भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 343 में से

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८२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-२ वर्तमानत्वेन स्फुटतया अवभासनम् इदमित्येवमाकारं येषां तेषाम्, यदेतत् बहिरात्मना— कल्पितमायीयशून्यादिशरीरान्तप्रमातृपृथग्भावेन हेतुना भिन्नानां, ततो मायाप्रमातुः विच्छिन्नानाम् 'अवभासनम्' तत् परमार्थप्रमातरि शुद्धचिन्मये 'अन्तःस्थितवतां' तेन सह ऐकात्म्यम् अनुज्झित- वतामेव 'घटते' प्रमाणेन उपपद्यते, तेन अनुज्झितसंविद्भेदस्य भावस्य कल्पितप्रमात्रपेक्षया भेदेन प्रकाशनं भगवतो ज्ञानशक्तिरित्युक्तं भवति ॥ १ ॥ प्रमाणेनोपपद्यते, इत्युक्तं तत् प्रमाणं दर्शयति— प्रागिवार्थोऽप्रकाशः स्यात्प्रकाशात्मतया विना । न च प्रकाशो भिन्नः स्यादात्मार्थस्य प्रकाशता ॥ २ ॥ अर्थो नीलादिः, तस्य नीलादिरूपतैव यदि प्रकाशमानता न पुनरपरा काचित् अर्थशरीरो- त्तीर्णा प्रकाशामता तर्हि यथा सर्वान् प्रति नीलमेव तत्सम्भावनया भण्यते, न कञ्चित् वा प्रति, वस्तुतो वा स्वात्मन्येव तत् नीलं परस्य परिनिष्ठितानुपपत्तेः, स्वात्मनि वा न नीलं न अनीलम् प्रकाशानुग्रहेण विना व्यवस्थानायोगात् । तथा प्रकाशमानतापि अस्य सर्वान् प्रति न कञ्चित् उचित है, यदि ऐगा नहीं मानते हो तो अनुभव का ही पहले ज्ञान-शक्ति के रूप से विचार करना पड़ेगा, इस अभिप्राय से कहते हैं— वर्तमानरूप में अवभासित होनेवाले पदार्थों का ही बाह्यरूप से अवभासित होना घटता है ॥ १ ॥ जिनका देश-काल के आभास से विशिष्ट होकर वर्तमानकाल में भिन्न-भिन्न रूपों से भासित होना ही 'आकार' स्वरूप है उन स्फुटरूप का बाहरी रूप से कल्पित मायीय प्रमाता के भीतर भिन्नभाव से भिन्न हुए का कारण से भासित होना है, इसी कारण माया-प्रमाता से भिन्न होकर भासता है 'अवभासनम्' जो कि मायीय-प्रमाता में भासित हुआ था अर्थात् अविच्छिन्न हुआ था, वही शुद्धचिन्मय प्रमाता में 'अन्तःस्थिताम्' भीतर रहकर उसके साथ एकता को प्राप्त कर न छोड़ते हुए 'घटते' प्रकाश को अपने में बनाये रखता है अर्थात् एकता की स्थिति के प्रमाण से प्रमाणित होता है, इसलिए संविद्रूप भेद को न त्यागनेवाले भाव का कल्पित प्रमाता को अपेक्षा भेद से प्रकाशित होना ही तो भगवान् महेश्वर की ज्ञान-शक्ति है । यही सारांश निकलता है ॥ १ ॥ प्रमाण से प्रमाणित होता है, ऐसा जो कहा है—उस प्रमाण को दिखाते हैं— पूर्वरूप के बने बिना तो पूर्व की तरह पदार्थ अप्रकाशित ही रहेगा, अपने स्वरूप की प्रकाशरूपता प्रकाश से भिन्न नहीं हो सकती है ॥ २ ॥ जो अर्थ है वह नीलादि पदार्थ है, यदि इसकी नीलादिरूपता ही प्रकाशमानता है, तब तो परमार्थवपु से हटी हुई प्रकाशमानता नहीं हुई । जैसा कि सबके लिए यह नील है इस सम्भाववा से कहा जाता है अथवा किसी के प्रति नहीं भी है, यह कहा जाय, वस्तुतः अपने में ही वह नील है दूसरे में इसकी सत्ता नहीं बन सकती, या अपने में नील नहीं है, अनील नहीं है, प्रकाश के अनुग्रह बिना व्यवस्था का योग नहीं बैठ सकता है तथा प्रकाशमानता भी सबके लिए या किसी के लिए नहीं है, अपितु अपने में है या अपने में भी नहीं है, इससे जगत् में अन्धकार फैल जायेगा । इसलिए

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