ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-२ इह स्मृतिकाले तावत् अर्थोऽध्यवसीयते, अन्यथा सुप्तमूर्च्छितकल्पतापत्तेः । एवं च यावत् अध्यवसायोऽर्थस्य तावत् 'अर्थात्' इति सामर्थ्यात् इयत् अभ्युपगन्तव्यम्-यत् सोऽर्थः प्रकाशते, अप्रकाशमानेऽध्यवसाव्येऽध्यवसायोऽन्धप्रायः स्यात् । प्रकाशनं च न तदानीन्तनकालस्य त्यागेन, नापि स्वीकारेण इदम् इत्येवावभासनप्रसङ्गात् तस्मात् अतीतानुभवकालः पूर्वानुभूत- भावस्वालक्षण्याक्षेपकतवेनापेक्षणीयो वेद्यभागे प्रकाशात्मकावभासाभिनिवेशितया, स्मर्तुर्देह- प्राणाद्यवभासकालश्चावलम्बनीयो वेदकभागे विमर्शांशाभिनिवेशित्वेन । आभासमात्रं हि भावस्य स्वरूपं, प्रत्याभासं प्रमाणस्य व्यापारात् । तदेव आभासान्तरव्यामिश्रणया दीपसहस्रप्रभासंमूर्च्छ- नवत् स्फुटीभवति । आभासान्तरव्यामिश्रणाभावेऽपि तु कालाभाससंभेदेनैव स्वालक्षण्यं तस्य आभासस्य करोति-कालशक्तेरेव भेदकत्वात् इति वक्ष्यते । एवं तावत् स्वलक्षणीभावः प्राक्तन- देहाभाससाचिव्याद्युदितकालाभासयोजनया घटाभासस्य इति । तावत्येव वा स्मृतिः आभासान्तरै- रपि व्यामिश्रा अतिस्फुटा । अत्यन्तस्फुटीभावेऽपि तदानीन्तनकालता न त्रुट्यति अन्यसाधारण्येन अनवभासनात् । तथावभासे तु योगिनस्तन्निर्माणमेव । ब्रह्मभाषितादौ तु नैवमेव अवभासनम् स्मृतिकाल में ही स्वलक्षणरूप अर्थ का अध्यवसाय होता है, यह बात न मानोगे तो सुप्त और मूर्च्छित व्यक्ति को जैसे अर्थ का अध्यवसाय नहीं होता है वैसे ही होने लगेगा, और भी जितना अर्थ सम्बन्धी अध्यवसाय होता है उतना अर्थात् अर्थ सामर्थ्य से ही सम्भव हो सकता है यह सभी के लिए स्वीकार करने योग्य होना चाहिए जो वह अर्थ प्रकाशित है, अध्यवसाय का प्रकाश नहीं होने पर प्रायः अन्धे के समान हो जायेगा और प्रकाशन में उस काल का न त्याग करने से, न तो, स्वीकार करने से काम चलेगा केवल 'इदम्' इतना ही कहना पड़ेगा । इस हेतु से अतीत अनुभव काल और पूर्वानुभूतभाव का जो अपना स्वरूप है उसकी वेद्यभाग में अपेक्षा करनेवाले से अपेक्षणीय है प्रकाशरूप में अवभासित होने के अभिनिवेश से स्मर्ता के देह-प्राणादि का अवभासकाल भी वेदक भाग में अवलम्बन करना पड़ेगा, विमर्श अंश का अभिनिवेश होने से आभासमात्र ही भाव का स्वरूप है; क्योंकि प्रत्याभास प्रत्यक्षादि प्रमाण का प्रमाणरूप व्यापार है । वही भावरूप दूसरे आभास के मिल जाने से सहस्र प्रदीप की प्रभा के मिलावट के तुल्य स्फुट हो जाता है । किन्तु दूसरे आभास के न मिलने पर भी कालाभास के पृथक कर देने से ही उस आभास का अपना स्वरूप प्रकट हो जाता है-क्योंकि भेद कराने वाली काल-शक्ति ही है-इस विषय में आगे बताया जायेगा । इस प्रकार पूर्ववर्ती शरीराभास के साथ उदित काल के आभास को जोड़ने से घटाभास का यही अपना लक्षण करना है, तबतक ही स्मृति भी दूसरे आभास के साथ मिली हुई अत्यन्त स्फुट होती है । अत्यन्त स्फुटीभाव होने पर भी उस समय होने वाले काल का स्वरूप नहीं टूटता है; क्योंकि अन्य के सदृश वह अवभासित नहीं होता है । यदि वैसा भासता तो भी वह योगी का निर्माण ही होगा । ब्रह्मा के द्वारा भासित होने वाली वस्तुओ में नया ही १. अर्थ = स्वभाव लक्षण । २. उस काल में होने के कारण ये प्रमातावर्ग सर्वज्ञ कहलाते हैं, अथवा संसारी होते हैं, अनुमान, आगमादि प्रमाणों से आया हुआ उसका विषयप्रकाश अपूर्व रूप से देखते हैं अर्थात् विमर्शन करते हैं उसमें जो ज्ञान का आभास है उसके साथ उस अंश में ही भगवान् की इच्छा से ऐक्यभाव हो जाता है। स्मरण