ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
अ.-१, आ.-५, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ८७ प्रतिबिम्बात्मकस्वस्वभावसंपादकम् औचित्यवशात् निजरूपसदृशं क्रमोपनिपतद्रूपबहुतरभेदात्मकं ज्ञानात् सर्वथा पृथग्भूतम् अनुमापयति इति संभावयते बाह्यार्थवादी । न च अस्य इदं संभावना- मात्रम् अपि, तु निश्चयपर्यवसायि एव भवति । तथाहि विज्ञानवादिना यो हेतुः वैचित्त्ये वासना- प्रबोधलक्षण उक्तः स न उपपद्यते । 'स्मृतिजनकः संस्कारो वासना' इति तावत् प्रसिद्धम्, इह तु अनुभववैचित्त्ये हेतुः पर्येषणीयो वर्तते । अस्तु वा नीलाद्याभाससंपादनसामर्थ्यरूपा ज्ञानस्य योग्य- तात्मिका शक्तिः वासना, तस्याश्च स्वकार्यसंपादनोंन्मुख्यं प्रबोधः, ततो बोधेषु आभासवैचित्त्यम् इति । तत्रापि तु ब्रूमः-यद्यपि आभासानां ज्ञानान्तर्वर्तिनाम् अपारमार्थिकं संवृतिसत्त्वम् उच्येतापि, तथापि यत् एषां कारणम् तत् वस्तुसदेव अङ्गीकार्यम्-अवस्तुनः सर्वसामर्थ्यविर- हितालक्षणस्य कार्यसंपादनप्राणितसामर्थ्यात्मकस्वभावानुपपत्तेः । एवं स्थिते या एता वासना आभासकारणत्वेन इष्यन्ते, तासां बोधात् यदि भिन्नं रूपम्, तच्च परमार्थसत्, तत् अयं शब्दान्तरप्रच्छन्नो बाह्यार्थवादप्रकार एव । अथ संवृतिसत्, तर्हि तेन रूपेण कारणत्वानुपपत्तिः, अथ येन रूपेण आसां पारमार्थिकता तेन कारणता । तत् तर्हि ज्ञानमात्रं, तच्च अभिन्नम्, इति नीलाद्याभासरूपस्य कार्यभेदस्य असिद्धिः । एवं वासनानाम् अविचित्रत्वे तत्प्रबोधो विचित्र इति
हुआ भी अप्रकाशमान बाह्य विज्ञानगत प्रतिबिम्बरूप अपने स्वभाव को स्वतन्त्र बनानेवाला, उचित होने के कारण अपने स्वरूप के सदृश क्रम से आनेवाले बहुत से भेद ज्ञान सर्वथा अलग रखे हुए अपने को अनुमान करावेंगे, बाह्यार्थवादी की यही सम्भावना है और इसकी यह सम्भावना मात्र ही नहीं है-अपितु निश्चय ही पर्यवसाय होता है । विज्ञानवादी के द्वारा जो वासना-प्रबोधरूप हेतु विचित्रता में कहा है वह सङ्गत नहीं बैठता है । 'स्मृति जनकः संस्कारो वासना' स्मृति का जनक संस्कार वासना है, यह तो प्रसिद्ध ही है, यहाँ तो अनुभव की विचित्रता में जो हेतु है उसे खोजना चाहिए । अथवा ज्ञानके नीलादि आभास को सम्पादन करने की सामर्थ्यवाली योग्यतात्मिका-शक्ति वासना है और वह वासना अपने नीलादिरूप का सम्पादन करने की उन्मुखता रखती है यही ज्ञान-शक्तिरूपता है, इसी कारण बोधादि में आभास की विचित्रता दिखायी देती है । सौत्रान्तिकने जो युक्ति दी है, उस पर भी हम कहते हैं-ज्ञान के भीतर आभासित होनेवाले पदार्थों की अपारमार्थिक संवृत्ति-विकल्प बुद्धि है; यदि ऐसा कहते हो, तो भी जिसका जैसा कारण है उस वस्तु का कार्य भी सदरूप ही स्वीकार करना होगा-अवस्तु तो सामर्थ्य से रहित होती है एवं कार्य साधने की योग्यता उसमें नहीं रहती है । [ ऐसी स्थिति में तो हमारे मनोरथरूपी कल्पवृक्ष से यह फलित हुआ कि हमारे ही सिद्धान्त में आप आ गये हो ] इस तरह ये वासनाएँ आभास की हेतुता खोजती हैं, उनका यदि ज्ञान से भिन्न रूप होता तो वह वस्तुतः परमार्थ सत् ही है उसको दूसरे शब्दों से यह समझो कि प्रच्छन्न-छिपा हुआ ही बाह्यार्थवाद है । अब कहो कि कारण को भी सद्रूप माना जाय तब तो विकल्प-बुद्धिरूप से कारणता की सिद्धि ही नहीं बन पायेंगी, अब तो यही कहना ठीक होगा कि जिस रूप से इन आभास-पदार्थों को पारमार्थिकता है उसी रूप से आभास पदार्थों की कारणता भी माननी होगी । तब तो ज्ञानमात्र ही रह जायेगा और उसी की अभिन्नता भी रह जायेगी-ऐसा माना जाय, जो नीलादि आभास रूप हैं उनमें कार्य भेद की सिद्धि नहीं हो सकती हैं । एवं वासनाओं की अविचित्रता होने पर उसका बोध विचित्र कैसे होगा अर्थात् कोई बाधा भी इसमें नहीं होती है । अथवा भले ही
२. क्रिया अधिकार: क्रिया-शक्ति, कार्यकारण-भाव एवं देशकाल-विमर्श
८८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-४-५ का प्रत्याशा । भवन्तु वा वासना भिन्नाः, तथापि बोधमात्रातिरिक्तस्य देशकालभावादेः प्रबोध- काभिमतस्य विचित्रस्य कारणस्य अभावात् प्रबोधोऽविचित्र इति एक एव प्रबोधः इति सममेव नीलादिवैचित्र्यं भासेत । अथ स्वसन्तानवर्त्तीनि बोधान्तराणि विचित्राणि प्रबोधकारणानि इति, तदसत्, सुख-दुःख-नील-पीतादि-पूर्वापरादिदेश-कालभेदस्य विज्ञानमात्ररूपत्वे विज्ञानस्य च प्रकाशमात्रपरमार्थतायां स्वरूपभेदासम्भवे बोधवैलक्षण्यानुपपत्तेः । परप्रमातृरूपेषु बोधान्तरेषु सन्तानान्तरशब्दवाच्येष्वपि तुल्योऽयम् अवैलक्षण्यप्रकारः । तत्रापि परकीयाभिमतस्य कृशस्थूलादेः कायस्य, श्वासप्रश्वासादेः प्राणस्य, सुखदुःखादेः धीगुणस्य, अनुमात्राभिमतसंविन्मात्ररूपा- भेदे परत्वं कस्य इति न विद्मः । बोधस्य तन्निष्ठस्य इति चेत्, सोऽपि प्रमाणेन यदि न सिद्धः तत् असन् एव, सिद्धोऽपि प्रमेयंतया चेत् तत् जड एव, तथापि च कायादिवत् एव ज्ञानमात्र- स्वभावः—स्वसंविन्मात्ररूपत्वे परं प्रति अस्य असिद्धेः । ननु व्याहारादिक्रिया स्वात्मनि इच्छया व्याहरेयम् इत्येवंरूपया हेतुभावेन व्याप्ता दृष्टा तत् चैत्रकायेऽपि तया तद्धेतुकया भाव्यम् । न च मत्संततिपतिता समीहा अस्ति इति स्वसंवेदनेन निश्चितम्, ततश्च परसमीहा सिद्धयति, तदेव वासना भिन्न हो, फिर भी बोधमात्र से अतिरिक्त जो देश-कालादि हैं उसे प्रबोध करनेवाले के माने हुए विचित्र कारण का अभाव होने से बोध अविचित्र ही रहता है एक ही [ आभास रूप ] प्रबोध नीलादि विचित्रता को युगपत् भासित करेगा । [ विज्ञानवादी के मत की आशंका 'अथ' शब्द से करते हैं ] अपने सन्तान 'प्रवाह' में रहनेवाले अन्य-अन्य ज्ञान विचित्र कारण होंगे, ऐसा बाह्यार्थ- वादी का कहना ठीक नहीं बैठता है, क्योंकि सुख-दुःख नीला-पीतादि, पूर्वोत्तर देश-काल के भेद का विज्ञानमात्र स्वरूपत्वमें और विज्ञान का प्रकाशमात्र परमार्थरूप में स्वरूप भेद सम्भव नहीं होने से बोध की विलक्षणता नहीं बैठ सकती है । इसीमें दूसरे पक्ष से कहते हैं । प्रमातृरूप दूसरे बोध में, दूसरे सन्तान प्रवाह शब्द के वाच्य में बोध की स्वरूपता अभिन्न ही रहती है अर्थात् दूसरे सन्तान में भी समानता का ही समर्थन किया जाता है। अभेदता में भी दूसरे से माना हुआ कृश-स्थूलादि शरीर का श्वास-प्रश्वासादि प्राण का, सुख-दुःखादि बुद्धि के गुग का, अनुमान करनेवाले के अभिज्ञान मात्र से अभेद होनेसे किसको तुम परत्व कहोगे; यह हमारी समझ में नहीं आता है । यदि बोधको परनिष्ठ मानते हो तो, वह भी प्रत्यक्ष प्रमाण से यदि सिद्ध नहीं है तब तो वह असत् ही है, प्रमेयरूप [ बोधरूप ] से यदि सिद्ध भी मान लिया जाय तो भी वह जडरूप ही हो जायेगा और जडता होने पर भी शरीरादि के समान ज्ञानमात्र स्वभाववाला परनिष्ठ अर्थात् जडरूप ही होगा, ज्ञानमात्ररूप होनेपर वह दूसरों के प्रति असिद्ध हो जायेगा; क्योंकि ज्ञानोंकी परस्पर संवेद्यता नहीं बनती है । 'ननु' कहकर [ सौगत ] बौद्धलोग प्रमाण देते हैं कि व्याहारादि क्रिया [ बोलना ] अपने आप [ स्व सन्तान ] में इच्छा से बोलेंगे इस हेतु रूप भाव से व्याप्त देखी गयी है वही चैत्र के शरीर में भी उसी [ इच्छारूप हेतु ] से होनी चाहिए । क्षण सन्तान में आनेवाली अन्य की इच्छा नहीं है अपने अनुभव ज्ञान से निश्चित होती है इसीलिए दूसरे की इच्छा सिद्ध हो जाती है, वही
अ.-१, आ.-५, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ८९
