भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

८४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-३ 'नश्येत् जनस्थितिः' इत्यत्र। तस्मात् एक एव प्रकाशः। एतदेव आवृत्त्या दर्शितं 'न च प्रकाशो भिन्नः स्यात्' इति ॥ २ ॥ व्यतिरिक्तस्य ज्ञानस्य अर्थप्रकाशरूपताम् अभ्युपगम्यापि बाधकान्तरमाह— भिन्ने प्रकाशे चाभिन्ने संकरो विषयस्य तत् । प्रकाशात्मा प्रकाश्योऽर्थो नाप्रकाशश्च सिद्ध्यति ॥ ३ ॥ यदि अर्थात् अन्य एव ज्ञानात्मा प्रकाशः अत एव भिन्नोऽर्थतः, र्तहि स्वात्मनि तस्य प्रकाशमात्ररूपत्वात् अभेद एव । तथाहि नीलस्य प्रकाशः, पीतस्य प्रकाशः इति यो नीलांशः पीतांशश्च, स तावत् ज्ञानस्य स्वरूपम् भेदवादत्यागापत्तेः। अथ विषयः, तदेवेदं विचार्यते—इह प्रकाशबलात् नीलपीतयोः भेदोऽभ्युपगन्तव्यः, येनैव च प्रकाशेन नीलो नील एव इति उपगम्यते, तेनैव च प्रकाशेन पीतः पीत इति कथं संगच्छताम्, नीलेन जनितः, पीतेन जनितः, तेन वा सह एक- सामग्रीक इत्यादि यत् उच्यते, तत् सिद्धे नीलपीतयोर्भेदे स्यात्, स एव विचार्यः। अथ अपने में ही लीन रखते हैं; इसका भी हमने 'नश्येत् जनस्थितिः' में विस्तारपूर्वक कह दिया है। 'न च प्रकाशो भिन्नः स्यात्' इस वचन से इसी बात को बारम्बार ही दिखलाया है॥ २ ॥ अर्थ से भिन्नज्ञान अर्थप्रकाशरूप ही होता है इस बात को मानकर भी दूसरा बाधक उपस्थित करते हैं— प्रकाश अर्थ से भिन्न रहने पर यदि तुम अभिन्न मानोगे तो विषय का सांकर्य हो जायेगा । प्रकाशरूप अर्थ प्रकाशित किया जाता है इसीलिए अर्थका प्रकाशित न होना नहीं सिद्ध होता है ॥ ३ ॥ यदि पदार्थ से भिन्न ही ज्ञानरूप प्रकाश है इसलिए अर्थ से भिन्न है, तब तो प्रकाशमात्ररूप होने से ही अपने में उसका अभेद हो जायेगा । जैसे नील का प्रकाश पीत का प्रकाश है उसमें नीलांश और पीतांश है, वही ज्ञान का वास्तविक स्वरूप है, भेदवाद को त्यागना आवश्यक है । अब 'ज्ञान के विषय ऊपर विचार किया जाता है—यहाँ पर प्रकाश के सामर्थ्य से नील और पीत का भेद मानना पड़ेगा और जिस प्रकाश से नील वस्तु नील ही होती है और उसीप्रकार पीत वस्तु पीत ही होती है, यह कैसे मेल खायेगा ? [ कौमारिल मत यह है कि साकारता के द्वारा किया हुआ ही यह नियम चलता है— 'तत्रानुभवमात्रेण ज्ञानस्य सदृशात्मनः । भाव्यं तेनात्मना येन प्रतिकर्म विभज्यते ॥' अनुभव मात्र से अपने सदृश का ज्ञान होना चाहिए । जिससे प्रत्येक कर्म विभाजित हो जाता है । ] यह नील से पैदा हुआ, पीत से पैदा हुआ, जिस सामग्री से पदार्थ का प्रकाश होगा उसी सामग्री से ज्ञान का भी प्रकाश होगा, नील और पीत का भेद जब सिद्ध होगा तभी यह बात घटेगी, नील पीत का भेद ही तो विचारणीय है । सौत्रान्तिकमत से यदि नीलाकार वह प्रकाश