ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-५, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ८५ नीलाकारोऽसौ तत् यदि प्रतिबिम्बबलात् तद्विद्वितीयबिम्बानवभासात् अयुक्तम् । अथ अभेदः, तर्हि त्यक्तो भेदवादः, तथा कारणतादिवादे शिखरस्थज्ञानं बहुतरनीलादिजन्यम् एकत्र पटु अन्यत्र मन्दम् इति कथं भेदः —प्रकाशशरीरस्य अभेदात्, तथाभूते च अन्यतरदर्शनोद्बोधितेऽपि संस्कारे बलादेव अशेषस्मरणप्रसङ्ग इति भूयान् संकरः । स्यात् एतत्, अर्थ एवास्तु, किमनेन दोषोपपादकेन प्रकाशेन इति । अत्राह—अप्रकाशस्य प्रसिद्धिरैव न काचित्, स्वात्मनि हि नीलं यदि पीतं न किंचित् वा; तत् किं दुष्येत्, अत एव ग्रन्थकृतैव अन्यत्र उक्तम्— एवमात्मन्यसत्कल्पाः प्रकाशस्यैव सन्त्यमी । जडाः प्रकाश एवास्ति स्वात्मनः स्वपरात्मभिः ॥ इति, तत् यदि प्रकाशः तदा भवति अर्थः, प्रकाशश्च असौ कथम् । यदि प्रकाशतैव घटस्य वपुः सैव पटस्य इत्यादि विश्ववपुः प्रकाशः सिद्धः ॥ ३ ॥ एकस्यैव प्रकाशस्य एवंभूतक्रमाक्रमकार्यकारणभावादिविचित्रवैश्वरूप्यप्रदर्शनसामर्थ्यरूपम् ऐश्वर्यम्, इति तावत् पर्यवसाययितव्यम् । तच्चैवं पर्यवस्यति, यदि प्रकाशस्य विचित्रभावे हेत्वन्तरम् अपाकृतम् तत्र प्रकाशस्य अविचित्रस्य क्रमेण विचित्रताकारणं प्रतिबिम्बात्मकं, प्रतिबिम्ब के बल से होता है तो वह प्रकाश द्वितीय बिम्ब के भाससे नहीं हो सकता, विषय की संकीर्णता आ जायेगी। यदि अभेद कहो, तो फिर भेद छोड़ना पड़ेगा, पाटवादि की संकीर्णता होने से कारणतावाद स्वीकार करने पर चोटी का स्थान अत्यन्त अधिक नीलादि से जन्य होगा, एक जगह पटु है तो दूसरी जगह मन्द है यह भेद कैसे होगा ? प्रकाश शरीर के अभेद होने से । [ स्मृति द्वारा संकर दिखाते हैं ] स्मृति के द्वारा अभिन्न मानने पर दूसरों को देखने पर संस्कार उद्बुद्ध होगा तो भी एक ही बार सम्पूर्ण = अशेष के स्मरण का प्रसङ्ग आ पड़ेगा इस प्रकार बहुत से संकर पैदा हो जायेंगे। यह भले ही होता हो, नीलादि पदार्थ रहे, दोष को उत्पादन करनेवाले प्रकाश से क्या प्रयोजन है अर्थात् पदार्थ ही रहे प्रकाश न रहे। यहाँ पर स्मृति में कहते हैं कि अप्रकाश की कोई प्रसिद्धि ही नहीं है, यदि अपने स्वरूप में नील या पीत [ अनील ] कुछ भी न हो तो क्या बिगड़नेवाला है, अत एव स्वयं ग्रन्थकार ने ही दूसरी जगह कहा है— इस प्रकार आत्मा में नहीं के बराबर रहते हुए भी ये सारे के सारे जड पदार्थ प्रकाश के ही स्वरूप हैं। प्रकाश न तो प्रकाश से भिन्न है और न अर्थ से ही भिन्न है परात्मा के साथ अपना ही प्रकाश है। [ स्वयं प्रकाशरूप ज्ञान से अर्थ अभिन्न ही रहता है ] यदि वह प्रकाश है तभी अर्थ है, नहीं तो अर्थ कहाँ रहेगा अर्थात् प्रकाश में अर्थ रहता है। यदि प्रकाशता ही घट का स्वरूप है और वही पट का भी है तो फिर विश्व का स्वरूप ही प्रकाश का स्वरूप सिद्ध होगा [ इसलिए बोधरूप प्रकाश से अभिन्न ही अर्थ रहता है। यही सिद्धान्त है।]॥ ३॥ इस प्रकार क्रम-अक्रमरूप से, कार्य-कारणभावादिसे विचित्र-चित्र विश्व के रूप को दिखाने का सामर्थ्यवाला यह सारा ऐश्वर्य एक प्रकाश का ही है, [ स्वयं अपने आगम शास्त्र की युक्ति से और दूसरों की भी युक्ति से निश्चय होने पर हृदयङ्गम करना चाहिए।] इस प्रकार वह समाप्त हो जाता है, प्रकाश के विचित्र भाव में सौत्रान्तिक ने दूसरा हेतु दिया था—उसे खण्डित किया, वहाँ पर अविचित्र प्रकाश क्रम से विचित्र बनाने का कारण