संतानान्तरम् इति। अत्रोच्यते—इह अनुमातुः व्याहाराभासो द्विधा भवति—व्याप्तिग्रहण- कालेऽविच्छेदप्राणोऽहं व्याहरामि इत्येवंरूपः। अनुमानावसरे च ‘व्याहरति अयम्’ इति विच्छेद- जीवित इति अन्यस्य व्याप्तिः गृहीता, अन्यश्च आभासः कथम् इदानीं हेतुः स्यात्, व्याहरति इति आभासस्य च हेतुः अविदित एव इति कथं ततो हेतोः समीहा अनुमीयेत, किं च ‘व्याहरति अयम्’ इति यः प्रमात्रन्तरेऽनुमातृसंमते विच्छिन्नतया अवभासः सोऽनुमेयसंमतायाः परसमीहायाः कथं कार्यः स्यात्। तस्या हि व्याहरामीत्याभासः कार्यो योऽसौ अविच्छेदजीवितः। न च अविच्छेदमयस्य विच्छेदमयः कार्यम् इति युक्तम्—तथाभूतकार्यकारणभावग्रहणोपायाभावनाव्, नहि स्वात्मनि योऽयम् अविच्छिन्नाभासः, स परत्र विच्छिन्नं ‘व्याहरति अयम्’ इत्येवंरूपम् आभासं जनयति, इति केनचित् प्रमाणेन सिद्धम्—परसिद्धिपूर्वकत्वात् अस्य अर्थस्य, परप्रमातृसिद्धेश्च। एवंभूतार्थसिद्धयधीनत्वेन इतरेतराश्रयात्। न च अवश्यम् अविच्छिन्नात् विच्छिन्नेन भाव्यम् इति नियमोऽस्ति व्यभिचारात्। न च विच्छिन्नोऽपि आभास उत्पद्यताम्, इति तदनुसन्धानात् तदुत्पत्तिः नियता—तत्सद्भावेऽपि अनुत्पत्तेः तदभावे च उत्पत्तेः, विच्छिन्न आभासः परत्र उत्पद्यताम् इति या समीहा तया सह परत्र उत्पन्नस्य विच्छिन्नाभासस्य कार्यकारणभावग्रहणमेव परासिद्धौ न युक्तम्
परकाय चैतन्य है अर्थात् दूसरा सन्तान है। [ अब सौत्रान्तिक लोग दूसरे सन्तान अनुमान के विषय में कहते हैं ] यहाँ पर अनुमान करनेवाले का व्याहाराभास दो प्रकार का है [ दूसरे का व्याहार ही समीहापूर्वक हो सकता है, हमारे व्याहार की तरह ] व्याप्ति ग्रहण काल में भिन्न काल न होता हुआ अविच्छेदरूप से मैं बोलता हूँ—ऐसा ही यह होगा और अनुमान काल में ‘व्याहरति अयम्’ भेद मूलक अन्य की व्याप्ति गृहीत होती है और विच्छेद प्राणवाला आभास कैसे दूसरों की समीहा का गमक [ बतानेवाला ] होगा, ‘बोलता है’ इस आभास का इच्छारूप हेतु अविदित ही है कैसे उसकी इच्छा अनुमान करेगी और भी ‘व्याहरति अयम्’ यह दूसरे प्रमाता में अनुमातृरूप से माना गया भेदपूर्वक अवभास अनुमेयरूप से मानी गयी दूसरे की इच्छा का कैसे कार्य हो सकता है। ‘मैं कहता हूँ’ यह आभास अपना स्वात्म अविच्छेदरूप से प्राणित है और अविच्छेदरूप [ व्याहरामि इत्येवं रूपाभासस्य ] का विच्छेदरूप [ व्याहरति अयम् ] से कार्य होना उचित नहीं है, उसी प्रकार होनेवाले कार्य-कारणभाव ग्रहण करने के लिए कोई उपाय नहीं है, अपने में होनेवाला जो ‘व्याहरामि’ अविच्छेद आभास है वह [ अनुमेय ] दूसरी जगह में विच्छिन्न होकर ‘व्याहरति अयम्’ इस रूप में आभास पैदा करता है, किस प्रमाण से सिद्ध होगा, क्योंकि ये अर्थ दूसरे के सिद्ध होने पर ही सिद्ध होते हैं [ अविच्छिन्नाभास के रहने पर विच्छिन्नाभास उत्पन्न होता है ] इस प्रकार से तो अन्योन्याश्रय दोष आ जायेगा। अविच्छिन्न आभास से कहीं विच्छिन्नाभास होता है अर्थात् ‘व्याहरामि’ की जगह ‘व्याहरति अयम्’ ऐसा क्या बोला जा सकता है ? नहीं, यह नहीं हो सकता है और ऐसा कोई नियम भी नहीं है जो अविच्छन्ना- भास से विच्छिन्नाभास होता हो, यदि मानते हो, तो इसका व्यभिचार होगा। विच्छिन्नाभास ‘व्याहरति अयम्’ दूसरे प्रमाता में उत्पन्न नहीं हो सकता है। अविच्छिन्नाभास के अनुसन्धान से ही विच्छिन्नाभास की उत्पत्ति सम्भव है—अविच्छेद के अभाव में उत्पन्न नहीं हो सकता और अविच्छेद के रहने पर उत्पन्न होगा, परप्रमाता में ‘व्याहरति अयम्’ ऐसा उत्पन्न हो, उसके साथ दूसरे प्रमाता में उत्पन्न विच्छिदाभास परप्रमाता के सिद्ध न होने से कार्य-कारणभावादि का १२
९० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-६ इति व्याप्तेरेवासिद्धिः। प्रमात्रन्तराणि च यदि भिन्नानि तदा तन्निष्ठानाम् अवभासानां भेद एव, 'ज्ञानाद्व्यतिरिक्तं च' इति न्यायात्। ततश्च एकाभासनिष्ठत्वाभावात् एकाभासविश्रान्तः सम्भूय प्रमातृणां व्यवहारो न स्यात्—इति अन्योन्यानुपरक्तं भूतग्रस्तप्रकृतिप्रायं जगत् आपद्येत। अनुमीय- मानमपि च बोधान्तरम् अनुमातृसम्मतात् बोधात् यदि भिन्नम्, तत् अस्ति तावत् सम्भवः —यत् प्रमेयं बोधात् भिन्नम् अस्ति इति। सहोपलम्भनियमादेः अनैकान्तिकत्वात् नीलपीतादिनापि प्रमेयराशिना किम् अपकृतम्, येन अस्य स्वरूपविश्रान्तिः न सह्यते, तस्मात् प्रमात्रन्तराणामपि असिद्धिरेव, सिद्धौ वा सर्वप्रमात्रन्तर्गता आभासा एकैकत्र परत्र आभासवैचित्र्यहेतुं वासनोद्- बोधवैचित्र्यं जनयेयुः —नियमे हेत्वन्तराभावात् इति, तथापि न नीलादिवैचित्र्यसिद्धिः। एवं वासनानां तदुद्बोधहेतूनां च विचित्राणाम् अनुपपत्तिरेव। ततश्च स्थितमेतत्, अभिन्नो बोधः तस्य आकस्मिकाभासभेदहेतुत्वानुपपत्तेः बाह्योऽर्थोऽनुमेयः सम्भाव्यते—इति यदि बाह्यार्थवादिना उच्यते, इति श्लोकद्वयार्थः। चेच्छब्दः श्लोकद्वयवाक्यार्थशङ्काद्योतकः ॥ ४-५ ॥ एवम् आशङ्क्यमानत्वेन परसम्भावना दृढा दर्शिता, अधुना तु एनां सम्भावनां शिथिलयितुं तावदाह— स्यादेतदवभासेषु तेष्वेवावसिते सति। व्यवहारे किमन्येन बाह्येनानुपपत्तिना ॥ ६ ॥ ग्रहण नहीं होगा—यह व्याप्ति ही नहीं बनेगी और यदि अन्य जीव भिन्न हैं तो अन्य प्रमाओं में रहनेवाले आभास का भेद ही रहेगा, [ 'ज्ञानाद्व्यतिरिक्तं च' ज्ञान से अभिन्न अर्थान्तर कैसे होगा, यह आचार्य धर्मकीर्ति का कथन है।] इसी कारण एक वस्तु में न रहने के कारण एकाभास में रहकर मिले हुए प्रमाताओं का 'शिविका' पालकी के समान व्यवहार नहीं होगा। इस तरह आपस में न मिलने से भूत से ग्रस्त हो जाने के समान मूर्च्छित ही प्रायः जगत् का व्यवहार हो जायेगा। अनुमान किया जानेवाला दूसरा ज्ञान अनुमाता के सम्मत ज्ञान से यदि भिन्न है, तब तो वह प्रमेय ज्ञान से भिन्न है, यही सम्भव हो सकता है, कर्ता और कर्म का तादात्म्य नहीं होने से। एक ही साथ ज्ञान और ज्ञेय का बोध हो सकता है, यह कोई निश्चित नहीं है या हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता है, तो फिर नील-पीतादि समूह ने क्या अपकार किया है, जिस अपकार से प्रमेय के स्वरूप में विश्रान्ति होना तुम विज्ञानवादियों द्वारा नहीं सहन होता है, इससे अन्य प्रमाताओं की असिद्धि ही होगी, सिद्धि मानने पर भी प्रमाताओं के भीतर रहनेवाला आभास ज्ञान प्रत्येक स्थान में आभास की विचित्रता के हेतु वासना में उद्बोध वैचित्र्य पैदा कर देंगे; क्योंकि नियम में कोई हेतु नहीं है, ऐसा यत्न करने पर भी नीलादिकों की विचित्रता में विचित्रताओं की अनुपपत्ति ही होगी। इससे यह बात रह गयी, अभिन्न चिन्मात्र ज्ञान आकस्मिका- भास भेद का हेतु नहीं बन सकता है इसीलिए बाह्यार्थ अनुमेय है यह बात सम्भव है और यही बाह्यार्थवादी का कहना है दोनों श्लोकों का यही अर्थ है। 'चेत्' शब्द दोनों श्लोकों के वाक्यार्थ की शङ्का का द्योतक है ॥ ४-५ ॥ बाह्यार्थवादी द्वारा को हुई आशङ्का को दृढता पूर्वक बतलाया, किन्तु अब उस सम्भावना को शिथिल करने के लिए [इसके बाद में ईश्वर अद्वैतवादी] कहेंगे—
अ.-१, आ.-५ का.-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९१ स्यादेतत्—इति पूर्वोक्तसम्भावनाभ्युपगमे यदा व्याख्यायते तदा किं तु इति वाक्यशेषेण तच्छैथिल्यविषयं सम्भावनान्तरं शेषश्लोकेन दर्श्यत इति व्याख्येयम् । यदि तु अध्याहारो न सह्यते तदा स्यादेतदिति इदमपि सम्भावनान्तरं स्यात्, यदनेन श्लोकेन उच्यते इति एकवाक्य- तया योज्यम्, अनयापि कष्टकल्पनया बाह्यान् अर्थान् प्रसाधयता भवता तैः न किंचित् कर्तव्यम्, आभासैरेव तैः भवता अभ्युपगतैः व्यवहारसिद्धेः, न हि नित्यानुमेयेन कश्चित् व्यवहार इति किं बाह्येन, यत्र साधकं च नास्ति प्रमाणम्, बाधकं च प्रकाशात् भेदे अनुमेयतयापि प्रकाशना- भाव इति तावत् मुख्यम् । अभ्युच्चयबाधकास्तु अवयविनो वृत्त्यनुपपत्तिः, समवायासिद्धिः, कम्पाकम्पावरणानावरणरक्तारक्तदिग्भागभेदादिविरुद्धधर्मयोगः । अणुसंचयबाह्यवादेऽपि संचयस्य यह सम्भव हो सकता है उन आभासों की समाप्ति होने पर जिसकी उपपत्ति न बैठती हो । ऐसे व्यवहार में अन्य बाह्य-पदार्थ से क्या क्षति आयेगी ॥ ६ ॥ हो सकता है—पूर्वोक्त सम्भावना को मान लेने पर जब व्याख्यान करोगे तब तो इस वाक्य शेष से उसके शैथिल्य विषय की दूसरी सम्भावना को शेष श्लोक से बताते हैं—ऐसी व्याख्या करना ठीक है । यदि अध्याहार-समुच्चारण सह्य नहीं होता हो, तब तो यह भी दूसरी सम्भावना हो सकती है, जब कि इसी श्लोक से यह कहा जाता है—ऐसी एक वाक्यता जोड़नी चाहिए वाक्य भेद करना समुचित नहीं होता, [ अब दोनों के पक्षों में समान अर्थ हो गया । ] इस कष्टदायी कल्पना से भी बाह्य-अर्थों की सिद्धि करोगे तभी भी उन बाह्य-अर्थों से प्रयोजन कुछ सिद्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि जिन आभासों को आपने मान लिया है उन आभासों से ही व्यवहार की सिद्धि हो जायेगी, नित्य अनुमेय से कोई भी व्यवहार नहीं होगा, अप्रकाशमान होने के कारण बाह्यार्थ से क्या उपस्थित है । जहाँ पर साधक कोई प्रमाण नहीं है, और बाधक प्रमाण प्रयोजन है, क्योंकि प्रकाश से भेद होने पर अनुमेय से भी प्रकाशन का अभाव मुख्य रहता है । प्रकाश से भिन्न अप्रकाश होता है तो यही अधिक बाधक प्रमाण हो गया; इस इस विषय में जैसा भी सोचो, किन्तु जब प्रकाश से भिन्न मानोगे तब तो वह अप्रकाश हो ही जायेगा । इसका प्रकाशित न होना ही एकमात्र निष्कर्ष निकलता है अवयवों में अवयवी रहता है तथा अवयवी का अवयवों में नहीं रहना ही अभ्युच्चय बाधक कहलाता है, अर्थात् जब १. पूर्व में तो प्रमाण के व्याज से प्रवृत्त हुए बाधक को कह दिया किन्तु अब अपने आप भी प्रमेय के अपने निरूपण में प्रवृत्त हुए प्रवृत्ति द्वारा प्रवृत्त प्रमेय के स्वरूप का उन्मूलन कर देना ही इसका अधिक बाधकत्व है । २. हाथ चलता है इसमें केवल हाथ का ही चलन हो रहा है, सारे शरीर का नहीं होता है, तभी अवयव और अवयवी की युतसिद्धि हो जाती है । न्यायकन्दली में इसका प्रतिपादन किया हुआ है । हाथ के कम्पन होने पर हाथ के आश्रयभूत शरीर का कम्पन होता हुआ नहीं देखा जाता अथवा पैर का कम्पन होने पर तद्गत शरीर कम्पित होता नहीं देखा जाता, यही इसमें विरुद्धधर्मता मिलती है । उसी प्रकार एक अवयव के ढक जाने पर उसमें समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले अवयवी का ग्रहण नहीं
९२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-६ अन्यस्य अभावे अणव एव, ते च यदि संयुज्यन्ते निरन्तरतया तत् अवश्यं दिग्भागभेदः, देवनाक्षे षट्सु दिक्षु संचीयमानेषु षट्सु अणुषु मध्यमस्य परमाणोः यत्रैव धाम्नि एको लग्नः तत्रैव यदि अपरः तत् एकपरमाणुमात्रता । अथ अन्यत्र एकः अन्यत्र अपरः तत् अवश्यं भागभेदापत्तिः, इति भाग एव परमार्थसन्, तस्यापि एषैव सरणिः इति न किंचित् अवशिष्यते बाह्यं तत्त्वतः । न चैतत् वाच्यम् — मूर्तानाम् एकदेशत्वायोगात्, संयोगे भिन्नदेशत्वाव्यावृत्तेः तन्निष्ठं द्व्यणुकं नाम कार्यद्रव्यम् अणुपरिमाणम्, तेभ्यः त्रिभ्यो महत्कार्यम् इति । अवयविवादो हि अयम्, स च पूर्वमेव अपबाधितः । यच्च अव्याप्यवृत्तित्वं संयोगस्य उच्यते तन्निरंशे कथं संगच्छताम् । स्वाश्रये हि यदि असौ समवैति किम् अन्यत् अस्य अवशिष्टम् यत् न व्याप्नुयात् इति, अभ्युच्चयबाधकं च इदम्, इति न अत्र अस्माभिः भरः¹ कृतः । विस्तरेण च प्रज्ञालङ्कारे दर्शितम् आचार्यशंकर- नन्दनेन ॥ ६ ॥ अवयवी वस्तु ही नहीं है तो अवयव किसमें रहेगा, यही वृत्ति की अनुपपत्ति है, समवाय की भी तो असिद्धि हो जाती है, क्योंकि अवयव अवयवी की सत्ता में ही समवाय की सत्ता रहती है, कम्पन-अकम्पन [ स्थैर्य ] आवरण-अनावरण, रक्त-अरक्तादि दिशाओं का भेद विरुद्ध धर्मों के संयोग मूर्त में बाध माना जाता है। अणु समुदायवाद में भी अणु समुदाय दूसरे परमाणु विलक्षण के अभाव में अणु ही रह जाते हैं और वे यदि निरन्तर संयुक्त होकर मिले रहते हैं तब तो अवश्य ही दिशाओं से उपलक्षित होनेवाले भाग का भेद हैं, ऐसी स्थिति में तो दिशाओं में भी भेद मानना पड़ेगा, षट् कोणवाली दिशाओं का ही भेद होता है, परमाणुओं का संयोग- वियोग भी बन सकता है इसो प्रकार वहाँ पर भी मान लो, इसीलिए यथार्थता में बाह्य कोई पदार्थ नहीं है और वह एक परमाणु मात्र का समर्थन भी नहीं कर सकता है मूर्तों के एक स्थान में रहना असम्भव होने से, संयोग हो जाने पर भिन्न देश में रहना नहीं बनेगा उसमें रहनेवाले दो परमाणु कार्य द्रव्य अणुपरिणाम ही रहेगा तीन परमाणु से महत् कार्य होता है। इस अवयवि- वाद का तो हमने पूर्व में ही खण्डन कर दिया है। अव्याप्यवृत्ति संयोग अक्षपाद के मत की आशङ्का कर कहते हैं ‘यच्चेति’—संयोग का अव्याप्यवृत्तित्व निरंश में कैसे हो सकेगा। यदि यह कहो कि अपने आश्रय में संयोग रहता है तो कौन वस्तु ऐसी है जहाँ पर संयोग व्याप्त नहीं होता है और यह बाधकों की भरमार है इसलिए हमने कोई जोर नहीं दिया है और इसका सविस्तार प्रतिपादन श्रीआचार्य शङ्करनन्दन ने प्रज्ञालङ्कार में किया भी है ॥ ६ ॥ होगा, आवरण हट जाने से तो ग्रहण होता है, इस प्रकार एक साथ भी ग्रहण होता है। अब कहो कि अवयवी का सम्बन्ध एक-एक अवयवी के साथ रहता है अथवा सम्पूर्णतया रहता है, एक देश से [ वृत्ति का ] रहना बन नहीं सकता है; अवयव से भिन्न एक देश का अभाव होने से, अथवा सम्पूर्णतया रहता है यह कहो तो भी दूसरे अवयव में वृत्ति नहीं रहती है; क्योंकि एक अवयव के संसर्गावच्छिन्नरूप में दूसरे अवयवों का स्थान न रहने से, उस स्वरूप से अतिरिक्त इसका दूसरा स्वरूप नहीं होने से भी यह बात है । १. भरः—शब्द अतिशय प्रयत्न—अर्थ में है ।
अ.-१, आ.-५, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९३ ननु बाधकं नाम प्रमाणसिद्धे वस्तुनि न किंचित् कर्तुं समर्थम्—तेनैव दृढेन प्रमाणेन बाधकाभिमतस्य बाधितस्य अप्रमाणत्वसम्पादनात् । दर्शितं च इह साधकं प्रमाणं कार्यहेतुः 'तत्तदाकस्मिकाभास' इति कारिकया इत्याशङ्क्य आह— चिदात्मैव हि देवोऽन्तःस्थितमिच्छावशाद्बहिः । योगोव निरूपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ ७ ॥ इह तावत् स्वप्न-स्मरण-मनोराज्य-संकल्पादिषु नीलाद्याभासवैचित्र्यं बाह्यसमर्पकहेतु- व्यतिरेकेणैव निर्भासते इति यद्यपि अस्ति सम्भवः, तथापि तदाभासवैचित्र्यम् अस्थैर्यात् सर्वप्रमात्रासाधारण्यात् पूर्वानुभवसंस्कारजत्वसम्भावनात् अवस्तु इति शङ्क्येत । यत् पुनरिदं योगिनाम् इच्छामात्रेण पुरसेनादिवैचित्र्यनिर्माणं दृष्टम्, तत्र उपादानं प्रसिद्धमृत्काष्ठ-शुक्र- शोणितादिवैचित्र्यमयं न सम्भवत्येव, न हि एवं वक्तुं शक्यम्—सर्वगताः परमाणवो योगीच्छया झटिति संघटिताः कार्यम् आरप्स्यन्ते इति । यत एतत् लोकप्रसिद्धकारणभावानतिक्रमसिद्धये अब प्रश्न करते हैं कि प्रमाण से सिद्ध वस्तु में बाधक प्रमाण कुछ नहीं कर सकता; क्योंकि उस दृढ प्रमाण से जिसको बाधक माने हुए हो उसमें अप्रमाणत्व सम्पादित हो जाता है और इसमें साधक प्रमाण तो कार्य का हेतु है इसे 'तत्तदाकस्मिकाभासः' इस कारिका में दिखा दिया है; इस प्रकार आशङ्का कर कहते हैं— चिदात्मा देव ही अपने भीतर स्थित अर्थसमूह को इच्छाबल से बाहर की ओर प्रकाशित करते हैं जैसे योगी उपादान कारणादि के बिना भी अर्थसमूह को प्रकाशित करते हैं ॥ ७ ॥ स्वप्न, स्मरण, मनोराज्य, संकल्पादि में बाहरी कारणों के बिना भी नीलादि पदार्थ चित्र- विचित्र रूपों से भासित होते हैं, यह सब संभव है, उसी प्रकार आभास की विचित्रता अस्थिर होने से सभी प्रमाताओं में असाध्य होने के कारण पूर्वकाल के संस्कार से ही उत्पन्न होती है इसलिए अवस्तु ही है । जो कि यह योगी लोगों की इच्छा मात्र से पुर, सेना, गढ़-किला आदि का विचित्र-चित्र निर्माण देखा जाता है उसमें प्रसिद्ध उपादन [ कार्य से अभिन्न रहता है जैसे घट के प्रति मिट्टी उपादान कारण होती है ] मिट्टी, काष्ठ, शुक्र, शोणितादि वैचित्र्यमय कारणों की तो संभावना भी नहीं देखी जाती है, ऐसा नहीं कह सकते हो—योगी की इच्छामात्र से सब जगह रहनेवाले व्यापक परमाणु आपस में एक दूसरे से मिलकर शीघ्र ही कार्य संपादन कर देते हैं । जब कि यह लोक प्रसिद्ध कार्य-कारणभाव अनतिक्रम सिद्धि के लिए निरूपण करते हैं । यह प्रसिद्ध १. जिन लोगों ने अपना परम संविद्रूप स्वातन्त्र्य नहीं जाना है उन्हें सदैव संशय-विपर्यय बने ही रहते हैं । जिन्होंने संविद्रूप स्वातन्त्र्य प्राप्त कर लिया है उन्हें तो कभी-कभी दूसरे कारण को खोजने के लिए अन्वेषण नहीं करना पड़ता है । इस विषय में "भट्टदिवाकरवत्स" ने कहा है 'न दृश्यते त्वत्प्रतिभास- शक्तेः स्वप्नेऽर्थवैचित्र्यनिमित्तमन्यत् । तद्दृष्टसामर्थ्यतया सदैव विश्वप्रपञ्चप्रथनेकहेतुः ॥ हे प्रभो ! आपकी प्रतिभा-शक्ति से भिन्न कोई निमित्त अर्थवैचित्र्य के लिए स्वप्न काल में भी नहीं दिखते हैं । विश्वप्रपञ्च का विस्तार करने में एक मात्र कारण संविद्रूप का सामर्थ्य ही है । २. घटरूप कार्य से अभिन्न रहनेवाला उपादान कारण कहलाता है जैसे कि घट के प्रति मिट्टी ।
