञान से अधिक बढ़ा-चढ़ा हुआ ज्ञाता का स्वरूप है एवं ज्ञानों में संयोजन और वियोजन अर्थात् मिलाने-हटाने की जैसी अपनी अभिरुचि है तदनुकूल करना ही स्वातन्त्र्य है, और इसीको कर्तृत्व भी कहा जाता है। या मैंने घट का अनुभव किया, 'वह घट है' ऐसा जो 'ऐक्य' वह अनुसंधानरूप स्वातन्त्र्य है वही ऐक्य अनुसन्धान करनेवाले से अभिन्न है, उसे बताने के लिए जो ऐक्यभाव का अनुसन्धान करनेवाला है 'स एव वेदिता' वही जाननेवाला आत्मा है; ऐसा एक विभक्ति से सामानाधिकरण्य दोनों में बताया गया है। 'एष स' 'यही वह है' इस कथन से जो १. वेदिता = आत्मा ।