ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 102, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-४, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ७९ इदमत्र परिनिश्चितं तत्त्वम् इति । इह स्मृतिः अनुभवं क्रोडीकरोति इत्युक्तम् । अनुभवश्च द्विधा, —परामर्शभेदात् कदाचित् स्वात्मपरामर्शपूर्वकम् अनुभाव्यम् आमृशति यत्र अस्य अभिसन्धिप्रधानता 'मया दृश्यते' इति, कदाचित् अनुभवनीयमेव प्रधानतया परामृशति यत्र अनभिसन्धैरेव सहसा वस्तूपनिपातः, अर्थक्रियां प्रति आग्रहविशेषो वा 'अयम्' इति, तत्रापि च प्रकाशपरामर्शोऽस्त्येव, अन्यथा प्रकाशाद्योगात् । एवमुभयथानुभवे प्रत्येकं स्मृतिरपि द्वयपरा- मर्शमयी उदेति इति चत्वारः स्मरणभेदाः, द्वौ अनुभवभेदौ अनुसन्धानरूपं प्रत्यभिज्ञानमपि एतदुभयमेलनात्मकम् अत्रैवान्तर्भूतम् । तच्च एतद्भेदात् अष्टधा, पूर्वापरविश्रान्तिकृतात् प्रत्येकं द्विधाभेदाच्च षोडशधा । तदेते द्वाविंशतिः संवेदनभेदाः । तेषु च ग्राह्यं तावत् प्रकाशात् अबहिर्भूतम् अन्यथा प्रकाशनायोगात्, बहिर्भूतं च तत् अन्यार्थत्वात्सम्भवात्, न च तत एव, तदैव, तदेव पृथग्भूतं अत्र पृथग्भूतं च भवति इति नूनमन्यः कल्पितप्रकाशात्मा कश्चित् अत्र अर्थोऽस्ति, यतोऽयम् अर्थराशिः पृथग्भवन् अन्योन्यमपि पृथक्ताम् अधिगच्छेत्, अन्यथा प्रकाशाभिन्नानां परस्परमपि कथङ्कारं पृथग्भावो भवेत् । सोऽयं वेद्यैकदेश एव, विच्छिन्न एव अनुज्झितवेद्यभाव एव, अहम् इति विच्छेदशून्योचितेन परामर्शन परामृष्य मानो मायाप्रमाता इति वक्ष्यते,— 'देहे बुद्धौ, .........। ( १.६.४ ) इत्यत्र । स च ग्राहकः इति उच्यते । एवं सममेव स्वात्मनि
ग्रन्थकार सूचित करता है। क्योंकि ऐसा कहा हैं—अनुभव का पदार्थ के जैसा स्मरण होता है, भेद से भान नहीं होता और स्मृति परमेश्वर की ही शक्ति है, इसलिए इतना ही यहाँ पर निष्कर्ष है । स्मृति अनुभव को अपने में लीन कर लेती है यही कहा गया है । और अनुभव दो प्रकार का हैं—परामर्श भेद से कभी-कभी अपने को परामर्श करता हुआ [ अनुभव का विषय ] अनुभाव्य को परामर्श करता है जहाँ पर प्रमाता का परामर्श प्रधान रहता है 'मया दृश्यते' इस प्रयोग में तो प्रमाता प्रधान है, कभी अनुभव के विषय को प्रधान करके जहाँ पर प्रमाता का परामर्श न कर सहसा पदार्थ की ही उपस्थिति रहती है, अथवा अर्थक्रिया के प्रति आग्रहविशेष होता है जिसको 'अयम्' कहा जाता है और वहाँ पर भी प्रकाश का परामर्श रहता ही है, नहीं तो प्रकाश का योग ही नहीं बैठेगा । एवं दोनों प्रकार से अनुभव में प्रत्येक स्मृति भी दोनों को परामर्श करनेवाली उदित होती है इस तरह चार स्मरण भेद हो जाता है, पहला और बाद का मिला देने से प्रत्येक में दो-दो होने के कारण सोलह भेद हो जाते हैं ! [ मेरे द्वारा यह घट देखा गया ] इस प्रकार बाईस से संवेदन ज्ञान के भेद होते हैं और उनमें ग्राह्य है वह तो प्रकाश के अन्तर्भूत ही है अर्थात् प्रकाश से भिन्न नहीं है, नहीं तो, प्रकाश से योग नहीं बैठेगा और यदि उसमें अन्तर्भाव नहीं मानते हो, तो उसका प्रकाशरूप अर्थ संभव नहीं हो सकेगा और उससे ही नहीं होता है, वही है, वही अलग होकर ग्राह्य से अलग भी रहता है निश्चय ही कोई दूसरा कल्पित प्रकाशात्मा पदार्थ है, जिससे यह अर्थसमूह अलग होता हुआ आपस में भी भेद को प्राप्त करेंगे अन्यथा प्रकाश से अभिन्न होंगे तो आपस में कैसे अलग भाव होगा, इस प्रकार वह इस वेद्य का एक अंग है, जिसका वेद्यभाव नहीं छूटा है; ऐसा विच्छिन्न ही है, 'अहम्' ऐसा विच्छेद से रहित होकर यह उचित परामर्श के साथ परामर्श किया गया माया प्रमाता है—इसी को आगे कहेंगे, देहे बुद्धौ ...... । ( १.६.४ ) और वह ग्राहक है ऐसा उसे कहा जाता है । इस प्रकार समानरूप से स्वच्छ दर्पण के सदृश विमल स्वात्मा में जो कि दोनों अपने रूप से भिन्न