९४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-७ निरूप्यते । न च एतत् प्रसिद्धम्—परमाणुभ्य एव स्थूलं घटादि जायते इति, किं तु कपालादि- व्यवधानेन, तत्रापि नियंतसहकारिसमवलम्बनम् करचरणादिव्यापारो विशिष्टदेशकालधर्माधि- पत्ययोगः शिक्षाभ्यासप्रकर्ष इति, इयति च आश्रीयमाणे योगी कुम्भं निर्मिमाणः कुम्भकार- प्रसिद्धसमस्तसामग्रीसमर्जनपुरःसरं घटं घटयन् कुम्भकार एव स्यात्, तस्मात् प्रसिद्धकार- णोल्लङ्घने किम् असंचेत्यमानपरमाण्वाद्युपादानकारणान्तरचिन्तया इति । तत्र योगिसंविद एव सा तादृशी शक्तिः—यत् आभासवैचित्र्यरूपम् अर्थजातं प्रकाशयति इति । तत् अस्ति सम्भवः— यत् संवित् एव अभ्युपगतस्वातन्त्र्या अप्रतीघातलक्षणात् इच्छाविशेषवशात् संविदोऽनधिकात्म- ताया अनपायात् अन्तःस्थितमेव सत् भावजातम् इदमित्येवं प्राणबुद्धिदेहादेः वितीर्णकियन्मात्र- संविद्रूपात् बाह्यत्वेन आभासयति इति, तत् इह विश्वरूपाभासवैचित्र्ये चिदात्मन एव स्वातन्त्र्यं किं न अभ्युपगम्यते स्वसंवेदनसिद्धम्, किमिति हेत्वन्तरपर्येषणप्रयासेन खिद्यते । एवकारेण इदमाह—सर्वेण तावत् वादिना विषयव्यवस्थापनं संविद्रूपम् अनपह्नवनीयम् आदिसिद्धं हि तत् इति उक्तम् । तस्य च स्वातन्त्र्यमेव देवशब्दनिर्दिष्टं चिद्रूपत्वम्, इति किम् अपकारणान्वेषण- व्यसनितया । हि यस्मात् एवं प्रकाशयति देव इति सम्भाव्यते, तस्मात् किं बाह्येन अनुपप- त्तिना, इति पूर्वेण सम्बन्धः ॥ ७ ॥ नहीं है कि परमाणुओं से ही घटादि की उत्पत्ति होती हो । किन्तु दो कपाल आपस में जब मिलते हैं तभी घट तैयार होता है, उसमें भी नियत सहकारी कारणों [घटरूप कार्य से भिन्न देश में रहने- वाले जैसे चक्र, दण्ड, चीवरादि सहकारी कारण कहलाते हैं] का अवलम्बन करना, हाथ, पैर आदि के व्यापार विशिष्ट देश-काल धर्म का योग होना अपेक्षित है । घट निर्माण के लिए घट सम्बन्धी शिक्षा, ज्ञान एवं अभ्यास का होना आवश्यक होता है । इतनी वस्तु-सामग्री के रहने पर योगी घट बनावे तो कुम्भकार ही सिद्ध हो जायेगा, इसलिए प्रसिद्ध कारण के उल्लंघन करने में जो संभव नहीं है उस परमाणु से भिन्न कारण की चिन्ता करना व्यर्थ है । उसमें तो योगी के ज्ञान की ही वह वैसी शक्ति है—जो आभास वैचित्र्यरूप से अर्थसमूह को प्रकाशित करती है । इसलिए संभव हो सकता है जो कि संवित् ही अपनी मिली हुई स्वतंत्रता से, निर्बाधरूप से, इच्छा विशेष से, अधिक न होनेवाली संवित् का नाश न होने से, भीतर रहनेवाले पदार्थ समूह को ही बाहर में प्राण, बुद्धि, देहादि रूप से, कुछ फैली हुई संविद्रूप से, बाहर में आभासित करती है, इसलिए बाहर के भावपदार्थों की विचित्र-चित्ररूपता में चिदात्मा का ही स्वातन्त्र्य क्यों नहीं मान लेते हो जोकि वह स्वयं संवेदन ज्ञान से सिद्ध है, क्यों दूसरे-दूसरे हेतु के खोजने के परिश्रम से खिन्न होते हो । 'एवकार' शब्द से यह कहते हैं कि सब वादी से विषय की व्यवस्था संविद्रूप मानो जाती है जो कि आदि सिद्ध है उसे हमने पहले ही कह दिया है और उसके स्वातन्त्र्य को 'देव' शब्द से व्यक्त किया है, क्यों दूसरे कारण को खोजने में व्यसनी बनते हो, 'हि' जिससे ऐसा यह देव प्रकाशित होता है, ऐसी संभावना करना संभव हो सकता है । इसलिए बाह्य कारण की क्या आवश्यकता है जबकि बन नहीं सकता ॥ ७ ॥ १. 'इति' शब्द वाक्य की समाप्ति अर्थ में दिया गया है । २. घटरूप कार्य से भिन्न देश में रहनेवाले का नाम सहकारी कारण है । जैसे घट के प्रति दण्ड-चक्रादि ।
अ.-१, आ.-५, का.-८-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९५ ननु एवम् उभयथापि सम्भावनानुमानम् उन्मिषति, तत्र किं मुकुरप्रतिबिम्बितघटादि- दृष्टान्तेन ज्ञानप्रतिबिम्बिताभासबैचित्र्ये विज्ञानदर्पणातिरिक्तं तत एव बाह्याभिमतं हेतुं कल्पयेम ? किं वा योगिदृष्टान्तेन संवित्स्वातन्त्र्यमेव हेतुभावेन ब्रूयाम ? तदिदं सांशयिकं वर्तते इति आशङ्क्य बाह्यार्थानुमानसम्भावनां सूत्रद्वयेन अपाकर्तुमाह— अनुमानमनाभातपूर्वे नैवेष्टमिन्द्रियम् । आभासमेव बीजादेराभासाद्वेतुवस्तुनः ॥ ८ ॥ आभासः पुनराभासाद्बाह्यस्यासीत्कथंचन । अर्थस्य नैव तेनास्य सिद्धिर्नाप्यनुमानतः ॥ ९ ॥ न केवलम् अनन्तरश्लोकनिर्दिष्टाभिः युक्तिभिः प्रत्यक्षेण बाह्योऽर्थो न आभासते, इयदेव हि प्रत्यक्षं—यत् नीलं भाति इति स्वप्रकाशसंविद्रूपं, नाधिकं किञ्चित् इति, यावत् अनुमानेनापि न अस्य बाह्यस्य सिद्धिः इति अपिशब्दः । तत्र अनुमानम् अत्र नैव प्रवर्तितुम् उत्सहते । प्रवृत्त- मपि न प्रकृतसिद्धम् आदध्यात् इति अनेन सूत्रद्वयेन दर्श्यते । तत्र अनुमानं—विकल्पः, सर्वश्च अयं विकल्पोऽनुभवमूल इति प्रसिद्धम् । तेन यत् सर्वथा अनाभातपूर्वम्—अननुभूतचरं तत्र अब शंका करते हैं कि आगे कही जानेवाली दोनों तरह की संभावना से अनुमान निकलता है, [ सर्वथा ही दूसरे में रहनेवाले अनुमान को सिद्ध करना होगा और उस सम्भावनारूप अनुमान से तो दोनों समान ही विकसित होंगे अतः इसमें फिर किसका त्याग किया जाय और किसका ग्रहण किया जाय । ] घटादि का दर्पण में पड़े हुए प्रतिबिम्ब के समान अथवा ज्ञान में जो प्रतिबिम्बता का आभास है उसकी विचित्रता में विज्ञान दर्पण से भिन्न और उसीसे बाहर माने हुए [ अपने सदृश दूसरे भाव-पदार्थ का संक्रमण होना ] हेतु की क्या कल्पना करोगे ? अथवा योगी के दृष्टान्त से ज्ञान की ही स्वतन्त्रता को हेतुभाव से क्या हम कहेंगे ? यही बात सन्देह में पड़ी हुई है ऐसी आशंका कर बाह्यार्थ के अनुमान की सम्भावना को दूर करने के लिए दो श्लोकों से कहते हैं— पूर्व में जिसका आभास नहीं हुआ है उसका अनुमान नहीं होता, हेतु देने योग्य जो बीजादि वस्तु है उस आभास से इन्द्रियाँ आभासित ही होती हैं ॥ ८ ॥ बाहर के आभास से किसी भी तरह उसका आभास था इसलिए बाहर का अनुमान नहीं हो सकता है, हेतु से अर्थ की सिद्धि नहीं हो सकती और अनुमान से भी नहीं हो सकती ॥ ९ ॥ इसके पूर्व में दिखाये गये श्लोक की युक्तियों से भी नहीं अपितु प्रत्यक्षरूप से भी बाह्य अर्थ नहीं आभासित होता है, इतना ही प्रत्यक्ष है जो नील आभासित होता है—इसे पूर्व में ही कह दिया है, अब कुछ भी अधिक कहना शेष नहीं रह जाता है। 'अपि' शब्द का अर्थ है कि अनुमान से भी इसकी सिद्धि नहीं होगी। अनुमान की भी इसमें प्रवृत्ति नहीं होती है। प्रवृत्त हो भी जाय तो भी बाह्यार्थ की सिद्धि नहीं कर सकता, यह बात दोनों सूत्रों से बतलायी जाती है। अनुमान-विकल्प करना, और समस्त विकल्प अनुभव मूलक ही रहता है यह सर्वजन विदित ही
