ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-४-५ तत्प्रतिबिम्बसजातीयं यत् तदेव नीलादिरूपं बाह्यम्, तच्च यद्यपि अनुमेयं, तथापि इदं नीलमिति प्रत्यक्षेण अध्यवसायात् अध्यवसायप्राणितत्वाच्च प्रमाणस्थितेः प्रत्यक्षव्यपदेश्यं भविष्यति । बाह्यार्थवादिकथितमिति हेत्वन्तरम् अनुमीयमानं बाह्यरूपम् आशङ्क्यमानत्वेन प्रदर्शयति— तत्तदाकस्मिकाभासो बाह्यं चेदनुमापयेत् । न ह्यभिन्नस्य बोधस्य विचित्राभासहेतुता ॥ ४ ॥ न वासनाप्रबोधोऽत्र विचित्रो हेतुतामियात् । तस्यापि तत्प्रबोधस्य वैचित्र्ये किं निबन्धनम् ॥ ५ ॥ इह बोधः तावत् अभिन्नः, प्रकाशमात्रमेव हि अस्य परमार्थः, प्रकाशाधिकं यदि नीलस्य रूपं, तर्हि तत् अप्रकाशरूपम् इति न प्रकाशेत । अथ तथा प्रकाशत्वमेव अस्य रूपम्, पीतप्रकाशः कथं स्यात् । अथापि क्रमिकनीलपीतादिप्रकाशरूपमेव तस्य रूपम्, नीलाद्याभासशून्योऽहमिति प्रकाशः स्वापाद्यवस्थासु न स्यात् । तस्मात् प्रकाशः प्रकाश एव, अणुमात्रमपि न रूपान्तरम् अस्य अस्ति इति अभिन्नो बोधः, तस्य च अभिन्नस्य कदाचित् नीलाभासता कदाचित् पीताभासता इति ये विचित्राभासाः तत्र कारणत्वम् हि यस्मात् न उपपन्नम्—हेतौ अभिन्ने कार्यभेदस्य असंभवत्वात्, तस्मात् स स विचित्रनीलपीतादिरूप आकस्मिकोऽज्ञातप्रत्यक्षसिद्धहेतुकः सन् बाह्यं विज्ञानगत- प्रतिबिम्ब रूप था, उस [ नीलादिजातीय ] प्रतिबिम्ब के समान सजातीय जो बाह्य नीलादि रूप है और वह यद्यपि अनुमान का विषय है, फिर भी यह नील है—ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान होने से और अध्यवसाय से जीवित होने के कारण प्रमाण की स्थिति से प्रत्यक्ष कहना पड़ेगा । यही बाह्यार्थ- वादी का कहा हुआ दूसरा हेतु बाह्यरूप से अनुमान किये जानेवाले के प्रति आशङ्का करके प्रदर्शित करते हैं— वह अज्ञात हेतुक आकस्मिक आभास यदि बाह्य पदार्थ का अनुमान करावें तो उससे अभिन्न ज्ञान का विचित्राभास हेतु नहीं बन सकता है ॥ ४ ॥ इसी ढङ्ग से विचित्र वासना का ज्ञान भी हेतुता को नहीं प्राप्त करेगा। उस ज्ञान की भी विचित्रता में क्या कारण होगा। इसलिए बाह्य अर्थ ही आभास की भिन्नता में हेतु हैं ॥ ५ ॥ ज्ञान पदार्थ से भिन्न नहीं है, प्रकाश से [ विरुद्ध ] अधिक नील का स्वरूप होता तो, वह अप्रकाश रूप हो जायेगा और प्रकाशित ही न होगा ! नील रूप से ही इसका स्वरूप स्फुरित होता है नील का पीत से भेद होने से पीत का प्रकाश कैसे होगा। क्रम से नील पीतादि प्रकाशरूपता ही इसका स्वरूप है, नीलादि आभास से शून्य जो अहं प्रकाश है वह स्वप्न-मूर्च्छादि अवस्था में रहता है। इसीलिए प्रकाश को प्रकाश ही मानो, थोड़ा-सा भी इसका दूसरा रूप नहीं होता है, अतः पदार्थ प्रकाश से अभिन्न ही ज्ञान प्रकाश है, और उस प्रकाश को अभिन्न ही मान लिया जाय तो कभी नील का होना ये जितने भी विचित्र आभास हैं उन विचित्र आभासों में [प्रकाश की] कारणता का न होना नहीं बनेगा; क्योंकि हेतु के अभिन्न होने पर कार्य का भेद नहीं हो सकता है, इसीलिए वह विचित्र नील-पीतादिरूप जो आकस्मिक अज्ञात प्रत्यक्ष से सिद्ध हेतुवाला होता