भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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८० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१ विमलमुकुरस्थानीये यत् युगलकं स्वस्मात् प्रकाशरूपात् अव्यतिरिक्तम् अवभासयति परमेश्वरः तदेव एतत् भगवतो ज्ञानकर्तृत्वं, स्मरणकर्तृत्वं, ज्ञानशक्तिस्मृतिशक्तिरूपम् उच्यते इति तात्पर्यार्थः । अक्षरार्थस्तु—मया दृश्यते इति, अयम् इति च यत् आमृशति प्रमाता प्रकाशरूपो येन अनुभवति इति उच्यते, तत आमर्शनात् एतत् लक्ष्यते, ग्राह्यरूपेण ग्राहकरूपेण योजितौ घटादि- देहादिस्वभावौ अर्थौ वेद्यौ प्रमातरि विशुद्धप्रकाशरूपे भातः प्रकाशेते । एवं दृष्टः इति स इति च यत् परामृशति प्रकाशरूपः प्रमाता, यतोऽसौ स्मरति इति व्यपदेश्यः, ततोऽपि एतदेव लक्ष्यते । अनुभवरूपोपजीवित्वं पूर्वोक्तं द्रढयितुं प्रसङ्गात् अत्र ज्ञानशक्तेरपि उन्मीलनं कृतम् । लक्षणे शत्रादेशः । अपि-शब्दश्चार्थे । अर्थ-शब्दो विच्छिन्नवेद्यवाची । ग्राहको मायीयः कल्पितः प्रमाता अशुद्धप्रकाशस्वभाव इति ॥ ८ ॥ आदितः श्लो० ॥ ३१ ॥ श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां प्रथमे ज्ञानाधिकारे स्मृतिशक्तिनिरूपणं नाम चतुर्थमाह्निकम् ॥४॥ अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे ज्ञानशक्तिनिरूपणाख्यं पञ्चममाह्निकम् महागुहान्तर्निमग्नभावजातप्रकाशकः । ज्ञानशक्तिप्रदीपेन यः सदा तं स्तुमः शिवम् ॥ एवं तावत् स्मृतिशक्तेः स्वरूपं प्रतिपादितम्, अधुना तदुपजीवनीयज्ञानशक्तिपरामर्श- निर्णयं वितत्य, 'वर्तमानावभासानाम्' इत्यादिकया, 'सक्रमं प्रतिभासते' इत्यन्तया श्लोकैकविंशत्या नहीं है परमेश्वर प्रकाशित होता है वही भगवान् का ज्ञानकर्तृत्व, स्मरणकर्तृत्व है ज्ञान-शक्ति एवं स्मृति-शक्तिवाला ही कहा जाता है इसका यही भावार्थ है । अब अक्षरार्थ बताते हैं—मुझसे देखा जाता है, ऐसा जो प्रकाशरूप प्रमाता परामर्श करता है जिससे कि अनुभव करता है, ऐसा कहा जाता है इस परामर्श से यह लक्षणा द्वारा लक्षित होता है, ग्राह्य और ग्राहक ये दोनों रूपों से घटादि और देहादि स्वभाववाले दोनों पदार्थ वेद्य होकर विशुद्ध प्रकाशरूप प्रमाता में प्रकाशित होते हैं । इस प्रकार से देखा गया है ऐसा ही वह प्रकाशरूप प्रमाता परामर्श करता है, जिससे कि वह स्मरण करता है—ऐसा कहा जाता है, इसीसे यह ग्राह्यरूप से बोधित होता है । अनुभवरूप उपजीवन के विषय में पहले कह चुके हैं उसी को प्रसंग से दृढ़ करने के लिए ज्ञान-शक्ति का भी प्रकाश किया है। लक्षण में 'शतृ' प्रत्यय का आदेश करना चाहिए । 'अपि' शब्द 'चकार' के अर्थ में पढ़ा गया है । अर्थ शब्द विच्छिन्न वेद्य- विषयवाची है । ग्राहक शब्द का यह अर्थ है कि मायीय कल्पित अशुद्ध प्रमाता है ॥ ८ ॥ ॥ चतुर्थ आह्निक समाप्त ॥ जो महा गुहा के अन्तर में निमग्न पदार्थसमूह को ज्ञान-शक्तिरूप प्रदीप से प्रकाशित करने वाले हैं, उस शिव की हम स्तुति करते हैं । इस प्रकार स्मृति-शक्ति के स्वरूप का प्रतिपादन कर दिया, सम्प्रति उस स्मृति-शक्ति का उपजीवनीय आधार ज्ञान-शक्ति है उसके परामर्श का निर्णय विस्तारपूर्वक कर 'वर्तमानावभासानाम्'