९६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-८-९ अनुमानम् अनुमितिव्यापारो विकल्पात्मा नैव केनचित् वादिना इष्यते । ननु भवतु प्रत्यक्षतो दृष्टेऽनुमाने संकथा इयम्, सामान्यतो दृष्टे तु किं वक्ष्यसि यथा अर्थोपलब्धया इन्द्रियानुमाने ?, उच्यते—तत्रापि विकल्पेन यथा सोऽर्थः स्पृश्यते तथा अनुमेय इति स्थितः । विकल्पश्च न इन्द्रियादिकम् अर्थं केनचित् संनिवेशविशेषात्मना स्पृशति, अपि तु किंचिदुपलब्धेः कारणम् इति अमुना स्वभावेन, स च स्वभावः कारणतालक्षणः प्रत्यक्षगृहीत एव । तथा च बीजात् अङ्कुरः तन्तुभ्यः पट इत्यादौ कार्यकारणभावः प्रत्यक्षानुपलम्भबलेन तावत् निश्चेयः । तत्र च प्रत्यक्षं प्रत्याभासं प्रामाण्यं भजते, विमर्शलक्षणस्य प्रमितिव्यापारस्य एकैकशब्दवाच्येऽर्थे विश्रान्तेः, तदनुसारित्वाच्च प्रमाणस्य इति वक्ष्यते । 'एकाभिधानविषये मितिर्वस्तुन्यबाधिता ।' इति । आभासमात्रं च सामान्यम् इति निर्णेष्यते । अनुपलम्भोऽपि अन्योपलम्भरूप आभासमात्रविश्रान्त एव—इति कारणाभासो विशेषशून्यः परिगृहीत एव बीजात् अङ्कुर इति प्रतीतो यत् यं-यं नियमम् अनुविधत्ते अव्यतिरिक्तम् तत् तस्य कार्यम्, इति प्रतिघटं मृत्तिकादिरूपस्य हेतुतद्धन्मा- त्रस्य आभासात्, साभासात् बाह्यः पुनरनाभासरूपः, स च आभासते इति विप्रतिषिद्धम् । अनाभाते च नास्ति विकल्परूपस्य अनुमानस्य व्यापारः । ग्रामगृहादेस्तु यत् बाह्यं तत् अग्रामादिरूपं न उच्यते—प्रत्येकं वाटातूपकुड्यतुलादेः बाह्यत्वप्रसङ्गात् अपि तु तत्संनिकृष्टम्, तस्मात् ग्रामबाह्यम् आभासबाह्यम् इति च शब्दसाम्यमात्रम् एतत् न वस्तुसाम्यम् । एवं ये है। इसलिए जिसका पूर्व में आभास नहीं हुआ है उसमें अनुमान जो अनुमिति का व्यापार है उसका विकल्परूप किसी भी वादी को इष्ट नहीं है, भले ही प्रत्यक्ष से दृष्ट अनुमान के रहने पर हो, किन्तु सामान्यतो दृष्ट में क्या कहोगे, जैसा कि अर्थ उपलब्धि से इन्द्रियों के अनुमान में ? उत्तर देते हैं—सविकल्प और निर्विकल्प का प्रत्यक्ष में भी विकल्प से जैसा अर्थ आभासित होता है वैसा ही अनुमेय भी होता है और विकल्प किसी संनिवेश विशेष से इन्द्रियादि पदार्थ को नहीं स्पर्श [ प्रकाशित ] करता है, अपि तु किंचित् उपलब्धि के कारण इन्द्रियाँ हैं इसी कारण से, और वह स्वभाव प्रत्यक्ष से ही गृहीत होता है । वैसा ही बीज से अंकुर और तन्तु से पट इत्यादि में कार्य- कारणभाव प्रत्यक्ष और अनुपलब्भ से निश्चय होता है । और प्रत्यक्ष तो सभी आभास में प्रमाण होता है, विमर्शरूप जो प्रमा का व्यापार है उसके अभिधेय अर्थ में भासित होता है, और तदनुसार प्रमाण कहेंगे । 'एकाभिधानविषये मितिर्वस्तुन्यबाधिता' और आभास मात्र को सामान्य रूप से निर्णय करेंगे । अनुपलब्भ को भी अन्य उपलम्भरूप आभासमात्र में ही विश्रान्त रहेगा, जिसके रहने पर जो नियम से होता है वही उसका कार्य माना जाता है जैसा कि मिट्टी से घट और बीज से अंकुररूप, प्रत्येक घट में मिट्टी का आभास रहता है उसी का हेतुरूप से आभास होता है, जब आभास सहित होने के कारण बाह्य अनाभास रूप है और भासित होता है यह तो परस्पर विरुद्ध है । जब अनाभास होनेसे विकल्परूप अनुमान का व्यापार नहीं बन सकता । ग्राम, गृहादि से जो वस्तु बाह्य है उसे अग्राम, गृहादिरूप नहीं कहा जाता है यदि बाह्यरूप माना जाय, तो फिर प्रत्येक देश में रहनेवाले भित्तिका अर्थात् दीवाल, तुलादि को भी बाह्य रखना होगा । अपितु उसके भीतर की ही बात कही जाती है ग्राम के बाहर होने पर भी ग्राम की ही ये वस्तुएँ हैं ओर यह व्यवहार देखा भी जाता है, इसलिए ग्राम से बाह्य और आभास बाह्य मात्र एक कथन ही है वस्तु साम्य नहीं है अर्थात् इसमें दूसरा कोई अभिप्राय नहीं है । एवं विकल्प में वस्तु
अ.-१, आ.-५, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९७ विकल्पे वस्तु न आभाति इति मन्यन्ते तेषामपि तावत् अनुमानविकल्पो न बाह्ये उपपन्नः । अस्माभिस्तु उपपादितम्—अध्यवसायस्यापि आभासमानविषयत्वम् 'भ्रान्तित्वे चावसायस्य' इति सूत्रे । तेन अनुमानविकल्पात्मनापि प्रकाशेन यदि अनाविष्टो नीलादिः अर्थः तत् न अनुमित एव स्यात् । अथ आविष्ट एव, तर्हि 'प्रागिवार्थोऽप्रकाशः स्यात्' इति न्यायेन प्रकाशमात्रस्वभाव एव, न बाह्यः । तेन बाह्ये साध्ये यत् किंचित् प्रमाणम् आनीयते, तदबाह्यतामेव प्रत्युत प्रसाधयति इति विरुद्धमेव, अत एव आह 'कथंचन' इति, केनापि प्रकारेण प्रत्यक्षात्मना अनु- मेयात्मना वा आभासनम् आभासो बाह्यस्य अनाभासस्य न कदाचित् अभूत् इति, तस्मात् सिद्धम् 'चिदात्मैव हि देव' इति ॥ ८-९ ॥ ननु अन्तःस्थितं बहिः प्रकाशयेदित्युकतं तत् अन्तःस्थितत्वम् उपपादनीयम् इति आशङ्क्य आह— स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य भावजातस्य भासनम् । अस्त्येव न विना तस्मादिच्छामर्शः प्रवर्तते ॥ १० ॥ आभासित नहीं होती है ऐसा जो बौद्ध मानते हैं, उनका भी अनुमान विकल्प बाह्य में नहीं हो सकता । किन्तु हमने तो इसका 'भ्रान्तित्वे चावसायस्य' सूत्र में प्रतिपादन कर दिया है [ 'भ्रान्तित्वे' यह उपलक्षण है, इसलिए 'भासयेच्च स्वकालेऽर्थात्' इत्यादि से कहा है और 'केवलं भिन्नसंवेद्यः' इत्यादि में कहेंगे ] इसलिए अनुमान विकल्परूप प्रकाश से यदि नीलादि अर्थ आविष्ट नहीं है तो उसका अनुमान नहीं बनेगा; यदि कहो कि आविष्ट है तो 'प्रागिवार्थोऽप्रकाशः स्यात्' इस युक्ति से प्रकाशमात्र स्वभाव ही होगा, बाह्य नहीं है । बाह्य साध्य में जो कुछ प्रमाण ले आयेंगे वह तो अबाह्यत्व को ही सिद्ध करेगा इसमें तो आपको विरुद्ध ही दिखायी पड़ेगा, इसलिए कहते हैं 'कथंचन' किसी प्रकार भी प्रत्यक्षरूप से, अनुमेयरूप से आभासन वा आभास का अनाभास कभी भी नहीं हुआ, इसलिए 'चिदात्मैव हि देवः' चिदात्मा ही देव है—यह सिद्ध हुआ ॥ ८-९ ॥ अब इस पर प्रश्न करते हैं कि अन्तःकरण में अवस्थित रहे हुए का ही बाहर में प्रकाश होता है ऐसा जो कहा गया है उसे ही सिद्ध करना है [ यदि चिदात्मा देव में रहनेवाली पदार्थ राशि है तो फिर क्यों नहीं भासित होती है इसे युक्ति द्वारा साधते हैं ] इस तरह आशंका कर कहते हैं— चिदात्मा देव में रहनेवाले ही अर्थ-समूह भासित होते हैं । इसलिए उनमें अर्थराशि तो रहतो है किन्तु इच्छा के बिना परामर्श नहीं हो सकता है ॥ १० ॥ १. संवेदन ज्ञान के भीतर बाह्य अर्थ का प्रतिबिम्ब रहता है प्रतिबिम्बरूप आभास का उत्थापक है अर्थात् अन्तःकरण में ज्ञान का आभास तभी रहता है जब बाहर में पदार्थ विद्यमान रहता है इसमें कोई प्रमाण नहीं है इससे सिद्ध होता है कि चिदात्मा देव ही सब कुछ है बाह्यरूप कुछ भी नहीं है । २. बाहर में अवभासित होनेवाले पदार्थ समूह का अवभासन केवल इदन्तारूप से ही होना यह सकल लोक में प्रसिद्ध नहीं है जब कि भगवान् महेश्वर में अन्तःस्थितरूप से भी अवभासन रहता ही है, और बाहर में इदन्ता का उल्लास न होने कारण अहन्तारूप से अन्तर में नहीं है यह भी बात नहीं है अपितु अन्तर में सदैव आभास बना ही रहता है । ३. इसका यह आशय है कि चिदात्मा ईश्वर का जैसे अभेद में आभास होता है वैसे ही समस्त अर्थों में १३
९८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१० बहीरूपतयापि आभासने अन्तरूपता न त्रुट्यति 'प्रमात्रैकात्म्यमान्तर्यम्' इति हि वक्ष्यते, तच्च सदैव प्रकाशस्य प्रमातृत्वात्, तदात्मतया च विना प्रकाशमानस्य अवस्तुत्वात्, किं तु तत्र अहम् इति उचिते परामर्शे योऽयम् इदन्तापरामर्शः सैव बाह्यता, तच्च इह अन्तःस्थितत्वम् अह मित्येतावता चित्समुचितेनैव वपुषा परामर्शनम्, तच्च इह नीलादीनामस्त्येव, न तु नास्तिइति, यदि हि न स्यात् कुम्भकृतो 'घटं करवाणि' इति य उत्तरक्रियापेक्षया इच्छाशब्दवाच्यः परामर्शः एषणीयात्मना, स परामृश्येन अनियन्त्रितः चेत् ततः पटेच्छापि सा न कस्माद्इति संकीर्येरन् व्यवहाराः । अथ तत्रापि च एषणीयः तदानीमेव निर्मितः सम् तथा जातः, तर्हि तन्निर्माणं चिदा- त्मनि विनेच्छया नोपपन्नम् इति । 