भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-४, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ६९ इति । तत्र तु आगमादिमानान्तरानुभूतब्रह्मादिस्वरूपस्मरणपरम्परा अभ्युपायः । 'भासयेत्' इति विधिरूपेण नियोगेन नियमो लक्ष्यते, न भासयति इत्येतत् न, अपि तु भासयत्येव इति । 'स्वकाले' इति स्मरणकाले । 'आमृशन्' इति वेदकभागनिवेशी वर्तमानकाल उक्तः । 'पूर्वाव- भासितं स्वलक्षणम्, इति वेद्यांशस्पर्शी भूतकालो घटाभासस्यापि केवलस्य स्वालक्षण्यापत्ति- हेतुर्दर्शितः । इयदेव स्मृतेः अव्यभिचारि वपुः, अर्थितातिशयात् तु स्फुटत्वम् इति 'अथ' शब्दो द्योतयति । तदेवाह 'अखिलात्मना' इति सर्वाभासमिश्रेण वपुषा इत्यर्थः ॥ २ ॥ ननु एवं स्वलक्षणस्य प्रकाशने भेदेन बहिरस्तदवभासेत । एतदेव हि बहिरवभासनम्— यत् स्वलक्षणप्रकाशनम् इति शङ्काशमनाय निरूपयति— न च युक्तं स्मृतेर्भेदे स्मर्यमाणस्य भासनम् । तेनैक्यं भिन्नकालानां संविदां वेदितैष सः ॥ ३ ॥ भासन है। वहाँ पर तो आगम आदि दूसरे प्रमाणों से अनुभूत ब्रह्मादि स्वरूप का स्मरण-परम्परा उपाय है । 'भासयेत्' इस विधिलिङ् के प्रयोग से मालूम पड़ता है कि—नहीं भासित करता है यह बात नहीं है, अपितु भासन करता ही है। 'स्वकाले' स्मरण काल में। 'आमृशन्' विमर्शन करता हुआ वेदक अंश को बतलानेवाला वर्तमानकाल का प्रयोग कहा गया है। 'पूर्वाभासितं स्वलक्षणम्' वेद्यांश का स्पर्श करनेवाला भूतकाल केवल घटाभास का भी स्वलक्षण आ पड़ेगा; इसका हेतु भी दिखा दिया । इतना ही स्मृति का अव्यभिचारी वपु है, जो कि अभीष्ट वस्तु को अत्यन्त चाहने के कारण उससे भी अधिक स्फुरता आ जायेगी, यह 'अथ' शब्द द्योतित करता है । उसी बात को कहते हैं कि 'अखिलात्मना' समस्त आभास से मिला हुआ शरीर है। क्योंकि परमार्थ अन्धे के समान नहीं होता है ॥ २ ॥ अब शंका करते हैं कि इस प्रकार अपने स्वरूप का प्रकाशन करने पर भेद से वह बाहर की ओर प्रकाशित होगा । क्योंकि यही बाहर का अवभासन है जो अपने स्वरूप का प्रकाशन है । इस शंका के समाधान में उत्तर देते हैं—यह स्मर्ता है वही अनुभव करनेवाला है, भिन्नकाल में होनेवाले ज्ञानों की उस हेतु से एकता है। स्मर्यमाण विषय का स्मृति से भेद हो जाने पर भासित होना उचित नहीं है ॥ ३ ॥ में तो पूर्व प्रमाताओं का जो ज्ञानाभास है उस स्मरण करनेवाले का पूर्व अनुभव से मिला हुआ रहता है और वही इस समय उन्मिलित हो जाता है । यही दोनों में भेद है । १. नियोग का अर्थ आज्ञा है और नियम का आवश्यभाव । क्योंकि मर्यादा ज्ञान आज्ञा करना रूपी है, स्वयं मर्यादा को जानकर दूसरों को उसका ज्ञान कराते हुए आज्ञा करना यही इसका तात्पर्य है, 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' इसमें स्वर्गकाम के लिए यह अवश्य "जुहोति" हवन करना ही है, नहीं तो स्वर्गकाम का पारमार्थिक रूप नहीं रह जायेगा । इसलिए "भासयेत्" इस क्रिया में लिङ् लकार है । २. 'स्मृतेः' इस प्रयोग में पञ्चमी विभक्ति है ।