ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-५, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ८७ प्रतिबिम्बात्मकस्वस्वभावसंपादकम् औचित्यवशात् निजरूपसदृशं क्रमोपनिपतद्रूपबहुतरभेदात्मकं ज्ञानात् सर्वथा पृथग्भूतम् अनुमापयति इति संभावयते बाह्यार्थवादी । न च अस्य इदं संभावना- मात्रम् अपि, तु निश्चयपर्यवसायि एव भवति । तथाहि विज्ञानवादिना यो हेतुः वैचित्त्ये वासना- प्रबोधलक्षण उक्तः स न उपपद्यते । 'स्मृतिजनकः संस्कारो वासना' इति तावत् प्रसिद्धम्, इह तु अनुभववैचित्त्ये हेतुः पर्येषणीयो वर्तते । अस्तु वा नीलाद्याभाससंपादनसामर्थ्यरूपा ज्ञानस्य योग्य- तात्मिका शक्तिः वासना, तस्याश्च स्वकार्यसंपादनोंन्मुख्यं प्रबोधः, ततो बोधेषु आभासवैचित्त्यम् इति । तत्रापि तु ब्रूमः-यद्यपि आभासानां ज्ञानान्तर्वर्तिनाम् अपारमार्थिकं संवृतिसत्त्वम् उच्येतापि, तथापि यत् एषां कारणम् तत् वस्तुसदेव अङ्गीकार्यम्-अवस्तुनः सर्वसामर्थ्यविर- हितालक्षणस्य कार्यसंपादनप्राणितसामर्थ्यात्मकस्वभावानुपपत्तेः । एवं स्थिते या एता वासना आभासकारणत्वेन इष्यन्ते, तासां बोधात् यदि भिन्नं रूपम्, तच्च परमार्थसत्, तत् अयं शब्दान्तरप्रच्छन्नो बाह्यार्थवादप्रकार एव । अथ संवृतिसत्, तर्हि तेन रूपेण कारणत्वानुपपत्तिः, अथ येन रूपेण आसां पारमार्थिकता तेन कारणता । तत् तर्हि ज्ञानमात्रं, तच्च अभिन्नम्, इति नीलाद्याभासरूपस्य कार्यभेदस्य असिद्धिः । एवं वासनानाम् अविचित्रत्वे तत्प्रबोधो विचित्र इति
हुआ भी अप्रकाशमान बाह्य विज्ञानगत प्रतिबिम्बरूप अपने स्वभाव को स्वतन्त्र बनानेवाला, उचित होने के कारण अपने स्वरूप के सदृश क्रम से आनेवाले बहुत से भेद ज्ञान सर्वथा अलग रखे हुए अपने को अनुमान करावेंगे, बाह्यार्थवादी की यही सम्भावना है और इसकी यह सम्भावना मात्र ही नहीं है-अपितु निश्चय ही पर्यवसाय होता है । विज्ञानवादी के द्वारा जो वासना-प्रबोधरूप हेतु विचित्रता में कहा है वह सङ्गत नहीं बैठता है । 'स्मृति जनकः संस्कारो वासना' स्मृति का जनक संस्कार वासना है, यह तो प्रसिद्ध ही है, यहाँ तो अनुभव की विचित्रता में जो हेतु है उसे खोजना चाहिए । अथवा ज्ञानके नीलादि आभास को सम्पादन करने की सामर्थ्यवाली योग्यतात्मिका-शक्ति वासना है और वह वासना अपने नीलादिरूप का सम्पादन करने की उन्मुखता रखती है यही ज्ञान-शक्तिरूपता है, इसी कारण बोधादि में आभास की विचित्रता दिखायी देती है । सौत्रान्तिकने जो युक्ति दी है, उस पर भी हम कहते हैं-ज्ञान के भीतर आभासित होनेवाले पदार्थों की अपारमार्थिक संवृत्ति-विकल्प बुद्धि है; यदि ऐसा कहते हो, तो भी जिसका जैसा कारण है उस वस्तु का कार्य भी सदरूप ही स्वीकार करना होगा-अवस्तु तो सामर्थ्य से रहित होती है एवं कार्य साधने की योग्यता उसमें नहीं रहती है । [ ऐसी स्थिति में तो हमारे मनोरथरूपी कल्पवृक्ष से यह फलित हुआ कि हमारे ही सिद्धान्त में आप आ गये हो ] इस तरह ये वासनाएँ आभास की हेतुता खोजती हैं, उनका यदि ज्ञान से भिन्न रूप होता तो वह वस्तुतः परमार्थ सत् ही है उसको दूसरे शब्दों से यह समझो कि प्रच्छन्न-छिपा हुआ ही बाह्यार्थवाद है । अब कहो कि कारण को भी सद्रूप माना जाय तब तो विकल्प-बुद्धिरूप से कारणता की सिद्धि ही नहीं बन पायेंगी, अब तो यही कहना ठीक होगा कि जिस रूप से इन आभास-पदार्थों को पारमार्थिकता है उसी रूप से आभास पदार्थों की कारणता भी माननी होगी । तब तो ज्ञानमात्र ही रह जायेगा और उसी की अभिन्नता भी रह जायेगी-ऐसा माना जाय, जो नीलादि आभास रूप हैं उनमें कार्य भेद की सिद्धि नहीं हो सकती हैं । एवं वासनाओं की अविचित्रता होने पर उसका बोध विचित्र कैसे होगा अर्थात् कोई बाधा भी इसमें नहीं होती है । अथवा भले ही