'तिष्ठासोरेवमिच्छैव हेतुता ।' इत्यत्र वर्णयिष्यते । ततश्च इच्छान्तरमपि विषयनियन्त्रितं ? न वा ? इति विकल्पेनानवस्था । विषयनियन्त्रितं चेत् स्यात् आत्मतैव जाता, न चेत् घटे पटेच्छा स्यात् । अथ तत्रापि तदानीमेव इति कृत्वा अनवस्था, तस्मात् सर्वोऽयं भावराशिः चिदात्मनि अहम् इत्येव वपुषा सततावभासुरवपुः ऐश्वर्यरूपाच्च स्वातन्त्र्य- लक्षणात् स्वामिभावात् विचित्रेण वपुषा क्रमाक्रमाविना संवित् एनं बहिष्करोति प्रमातृभेदप्रथन- पदार्थराशि बाहर रूप से प्रकाशित होने पर भी उसका भीतर रहना बना रहता है खण्डित नहीं होता है 'प्रमात्रैकात्म्यमान्तर्यम्' क्योंकि ऐसा आगे कहा जायेगा और वह भीतरी प्रकाश सदैव बाहर में भी प्रकाशित होता रहता है प्रमातारूप होने के कारण और उसके बिना प्रकाशमान न होने से अवस्तु हो जायेगी किन्तु 'अहं' इस समुचित परामर्श में जो यह इदन्ता परामर्श है उसी का नाम बाह्यरूपता है और यहाँ पर भीतर रहनेवाले 'अहम्' इस शब्द से समुचितरूप में परामर्श करना इतना ही माना जाता है वह नीलादि भाव-पदार्थों में रहता ही है, नहीं रहता है, ऐसी बात नहीं है, यदि वह न रहे तो कुम्भकार 'घटं करवाणि' द्वारा घट का निर्माण होना, मैं आज घट बनाऊँगा ऐसी आगे की क्रिया को लेकर इच्छा शब्द से कहे जानेवाला परामृश्यमान जो घट है उससे नियन्त्रित नहीं होगा, तब तो अन्तर में स्थित परामर्श को पट इच्छा क्यों न मानी जाय ? इस प्रकार सारा व्यवहार संकीर्ण होकर आपस में मिल जायेगा । अब कहो कि उस समय जो इच्छा का विषय है वह उसी समय उत्पन्न होगा, तब तो चिदात्मा में बिना इच्छा से कोई वस्तु-पदार्थ का निर्माण ही सिद्ध नहीं हो सकेगा 'तिष्ठासोरेवमिच्छेव हेतुता ।' इसका वर्णन किया जायेगा और इससे दूसरी इच्छा भी परामृश्यविषय से नियन्त्रित रहेगी ? या नहीं रहेगी ? ऐसा विकल्प करते करते अनवस्था हो जायेगी । यदि विषय से सम्बद्धता रखती है तो आत्मस्वरूप ही हो गया, यदि घट में पट इच्छा न हो तो दूसरी इच्छा में भी इसी ढङ्ग से अनवस्था हो जायेगी, इसलिए समस्त पदार्थराशि अहँरूप चिदात्मा में निरन्तर भासित होते रहना उसका स्वरूप नहीं है और ऐश्वर्यरूप से, स्वातन्त्र्यरूप से, स्वामी होने से, चित्र विचित्ररूप कार्य-कारणभाव के क्रम से अथवा अक्रम से संवित् ज्ञान ही इस पदार्थ राशि को बाहर की ओर प्रकाशित करता है, प्रमातृभेद के विस्तार के साथ, उसमें भी कहीं पर आभास में प्रमातृवर्ग को एक कर देता है । जैसे नृत्य करनेवाली नर्तकी अपनी भावभङ्गी से भी अभेद पूर्वक ही आभास होता है—अर्थात् अपने स्वरूप में पदार्थों का भी अभिन्नरूप से ही प्रकाश है, नहीं तो भासमान होनेवाले अर्थरूपी विषय प्रमाता का इच्छारूप विमर्श नहीं हो सकता है ।
अ.-१, आ.-५, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९९ पूर्वकम्, तत्रापि केचित् आभासे प्रमातॄन् एकीकरोति नितम्बिनीनृत्त इव प्रेक्षकान् । तावति हि तेषाम् आभासे ऐक्यम् । शरीरप्राणबुद्धिसुखाद्याभासांशेषु तु भेदस्य अविगलनात् न सर्वथा ऐक्यम् । अत एव प्रतिक्षणं प्रमातृसंयोजनावियोजनावैचित्र्येण परमेश्वरो विश्वं सृष्टिसंहारादिना प्रपञ्चयति । तदुक्तमाचार्येण—‘सदा सृष्टिविनोदाय सदा स्थितिसुखासिने । सदा त्रिभुवनाहार- तृप्ताय भवते नमः ॥’ इत्यादि । श्रीभट्टनारायणेनापि—‘मुहुर्मुहुरविश्रान्तस्त्रैलोक्यं कल्पनाशतैः । कल्पयन्नपि कोऽप्येको निर्विकल्पो जयत्यजः ॥’ इति । तस्मात् स्थितम् अन्तःस्थितं भावजातं— तेन विना तद्विषयस्य परामर्शस्य अयोगात् इति ॥ १० ॥ प्रेक्षकवर्ग की दृष्टि को अपनी ओर एक सी कर देती है । उतने अंश में ही उनके आभास में ऐक्य रहता है । शरीर, प्राण, बुद्धि और सुखादि का आभास के भागों में भेद न टूटने से सर्वथा ऐक्य नहीं होता है । इसलिए परमेश्वर प्रतिक्षण प्रतिपल प्रमाताओं के संयोजन [मलप्रेक्षादि में ] वियोजन [ अन्यत्र ] की विचित्रता से सारे विश्वको सृष्टि, स्थिति, संहार-प्रलयादि द्वारा प्रपञ्चित किया करते हैं । आचार्यपाद ने भी कहा है—‘सदा-सर्वदा विनोदरूपी सृष्टिकारनेवाले सदा सुखार्थ स्थितिरखनेवाले उसे अपने में लय करके परितृप्त हो जानेवाले ऐसे आपको नमस्कार हो ।’ इस प्रकार श्री भट्टनारायण ने भी कहा है—‘सैकड़ों कल्पनाओं से तीनों लोकों की बारम्बार कल्पना करते हुए भी विश्रान्ति लेनेवाले कोई एक निर्विकल्प अज की जय हो ।’ इसलिए मानना पड़ेगा कि चिदात्मा के भीतर पदार्थ समूह रहता है उनकी इच्छा के बिना परामर्श नहीं हो सकता ॥ १० ॥
१. आशय यह है कि सर्वशक्तिसम्पन्न शिवत्व का विभाग अवस्था में भी वैसा ही स्वरूप रहता है जैसा कि नर्तकी का नृत्याभास प्रेक्षकगण की दृष्टि को एक ही साथ अपने अभिमुख एकत्रित कर लेने में होता है । श्रीसोमानन्दपादने शिवदृष्टि शास्त्र में सर्वत्र शक्ति पञ्चक स्वभाव का उपसंहार करते हुए कहा है— ‘एवं न जातुचित्तस्य वियोगस्त्रितयात्मना । शक्त्या निर्वृतचित्तस्य तद्भागाविभागयोः ॥’ तथा च स्फुटमेव तेनैव प्रत्यभिज्ञापितम्, यथा । ‘यदा तु तस्य चिद्धर्मप्रभावामोदजृम्भया ॥ विचित्ररचना नानाकार्यसृष्टिप्रवर्तने । भवत्युन्मुखिता चित्ता सेच्छायाः प्रथमा तुटिः ॥’ इत्यस्य प्रस्तावे सा च दृष्ट्या हृदुद्देशे कार्यस्मरणकालतः । प्रहर्षवेगसमये दरसन्दर्शनक्षणे ॥ अनालोचनतो दृष्टे विसर्गप्रसरास्पदे । विसर्गोक्ति प्रसङ्गे च वाचने धावने तथा ॥ एतेष्वेवप्रसङ्गेषु सर्वशक्तिविलोलता । इति ।
१०० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-११ ननु परामर्शो नाम विकल्पः, स च अविकल्पशुद्धसंविद्वपुषि भगवति कथं स्यात् इत्याश- ङ्क्याह— स्वभावमवभासस्य विमर्शं¹ विदुरन्यथा । प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि² स्फटिकादिजडोपमः ॥ ११ ॥ 'एकोऽहं बहुस्याम्' भीतर रहता है तभी इच्छा होती है अन्यथा इच्छा ही नहीं होगी । इस पर कहते हैं कि परामर्श का नाम इच्छा है और वह इच्छा वेद्य की अपेक्षा रखती है । उस विशुद्ध, अविकल्प, संवित्स्वरूप भगवान् में कैसे होगी—ऐसी आशङ्का उठाकर उत्तर में कहते हैं— इस प्रकार इच्छा, ज्ञान और क्रियारूप शक्ति से जिसका कभी भी वियोग नहीं होता, चिद्रूप की स्थिति अन्तर में एवं बाहर में एक सी ही रहती है । विभाग में जैसी शक्तिपञ्चक की स्थिति रहती है वैसा ही कहना चाहिए—इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं— शुद्ध बोधरूप शिवतत्त्व में शक्तिपञ्चक के ऐक्यभाव का समर्थन कर देने पर और उस प्रसङ्ग के माध्यम से अपर अवस्था में भी चिद्रूप की वैसी ही चिदानन्दमय स्थिति अवस्थित रहती है । शक्तिरूप अवस्था जो परा-अपरा हैं उसमें भी इच्छादि पाँच निहित ही हैं यहाँ इससे द्योतित हो रहा है । चिद्रूप शिवभट्टारक का जो धर्म-स्वभाव है वही तो पञ्चविधकृत्य विभव है जो कि सृष्टि, स्थिति, प्रलय अनुग्रहादि करते रहते हैं । आमोद-प्रमोदरूप तथा स्वरूप परामर्शरूप से चिद्रूप का विकास होता है । अनेक प्रकार की सृष्टिकार्य की रचना में निरन्तर चिद्रूप की ही तो उन्मुखता झलकती है तब वह त्रुटि सूक्ष्म काल से परिच्छिन्न होनेवाली इच्छा-शक्ति की प्रथम अवस्था कही जाती है । वह सूक्ष्म उन्मुख-शक्ति हृदयस्थल में, कार्य के स्मरणकाल में तथा हर्ष के हेतुभूत पुत्रादि के जन्म समय में, भय के प्रथम क्षण में, अकस्मात् किसी को देख लेने पर, धातु के विसर्ग अवस्था के अन्त में तथा विसर्जनीय भाषण के प्रसङ्ग में, त्वरित गति से ग्रन्थ के पठन काल में और दौड़ने में इन्हीं प्रसङ्गों में पूर्वोक्त क्रम से भी शक्तियों की विलोलता अतिसूक्ष्म भावरूपता देखने में आती है स्पन्दन शास्त्र में भी कहा है— अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोति वा मृशन् । धावन्वा यत्पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ इति । अत्यधिक क्रोध को चरम अवस्था पर पहुँचा हुआ अथवा प्रहर्ष की पराकाष्ठा पर पहुँचा हुआ [ अकस्मात् किसी कारण से मैं क्या करूँ ? ] इस किं कर्तव्य विमूढता की स्थिति में पड़ा हुआ व्यक्ति जिस भी अवस्था में प्रविष्ट होता है उसी में स्पन्दता की झलक देखता है । १. जिन्होंने अपने स्वभाव परामर्श को प्राप्त कर लिया है वे ही विमर्श को अच्छी तरह जानते हैं । विमर्श 'अहम्' ऐसा असांकेतिक, स्वातन्त्र्यरूप, आत्मविश्रान्ति स्वभाववाला है, वेदवेत्ता लोग इन मन्त्रशरीर, श्रीमातृका, श्रीमालिनीयादि तत्त्व को मानते हैं । २. प्रकाश का मुख्य रूप प्रत्यवमर्श है, उसके बिना अर्थभेद मात्र स्वच्छ ही रहता है किन्तु चेतनता नहीं रहती, क्योंकि चमत्कार का अभाव उसमें होता है ।
