भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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७८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-८ अत्र अयं-शब्देन प्रत्यक्षायमाणत्वमुक्तम् । तत्र अन्त्ये विकल्पे दर्शनस्य पृथक् परामर्श एव नास्ति इति का तत्र इदन्ताशङ्का । ततश्च पारिशेष्यात् अहन्तया तस्य अत्रास्ति परामर्शः, तदभावे विकल्पस्य निमीलिताक्षेऽपि भावात् स्वयमर्थास्पर्शं स्फुटतमविषयपर्यवसितः कथमध्यवसायो भवेत् । आद्ये तु दर्शनं परामृष्टमपि अस्मदर्थान्तर्भूतम् अहंभावास्पदम् अवसातरि विश्रान्तं स्वप्रकाशमेव परामृष्टम् इति विकल्पोऽपि न बोधान्तरबोध्यतां बोधयति बोधस्य । अवसायः अवसा, समवेतंम् इति अपृथग्भावमाह । अवसातरि इति स्वतन्त्रेऽन्तर्मुखे बोधात्मनि अहन्तास्पदे इत्यर्थः । दर्शनम् इति निर्विकल्पकमनुभवनम् । उपलक्षणं चैतत्—विकल्पस्मृत्यादेरपि, ज्ञानस्य ज्ञानान्तरेण परामर्शे हि अयमेव न्यायः । विकल्पयाम्यहं, स्मराम्यहम्, विकल्पितं मया, स्मृतं मया इति अहन्तारूढचैव विकल्पादेः अवभासात् । अत एव आत्मनोऽमी विकल्पाद्याः शक्ति- विशेषाः तद्विश्रान्तशरीरत्वात् इति दर्शितम्, ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान्, इत्यत्र ॥ ७ ॥ एवमियतः प्रमेयस्य यत्फलं तदुपसंहर्तुमाह— तन्मया दृश्यते दृष्टोऽयं स इत्यामृशत्यपि । ग्राह्यग्राहकताभिन्नावर्थौ भातः प्रमातरि ॥ ८ ॥ 'तत्' इति तस्मादर्थे पूर्वोक्तस्य प्रमेयस्य हेतुभावेन उपजीवनम् इह सूचयति । यत एवमुक्तम्—अनुभवस्य अर्थस्येव स्मरणात् न भेदेन अवभासः, स्मृतिशक्तिश्च परमेश्वरस्यैव, तत परामर्श होता है, यह घट है इसमें अलग परामर्श नहीं है इसमें कहां इदन्ता की शंका उठती है, इसलिए यहाँ पर भी अहन्तारूप से ही उसका परामर्श है, नहीं तो उसके अभाव में विकल्प के दब जाने पर भी भाव से स्वयं विषय का स्पर्श नहीं होने से, निश्चित दबा हुआ अध्यवसाय कैसे होगा । 'अहं पश्यामि' इस प्रथम ज्ञान में परामृष्ट होता हुआ भी 'अस्मत्' शब्द के भीतर अर्थ रहता है अहंभाव का स्थान अध्यवसाय करनेवाले में बैठे हुए को अपने प्रकाश का ही मैंने परामर्श किया था, इस विकल्प से भी ज्ञान अन्य ज्ञान को न जानने में समर्थ नहीं होता, अवसाय को अवसा कहते । 'अवसातरि' स्वतन्त्र अन्तर्मुख रहनेवाला बोधात्मा अहन्ता का 'आस्पद' स्थान है—ऐसा अर्थ होता है । दर्शन का अर्थ यह है कि निर्विकल्पक अनुभव और यही विकल्प स्मृति आदि का भी उपलक्षण है । ज्ञान का अन्य ज्ञान से परामर्श करने में भा यही युक्ति है । मैं विकल्प करता हूँ, मैं स्मरण करता हूँ, मैंने विकल्प किया, मैंने स्मरण किया, इस प्रकार अहन्ता-प्रधान ही विकल्प का भास होता है । अत एव ये विकल्पादि शक्तिविशेष अपने ही हैं; क्योंकि परामर्श का स्वरूप अहन्ता में लीन रहता है । ज्ञान, स्मृति और अपोहन-शक्ति का इसमें निर्देश किया गया है ॥ ७ ॥ इस प्रकार इतने से प्रमेय का जो फल दिखाया है, उसके उपसंहार करने के लिए अब कहते हैं [ चित्त्व ही ज्ञानादि शक्तिवाला है, स्मरण और अनुभव एक ही संविद्रूप है इतना अर्थात् आ जाता है । समस्त माय़ीय ग्राह्य-ग्राहक शुद्ध संविद्रूप से अवभासित होते हैं ।] वह मुझसे देखा जाता है, यह मुझसे देखा गया । वह यही अनुभव करता भी है । प्रमाता में ग्राह्य और ग्राहकता के भेद से अर्थ भासता है ॥ ८ ॥ 'तत्' इसलिए अर्थ में पहले कहा हुआ प्रमेय का हेतुभाव से उपजीवन को यहाँ पर