ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 90, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-४, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ६७ एतदेव स्मृतितत्त्वमुपपादयितुं श्लोकान्तराणि । तत्र यदि कश्चिद्ब्रूयात्—इह स्मृतिर्विकल्पः, न च अनेनार्थः प्रकाश्यते, अर्थासंस्पर्शिनो हि विकल्पाः, अनुभवेन च येन सोऽर्थः प्रकाशतां नीतः स इदानीं कीर्तिमात्रमूर्तिर्जातः, न च सोऽपि स्मृत्या प्रकाश्यते—ज्ञानस्य ज्ञानान्तरेणासंवेद्यत्वात् असत्त्वाच्च—इति अर्थस्य प्रकाशनाभावात् ‘इदं स्मरामि’ इति ज्ञानं भ्रान्तिमात्रमेव—इति पुनरपि आपतितम्—इति, तदा तं प्रति उच्यते— भासयेच्च स्वकालेऽर्थात्पूर्वाभासितमामृशन् । स्वलक्षणं घटाभासमात्रेणाथाखिलात्मना ॥ २ ॥ इसी स्मृतितत्त्व के उपपादनार्थं दूसरे श्लोक भी हैं । उस पर यदि कोई बोले कि—स्मृति विकल्प है, इस विकल्प से अर्थ प्रकाशित नहीं होता, क्योंकि वस्तु का संस्पर्श न करने वाला ही विकल्प कहलाता है । जिस अनुभव से उस अर्थ का प्रकाशन होता है वह उस समय में केवल कीर्तिरूप ही रह गया, अर्थात् विनष्ट हो चुका है, और वह भी स्मृति से प्रकाशित नहीं होता क्योंकि एक ज्ञान दूसरे ज्ञान से नहीं जाना जा सकता है, न रहने के कारण; इसलिए कि अर्थ का प्रकाशन न होने से, “इदं स्मरामि” मैं यह स्मरण करता हूँ—यह ज्ञान भ्रान्तिमात्र है । अतः फिर भी वही बात आ जायेगी, तब उसके प्रति कहा जाता है— [ वह महेश्वर भगवान् चिदात्मा तबतक स्मृति में अर्थ को विकल्पित करता है और ऐसा मानने पर उस अर्थ का पूर्व देश-काल के द्वारा अवच्छेद होने के कारण इसी से देश-काल संकोच वशात् पदार्थ के रूप का परामर्श करता है यही इसका निचोड़ है और परामर्श भी परमार्थरूप ही है अर्थात् दूसरा कोई नहीं है, अप्रकाशमानता रहने पर क्या परामर्श होगा ? वह अप्रकाशित है और परामृष्ट भी है ऐसा बोलना अन्धे का बोलना जैसा ही प्रायः है । परामर्श ही प्रकाशक स्वभाववाला है, स्वभाववाले के न रहने से किसका स्वभाव होगा, इसलिए कहिये—परामर्श हेतु से या परामर्श के उपलक्षण से उस स्वलक्षण का अवश्य रहना मानना पड़ेगा । अर्थात् सामर्थ्य होने से परामर्श के बिना अन्यथा नहीं बन सकता, घटाभास हो अकेला या लाल-पीला, ऊँचा- नीचा, छोटा-बड़ा आदि आभास के सम्बन्ध से या वह सब पूर्वाभास से युक्त होकर बहुत प्रकाश से भासित होता है, सब कुछ वह देश-काल के आभास के भेद से अपना स्वरूप ही है । यदि तुम कहो कि पूर्व वाला ही अर्थ प्रकाशित होता हो, तो उस अनुभव से कौन सा भेद है, कौन इस प्रकार कहता है कि प्रकाशित होता है । अरे ! वह प्रकाशित होता है वही पूर्व का काल इसके वेद्य को स्वीकार करनेवाले अवभास अंश में अपने लक्षण का कारण है और इस समय में भी स्मर्ता के देह, प्राण आदि से होनेवाला वर्तमान काल विमर्श भाग में भासता है, यही दोनों काल का स्पर्शन उस विमर्श का हेतु है । ] स्मृति काल में अर्थ सामर्थ्य से युक्त होकर पूर्व अवभासित स्वलक्षणरूप अर्थ को विमर्शन करता हुआ अखिलाभास से मिश्रित वपु केवल घटाभासतया भासित होगा ॥ २ ॥