ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 104, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-५, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ८१ निरूपयति । तत्राद्येन श्लोकेन वस्तुनि प्रतिज्ञां करोति, एवंभूता ज्ञानशक्तिः इति, ततः श्लोक- द्वयेन प्रकाश एवार्थानां स्वरूपम् इत्याह । ततो द्वयेन प्रकाशबाह्यानामर्थानां सद्भावं विज्ञान- वादोपगतवासनादूषणेन दृढीकतम् आशङ्क्य, तृतीयेन तदनभ्युपगमेऽपि तावत् न किञ्चित् उपरुध्यत इति दर्शयति । अथ श्लोकेन स्वदर्शनेऽर्थतत्त्वम् उपदर्शयन् बाह्यार्थसद्भावे प्रत्यक्षं निराकरोति प्रमाणत्वेन । ततो द्वयेन अनुमेयतामपि बाह्यस्य निरस्यति । अनन्तरं श्लोकेन चिदात्मनि अर्थानाम् अवश्यं सद्भावः परामर्शत्मना इति प्रकटयति । ततोऽपि प्रकाशस्य प्रमातृरूपस्य प्रत्यवमर्श एव जीवितम्, इति श्लोकचतुष्टयेन अनुभवागमन्यायस्वरूपनिरूपणाभिः अभिधत्ते । अनन्तरं ज्ञानपरामर्श एव ज्ञेयं शुद्धं प्रमातृरूपतानु ज्ञप्तं च प्रथयति इति तस्यैव प्रधानत्वे न्यायं श्लोकत्रयेणाह । प्रकाशैकरूपत्वे च ज्ञानज्ञात्रादि भिन्नम् इति श्लोकेनाह । ततो ज्ञातरि इव विशुद्धे ज्ञानेऽपि अविकल्पकसविकल्पकरूपे विमर्श एव प्राणितम् इति श्लोकद्वयेनाह । ततो ज्ञातुर्ज्ञानस्य च पूर्वपक्षे दूषितं यत् भिन्नत्वं तत् उपसंहारदिशा श्लोकेन समर्थयते, इति तात्पर्यम् आह्निकस्य । श्लोकार्थस्तु निरूप्यते । ननु स्मरणविकल्पादीनाम् अनुभव एव जीवितम्, तत्र यदि भेदेन आभासन्तेऽर्थाः, तत् तेष्वपि तथैव अवभास उचितः, नो चेत् अन्यथा तदनुभव एव तावत् ज्ञानशक्तिरूपो विचारणीय इति आशयेनाह— वर्तमानावभासानां भावानांमवभासनम् । अन्तःस्थितवतामेव घटते बहिरात्मना ॥ १ ॥ इस श्लोक से उठाकर 'सक्रमप्रतिभासते' यहाँतक इक्कीस श्लोकों से निरूपण करेंगे । पहले श्लोक से ज्ञानशक्तिविमर्शरूप वस्तु में ऐसी ज्ञान-शक्ति रहती है यह प्रतिज्ञा करते हैं, दो श्लोकोंसे प्रकाश ही अर्थ का स्वरूप है इस बात को कहेंगे । इसके बाद दो श्लोकों से बाहर में होनेवाले अर्थों के सद्भाव को विज्ञानवाद से प्राप्त वासना दोष से दृढ़ किये हुए को आशंका कर तीसरे श्लोक से उसको न मानने पर भी हमारी कुछ भी हानि नहीं होगी, यही बतायेंगे । अनन्तर एक श्लोक से अपने दर्शन में पदार्थतत्त्व के स्वरूप को दिखाते हुए बाह्य अर्थ के सद्भाव में प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है ऐसा खण्डन करेंगे । तब दो श्लोकों से बाह्य पदार्थ का अनुमान भी निरस्त करेंगे । इसके बाद एक श्लोक से चिदात्मा में अर्थों का परामर्शरूप से सद्भाव अवश्य रहता है यह प्रकाशरूप प्रमातृरूप का प्रत्यवमर्श ही जीवन है, पश्चात् चार श्लोकों से अनुभव, आगम न्याय के स्वरूप को, निरूपण द्वारा कहेंगे । अनन्तर तीन श्लोकों से ज्ञान परामर्श में प्रमातृरूपता को न छोड़कर शुद्ध ज्ञेय का विस्तार करेंगे, उसकी प्रधानता में ही न्याय 'युक्ति' बतायेंगे और एक श्लोक से प्रकाश की एकरूपता में ज्ञान, ज्ञातादि भिन्न है—ऐसा कहेंगे । दो श्लोकों से ज्ञाता की तरह विशुद्ध ज्ञान में भी निर्विकल्पक और सविकल्पकरूप विमर्श ही जीवन है—इसको कहेंगे । एक श्लोक से ज्ञान और ज्ञाता में पूर्वपक्षी ने पहले भिन्नता दिखाकर दोष दिया था उसका उपसंहार करते हुए समर्थन करेंगे, इस आह्निक का यहो तात्पर्य है । अब श्लोक के अर्थ का निरूपण करते हैं । अब प्रश्न करते हैं कि अनुभव ही स्मरण विकल्पादि का 'प्राण' जीवन है, यदि उसमें पदार्थ भेद से आभासित होते हैं, तो उन अनुभव स्मरणादि विकल्पों में भेद से ही अवभास होना ११