अ.-१, आ.-५, का.-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०१ इह अवभासस्य प्रकाशस्य, अनवभासस्य च प्रकाशस्य घटादेः परस्परपरिहारेण द्वयोः स्वात्मनि चेत् व्यवस्थानं, तत् घटपटयोः इव इदमजडम् इदं जडम् इति दुरुपपादं वैलक्षण्यम् । अथ अवभासो यतोऽर्थस्य सम्बन्धी, ततो नाजडः, र्तार्ह सम्बन्धमात्रेण मृत् अपि घटस्य इति अजडा स्यात् । अथ न स्वसम्बन्धमात्रम् अपि तु अवभासोऽर्थस्य प्रकाशः, र्तार्ह अर्थात्मना स प्रकाश इति समापतितम् । न च अन्यात्मना अन्यस्य प्रकाश उपपन्नः । अथ अन्यस्वभावोऽपि घटोऽवभासस्य कारणम्, र्तार्ह अवभासोऽपि घटस्य कारणम् इति घटोऽपि अजडः स्यात् । अथ अन्येनापि सता घटेन यतोऽवभासस्य प्रतिबिम्बरूपा च्छाया दत्ता, ताम् असौ अवभासो बिभ्रत् घटस्य इति उच्यते, ततश्च अजडः, र्तार्ह स्फटिकसलिलमुकुरादिः अपि एवंभूत एव, इति अजड एव स्यात् । अथ तथा- भूतर्माप आत्मानं तं च घटादिकं स्फटिकादिः न पराम्रष्टुं समर्थ इति जडः, तथा परामर्शनमेव अजाड्यजीवितम् अन्तर्बहिष्करणस्वातन्त्र्यस्वरूपं स्वाभाविकम् अवभासस्य स्वात्मविश्रान्ति- लक्षणम् अनन्यमुखप्रेक्षितवं नाम । 'अहमेवं प्रकाशात्मा प्रकाशे' इति हि विमर्शोदये स्वसंविदेव प्रमातृप्रमेयप्रमाणादि चरितार्थम् अभिमन्यते न तु अतिरिक्तं काङ्क्षति, स्फटिकादि हि गृहीतप्रति- बिम्बमपि तथाभावेन सिद्धौ प्रमात्रन्तरम् अपेक्षते, इति निर्विमर्शत्वात् जडम् । सर्वं तु वस्तुतो अवभास का स्वभाव ही विमर्श है । स्वरूप परामर्श करनेवाले ही इसको जानते हैं और तत्त्ववेत्तालोग विमर्श को अहम्, असांकेतिक, स्वातन्त्र्यरूप, आत्मविश्रान्तिरूप, ज्ञाता, कहते हैं । अन्यथा अर्थ से उपरक्त रहने पर भी विमर्श से शून्य प्रकाश स्फटिकादि के तुल्य जड हो जायेगा ॥ ११ ॥ अवभासरूप प्रकाश का और अनवभासरूप अप्रकाश घटादि का परस्पर परिहार हो जाने से [ प्रकाश और घट ] इन दोनों का अपने में परिनिष्ठित स्वरूप मानोगे तो यह जड है एवं यह अजड-चेतन है इस प्रकार चेतन और जड के भेद का पता ही नहीं चलेगा । अब यदि दूसरे पक्ष में कहो कि अवभास पदार्थ सम्बन्धी है और सम्बन्धी होने के कारण जड उसे नहीं मानोगे, तब तो मिट्टी भी घट का सम्बन्धी होने से जड नहीं होगी । इसलिए यह कहना पड़ेगा कि केवल सम्बन्ध मात्र नहीं है अपितु अर्थ के प्रकाश का नाम अवभास है, तब तो फिर वही बात आ गयी जो अर्थरूप से प्रकाश होता है और घट का अन्यरूप से प्रकाश उपपन्न नहीं हुआ । प्रकाश से भिन्न स्वभाववाला भी घट अवभास का कारण होता है, तब तो अवभास भी घट का कारण हुआ इस तरह घट भी अजड चेतनरूप हो जायेगा और प्रकाश का सम्बन्धी होने के कारण अजड- चेतनरूप हो हो जाये, अब कहो कि प्रतिबिम्ब को ग्रहण करनेवाला स्फटिकादि अपने को' परामर्श करने में समर्थ नहीं हो सकता है इसलिए वह चेतन नहीं है, इससे यह सिद्ध होता है कि परामर्शन ही चेतनता का जीवन है, भीतर में और बाहर में स्वतन्त्र स्वाभाविक, अवभास का स्वात्म- विश्रान्तिरूप किसी अन्य की अपेक्षा न रखनेवाला है इसी को स्वात्मपरामर्श कहा जाता है । 'अहमेव प्रकाशात्मा प्रकाशे' मैं ही प्रकाशरूप में प्रकाशित हो रहा हूँ इस विमर्श के उदय होने पर अपना संवित् ही प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयादि को ठीक-ठीक मानते हैं उससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहते हैं और स्फटिकादि तो प्रतिबिम्ब ग्रहण करने पर भी वैसा अपने को सिद्ध करने में अन्य प्रमाता की अपेक्षा रखता है, अतः विमर्श से रहित होना जड ही है, वस्तुतः यह सब
१०२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१२ विमर्शात्मकप्रमातृस्वभावतादात्म्याहंपरामर्शविश्रान्तेः अजडमेव पूर्वापरकोट्योः । यदुक्तम्— 'इदमित्यस्य विच्छिन्नविमर्शस्य कृतार्थता । या स्वस्वरूपे विश्रान्तिविमर्शः सोऽहमित्ययम् ॥' इति । मध्यावस्थैव तु इदन्ताविमृश्यमानपूर्वापरकोटिः, विमूढानां मायापदं संसारः, इति विमर्श एव प्रधानं भगवत इति स्थितम् ॥ ११ ॥ न केवलं संवित्तत्त्वस्य अस्माभिः एव विमर्शप्राधान्यम् उक्तम् यावत् आगमान्तरैरपि इति दर्शयति— आत्मात एव चैतन्यं चित्क्रिया चित्कर्तृता । तात्पर्येणोदितस्तेन जडात्स हि विलक्षणः ॥ १२ ॥ यतो विमर्श एव प्रधानम् आत्मनो रूपम् अमुमेव हेतुं प्रयोजनरूपम् उद्दिश्य आत्मा धर्मि- स्वभावो द्रव्यभूतोऽपि, चैतन्यम् इति धर्मवाचिना शब्देन सामानाधिकरण्यम् आश्रित्य उदितः कथितः, भगवता शिवसूत्रेषु 'चैतन्यमात्मा' ( १-१ ) इति पठितम्, चैतन्यम् इति हि धर्मवाच- कुछ विमर्शरूप प्रमाता है उसका तादात्म्यरूप अहंपरामर्श में विश्रान्त हो जाने के कारण वह तो आगे या पीछे सर्वदा अजड-चेतनरूप ही रहता है । इस विषय में कहा भी है— इदम् यह परिच्छिन्न-भिन्न विमर्श को सफलता तभी होती है जबकि अपने स्वरूप में अहं इस रूप से विमर्श करता हुआ विश्राम लेता हो । वही मायीयरूप में जब आता है तभी इदन्ता के आगे-पीछे कोटिवाला विमूढा को माया पद में रहनेवाले संसारी कहा जाता है, इसलिए विमर्श ही भगवान् का प्रधानरूप है यह सिद्ध हुआ ॥ ११ ॥ केवल हम लोगों ने ही संवित्तत्त्व ज्ञान को विमर्शमय नहीं माना है अपितु हमारे साथ- साथ आगम शास्त्रों [ पातंजलन्यायादि ] ने भी माना है, इसे दिखाते हैं— इसलिए आत्मा चैतन्य है चित्तत्त्व क्रिया भी चेतन कर्तावाली होती है । इसी कारण जड से वह चेतन आत्मा एक विलक्षण पदार्थ है ॥ १२ ॥ क्योंकि आत्मा चेतन का प्रधानरूप तो विमर्श ही है इसी को हेतु मानकर आत्मा को धर्मी स्वरूप, द्रव्यरूप, चैतन्य माना जाता है, आत्मा के साथ चैतन्य का सामानाधिकरण्य रूप से उपादान किया है, शिवसूत्र में भगवान् सदाशिव ने भी 'चैतन्यमात्मा' ( १-१ ) चैतन्य को १. पूर्व-अपर कोटि में तो एक विशुद्ध शिवरूपता ही सभी के लिए रहती है इसी का श्रीसोमानन्दपाद ने भी निर्देश किया है— न परं तदवस्थायां व्यवस्थैषा व्यवस्थिता । यावत्समप्रज्ञानाग्र ज्ञातृस्पर्शदशास्वपि ॥ स्थितेव लक्ष्यते सा च तद्विश्रान्त्या तथा फले । इति । वह व्यवस्था उस परमशिवरूप अवस्था में व्यवस्थित होकर रहती है कि उसमें दूसरा कोई नहीं रहता, जैसे सभी ज्ञानों का प्रारम्भ से लेकर वैसा ही फल की परिसमाप्ति तक उसी में विश्रान्त होकर रहता है, उसकी विश्रान्ति के बिना अर्थ का बोध ही नहीं होता, अनेक प्रकार से ज्ञानों की समग्रता मध्य अवस्था में प्रत्यगात्मा के कारण ही लक्षित होती है ।
अ.-१, आ.-५, का.-१२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०३ कोपलक्षणम्, 'चितिशक्तिरपरिणामिनी' '……तद्दृशेः कैवल्यम्।' ( यो० सू० २-२५ ) 'द्रष्टा दृशि- मात्रः………' (यो० सू० २-२०) इत्यादौ अपि हि धर्मशब्देन सामानाधिकरण्यम् आत्मनो दर्शितं गुरुणा अनन्तेन । द्रव्यं हि तत् उच्यते—यद्विश्रान्तः पदार्थवर्गः सर्वो भाति च अर्थ्यते च अर्थ- क्रियायै, तत् यदि न कुप्यते तत् सकलोऽयं तत्त्वभूतभावभुवनसंभारः संविदि विश्रान्तः तथा भवति इति । स एव गुणकर्मादिधर्माश्रयभूतपदार्थान्तरस्वभावः तामेव मुख्यद्रव्यरूपाम् आश्रयते इति सैव द्रव्यम्, तत् अनन्तधर्मराशिविश्रमभित्तिभूतायाः तस्याः स एव धर्मः चैतन्यम् इति कर्तृकृदन्तात् उत्पन्नेन भावप्रत्ययेन सम्बन्धाभिधायिनापि प्राधान्येन दर्शितः, तथाहि सम्बन्धस्य सम्बन्धि- विश्रान्तस्य प्रतीतेः, द्रव्यरूपस्य च सम्बन्धिनः प्रकृत्या उक्तत्वात् चितिक्रियारूपं धर्मं सम्बद्धम् अवगमयता ष्यञा निष्कृष्ट एव अंशः प्रत्यायितो भवति । चितिक्रिया च चितो कर्तृता, स्वातन्त्र्यं संयोजनवियोजनानुसंधानादिरूपम् आत्ममात्रतायामेव जडवत् अविश्रान्तत्वम् अपरिच्छिन्नप्रकाश- सारत्वम् अनन्यमुखप्रेक्षित्वम् इति, तदेव अनात्मरूपात् जडात् संयोजनवियोजनादिस्वातन्त्र्य- विकलात् बैलक्षण्यादायि इति, तदेव परत्वेन प्रधानतया अभिसन्धाय, आत्मा चेतन इति वक्तव्ये धर्मान्तराधरीकरणाय विमर्शधर्मोद्धुरीकरणाय च 'आत्मा चैतन्यम्' इत्युक्तम् । चितिक्रिया चिति- आत्मतत्त्व कहा हुआ है, क्योंकि चैतन्य धर्मवाचक का उपलक्षण है, 'चितिशक्तिरपरिणामिनी' एक रूप में ही चिति-शक्ति रहती है। पातञ्जलयोग सूत्र भी ' …'तद्दृशेः कैवल्यम्'। ( २-२५ ) वही द्रष्टा का कैवल्य है और द्रष्टा ज्ञानरूप है 'द्रष्टा दृशिमात्रः……' ( २-२०) महर्षि श्री पतञ्जलि ने भी धर्म शब्द से आत्मा का सामानाधिकरण्य दिखलाया है। वही द्रव्य कहा जाता है जो सभी सिद्ध पदार्थ अर्थक्रिया करने के लिए ही भासित होता है और चाहा जाता है, यदि वह विश्रान्त