भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

अ.-१, आ.-५, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ८३ वा प्रति अपि तु स्वात्मन्येव, स्वात्मन्यपि वा न स्यात् इति अन्धता जगतः। अथ इन्द्रियालो- कादिक्षणवर्गात् प्रकाशरूपोऽसौ नीलक्षणो विशिष्ट एव जातः, एवमपि स एव प्रसङ्गः, प्रकटता- वादेऽपि अयमेव दोषः, सर्वथा अर्थशरीरविश्रान्तः चेत् प्रकाशो मम अवभासते इति प्रमातृलग्नतया प्रकाशस्थितिः दुरुपपादा। प्रमाता हि तदानीम् इन्द्रियार्थमयोऽर्थरूपस्य प्रकाशस्य कारणं भवेत्, बीजमिव अङ्कुरस्य। न च अङ्कुरो बीजापेक्षोऽङ्कुरात्मा, ततो यदि न प्रकाशात्मा स भवेत् 'प्रागिव' ज्ञानोदयात् पूर्वं यथा सोऽप्रकाशः, तथा ज्ञानोदयेऽपि स्यात्। ननु ज्ञानम् अर्थप्रकाश- रूपमेव, तत् कथं ज्ञानस्य उदयानुदययोः अर्थस्य तुल्यता स्यात्। स्यात् एतत् यदि उपपद्येत, यावता अर्थात् भिन्नं यत् ज्ञानं प्रकाशरूपं, तत् अर्थस्य सम्बन्धितया कथं स्यात्। यदि तावत् अर्थः प्रकाशते, इत्येवंभूतं ज्ञानस्य स्वरूपं तत् अर्थज्ञानयोः अभेद एवायाततः—अर्थस्वभावस्य ज्ञानत्वेन उक्तत्वात्, अर्थस्वभावत्वे च प्रकाशस्य अर्थात्मतायाम् उक्तं दूषणम्। अथ अर्थं प्रकाश- यति इति ज्ञानस्य स्वरूपम्, तर्हि प्रकाशमानमर्थं करोति ज्ञानम् इति आपतिते पुनरपि स एव दोषः। कृतप्रतानश्च अयं प्रकृत्यर्थण्यर्थविवेको मयैव भेदवादविदारणे इति तत एव अन्वेष्यः। तस्मात् भिन्नः प्रकाशोऽर्थस्य सम्बन्धी भवति इति सम्भावनैव नास्ति। अतश्च इदम् उपपत्त्या आयातम्—अर्थस्य स्वरूपं प्रकाशमानत्वं प्रकाशाभिन्नत्वम् इति। प्रकाशश्च यदि घटेऽन्यः पटेऽन्यः तदा अनुसन्धानस्य अयोगः—द्वयोः प्रकाशयोः स्वात्ममात्रपर्यवसानात् इति वितत्य उपपादितं इन्द्रिय आलोकादि क्षण समूह से प्रकाशरूप नीलक्षण [ प्रकाशमान घटरूप ] विशिष्ट ही हो गया, इस तरह भी वही प्रसंग उपस्थित होगा, [ कौमारिलों के मत ] प्रकटतावाद में यही दोष आ जायेगा, सब प्रकार से यदि अर्थ-शरीर में विश्रान्ति मानोगे तो मुझे प्रकाश भासित होता है इस प्रकार प्रमाता में प्रकाश की स्थिति नहीं सिद्ध कर सकते हो; क्योंकि उस समय प्रमाता ही इन्द्रिय और पदार्थ से युक्त होकर अर्थरूप प्रकाश का कारण बनेगा, जैसे अंकुर का कारण बीज होता है और अंकुर बीज की अपेक्षा किये बिना अंकुरत्व प्राप्त नहीं कर सकता, यदि वह प्रकाशात्मा नहीं होता तो ज्ञान के उदय के पूर्व जैसे अप्रकाशित था--उसी प्रकार उदय होने पर भी अप्रकाशित ही रहता। अब प्रश्न करते हैं कि ज्ञान को भी अर्थप्रकाशवाला ही मान लिया जाय, वह ज्ञान के उदय और अनुदय होने पर अर्थ की समानता कैसे करता। यदि वह कर सकता था तब तो ठीक ही होता, जबतक अर्थ से भिन्न ज्ञान प्रकाशरूप है तबतक अर्थ के सम्बन्धी होकर कैसे रहेगा। प्रथम पक्ष में यदि अर्थ का प्रकाश होता है, ऐसा ही यदि ज्ञान का रूप है तो अर्थ और ज्ञान में अभेद ही हो गया; क्योंकि अर्थस्वभाव को ज्ञानत्वरूप से कह दिया है और अर्थस्वभाव में प्रकाश का अर्थरूप हो जाने में भी पूर्वोक्त दोष बता दिया है, तृतीय पक्ष में यदि ज्ञान का स्वरूप अर्थ को प्रकाशित करता है, ज्ञान अर्थ को प्रकाशमान करता है पुनः भी यही दोष आ पड़ेगा और इसका अच्छी तरह विस्तार भी कर दिया है—जो यह प्रकृत्यर्थ और ण्यर्थ [ प्रकाशते और प्रकाशयति ] का विचार मैंने भेदवाद खण्डन में कर दिया है इसलिए वहाँ पर ही खोजना होगा। अतः भिन्न अर्थ का प्रकाश अर्थ का सम्बन्धी होता है ऐसी शंका भी नहीं करनी चाहिए। अतः उपपत्ति से यही सम्पन्न हुआ कि अर्थ का स्वरूप प्रकाशमानत्व प्रकाश से अभिन्न है और प्रकाश यदि घट में दूसरा और पट में दूसरा ही है तो फिर अनुसन्धान योग नहीं बन पायेगा; क्योंकि दोनों प्रकाशों को