नहीं होता हो तो ये जो कुछ भावपदार्थ हैं वे सम्पूर्ण जाकर उसी प्रकार संवित् ज्ञान में ही आश्रय पाते हैं। वही तत्त्वादि गुण कर्मादि का आश्रयभूत जितने अन्यपदार्थ हैं वे सभी मुख्य द्रव्यरूप संवित् ज्ञान में ही आश्रय लेते हैं, इसीलिए संवित् ही द्रव्य है, अनन्तधर्मराशि का आश्रय बनी हुई—संवित् ज्ञान का ही धर्म चैतन्य है, 'चेतनस्य भावः चैतन्यम्' चेतन शब्द कर्तारूप कृदन्त है उससे भाव अर्थ में 'ष्यञ्' प्रत्यय करके सम्बन्ध बताने- वाला चैतन्य बन जाता है, क्योंकि सम्बन्ध का सम्बन्धी में 'चित्क्रिया चेतनस्य' विश्रान्तिरूप से प्रतीति होती है और द्रव्यरूप सम्बन्धी चेतन की प्रकृति से कहा गया, चिति क्रियारूपधर्म चेतन में सम्बद्ध है यही 'ष्यञ्' प्रत्यय से ज्ञापित होता है और चितिक्रिया चेतन की कर्तृता है, संयोजन- वियोजन अनुसन्धानरूप स्वातन्त्र्य से रहित है, स्वातन्त्र्य कर्तृता-शक्ति से शून्य अन्य की अपेक्षा रखनेवाला जड होता है, 'यथा स्वात्मभाग-निष्ठः संयोजन-वियोजनादि स्वातन्त्र्य रहितः नैवमात्मा इत्यर्थः' अपने में सीमित मात्र रहनेवाला होने के कारण आत्मा नहीं है, आत्मा तो अनात्मरूप जड से विलक्षण होता है, चेतन को प्रधान मान करके 'आत्मा चैतन्यम्' ऐसा जहाँ पर बोलना चाहिए वहाँ पर धर्मान्तर नित्यत्वादि को दबा करके विमर्शरूप धर्म का उद्धार करने के लिए 'आत्मा चैतन्यम्' ऐसा कहा गया है। चेतन की क्रिया में चेतन आत्मा कर्ता रहता है इसी कारण १. इस प्रकार परम संवित् क स्वातन्त्र्य-शक्ति से युक्त होकर ही यह विधि ठीक बैठती है। इसकी बहुत सो शक्तियाँ भी उस संवित्-शक्ति से अवियुक्त होकर प्रकाश करती हैं।
१०४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१३ कर्तृता तात्पर्य्येण इति समासः अर्धयुक्त पादविश्रान्तिः इति हि काव्ये समयः, न शास्त्रे । यदि वा चित् क्रिया आत्मा उदितः, चितिकर्तृता च, इति पृथगेव । एवं तु न क्वचित् पठितम् ॥ १२ ॥ ननु यथा प्रकाशोऽप्रकाशश्च इति उभयमपि स्वात्मनि, ततश्च प्रकाश इति उक्ते जडात् न वैलक्षण्यम् उदितं स्यात्, तद्वत् विमर्शोऽपि अविमर्शोऽपि च स्वात्मनि, इति तेनापि कथं वैलक्षण्यं जड/जडयोः इत्याशङ्क्याह— चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परा वाक्स्वरसोदिता । स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ॥ १३ ॥ चेतयति इत्यत्र या चितिः चितिक्रिया तस्याः प्रत्यवमर्शः स्वात्मचमत्कारलक्षण आत्मा स्वभावः, तथाहि—घटेन स्वात्मनि न चमत्क्रियते स्वात्मा न परामृश्यते न स्वात्मनि तेन प्रका- श्यते न अपरिच्छिन्नतया भास्यते ततो न चेतयत इति उच्यते । चैत्रेण तु स्वात्मनि अहमिति संरम्भोद्योगोल्लासविभूतियोगात् चमत्क्रियते, स्वात्मा परामृश्यते स्वात्मन्येव प्रकाश्यते, इवमिति यः परिच्छेद एतावद्रूपतया तद्विलक्षणोभावेन नील-पीत-सुख-दुःख-तच्छून्यताद्यसंख्यावभासयोगेन इसकी आधे पाद में ही पाद की विश्रान्ति की हुई है काव्यशास्त्र में तो यह नियम चलता भी है किन्तु आगमशास्त्रादि में ऐसा नियम नहीं है एवं ऐसा होना भी चाहिए । अथवा चित् क्रिया को ही आत्मा कहा हो और चिति का कर्तृत्व भी आत्मा में रख दिया हो यह तो कहीं पर भी नहीं पढ़ा गया है । भिन्न रूप से भी जहाँ पर पढ़ा है वहाँ पर 'आत्मा चैतन्यम्' और चिति कर्तृता इसी रूप में पढ़ा गया है ॥ १२ ॥ 'ननु' कहकर शंका करते हैं। यदि प्रकाश और अप्रकाश ये दोनों भी आत्मा में ही रहते हैं और आत्मा में रहने के कारण प्रकाश ऐसा मात्र कहने पर जड से विलक्षण कुछ भी नहीं उदित होता है, उसी प्रकार विमर्श और अविमर्श भी तो आत्मा में ही रहते हैं, तब फिर जड ओर चेतन अजड की विलक्षणता कैसे मालूम पड़ेगी । इस प्रकार आशंका कर उत्तर में कहते हैं— चिति-चेतन जो प्रत्यवमर्शरूप है—'अहम् अस्मि' यही इसका पारमार्थिक स्वरूप है । अपने ही रस में देदीप्यमान परावाणी के रूप से रहता है । उस परमात्मा का वही मुख्य स्वातन्त्र्यरूप ऐश्वर्य है ॥ १३ ॥ 'चेतयति' इस क्रिया में, जो चिति (जानने अर्थ में क्रिया) है उसका परामर्श स्मरणरूप से करना यही इसका अपना चमत्काररूप स्वभाव है, क्योंकि घट अपने आपको प्रकाशित नहीं कर सकता अर्थात् अपरिच्छिन्नरूप में नहीं भासता है, इसी कारण घट स्वयं जानता है—ऐसे कोई नहीं बोलते हैं । चैत्र तो अपने में सर्वदा ज्ञानमय होने के कारण चमत्कृत ही रहता है, एवं अपने में ही प्रकाशित रहता है और सारे विश्व को अपने में किये रहता है । नील-पीत, सुख-दुःखादि से युक्त होकर रहना एवं कभी न रहना ये सारी बातें उसमें होती रहती हैं, १. यह परावाग्रूपता आद्य-शक्ति अभिन्नरूप से रहती है नित्य संवित् स्वरूप होने के कारण, आदि और अन्त अर्थात् उत्पत्ति और विनाश से रहित है । दूसरे परतन्त्रभाव की अपेक्षा नहीं रखनेवाली, स्वातन्त्र्य, ऐश्वर्य से परिपूर्ण रहती है ।
अ.-१, आ.-५, का.-१३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०५ आभास्यते, ततः चैत्रेण चेत्यते इति उच्यते । एवं च विमर्शः स्वात्मनि अविमर्शाऽपि स्वात्मनि इत्यसिद्धमेतत् । विमर्शी हि सर्वसहः परमपि आत्मीकरोति, आत्मानं च परीकरोति, उभयम् एकीकरोति, एकीकृतं द्वयमपि न्यग्भावयति इत्येवं-स्वभावः । प्रत्यवमर्शश्च अन्तरभिलापात्मकशब्दन- स्वभावः, तच्च शब्दनं संकेतनिरपेक्षमेव अविच्छिन्नचमत्कारात्मकम् अन्तर्मुखशिरोनिर्देशप्रख्यम् अकारादिमायीयसांकेतिकशब्दजीवितभूतं, नीलम् इदं, चैत्रोऽहम् इत्यादिप्रत्यवमर्शान्तरभित्ति- भूतत्वात्, पूर्णत्वात् परा, वक्ति विश्वम् अपलपति प्रत्यवमर्शेन इति च वाक्, अत एव सा स्वरसेन चिद्रूपतया स्वात्मविश्रान्तिवपुषा उदिता सततम् अनस्तमिता नित्या अहमित्येव, एतदेव पर- इसलिए चैत्र जानता है—ऐसा बोला जाता है। इस प्रकार इदन्ता आभास के विमर्श में अपना विमर्श और अविमर्श नहीं हो सकता है—यह बात असिद्ध है। विमर्श तो सब कुछ सहनेवाला होता है इदन्ता को भी अपना बना लेता है और अपने आप को भी देहादिरूप इदन्ता कर लेता है तथा दोनों को सदाशिव भूमि में एक भी कर लेता है एवं एक किये हुए को दो भागों में विभक्त कर देता है। एक को जाग्रत् अवस्था में बढ़ा देता है एवं दूसरे को शून्य अवस्था में दबा देता है—ऐसा स्वभाववाला है। प्रत्यवमर्श उसीको कहते हैं—जो भीतर ही भीतर जानना, और उसमें किसी का संकेत भी नहीं रहता, मैं स्वयं इन नीलादिरूप का भोक्ता हूँ— यही चमत्कार रहता है बिना बोले हुए स्वीकार कर लेने के बराबर 'अ० आ० क० ख० ग०' इत्यादि सांकेतिक शब्दों का जीवन है, यह नील है, मैं चैत्र हूँ—इत्यादि सभी परामर्शों के आश्रय होने से, और पूर्ण होने से परावाणी परामर्शरूप द्वारा सारे विश्व को देखती है, इसीलिए परावाणी कही जाती है, वह अपने आपमें स्वात्मविश्रान्तिरूप चिद्रूप से निरन्तर उदित होती रहती है। 'अहं' इस परामर्शरूप में सदैव स्फुरित रहती है। यही परमात्मा का १. “पृ पालनपूरणयोः” पालन एवं पोषण अर्थ में पढ़ी गयी “पृ” धातु से 'परा' शब्द व्युत्पन्न हुआ है। २. अनस्तमिता का अर्थ है जिसका सदा उदय है। जिसका जगत् में उदय होता देखा जाता है उसका अस्त होना निश्चित है किन्तु जिसका सदा उदय है वह कभी-भी अस्त होता ही नहीं, इसलिए सदोदित कहा जाता है। 'सदोदित' सदा उगी हुई चित्ति-शक्ति है जिसमें निरन्तर क्रिया शीलता और स्पन्द रूपता रहती है। ३. कुछ लोगों का कहना यह है कि पश्यन्ती अवस्था ही मुख्य आनन्दरूप है परा अवस्था नहीं होती, क्योंकि वह तो पररूप रहने के कारण नहीं होती है, इसी को 'एवकार' शब्द से लक्षित करता है, श्री सोमानन्दपाद ने भी इस विषय में कहा है—'विमर्श अनुभव के द्वारा यह वाग्रूपता अनुगत होती है। इस प्रकार यहाँ से प्रारम्भ कर 'ऐसी भले ही चर्चा करते रहो; जैसे पश्यन्ती अवस्था ही उपयुक्त है।' 'यो हि पश्यति पश्यन्तीं स देवः परमः शिवः ।' इत्यादि तक । 'जो लोग पश्यन्ती अवस्था को ही देखते हैं, वही देव परम शिव है। इत्यादि से भगवान् का स्वरूप शब्दरूप है—ऐसा कहा गया है। इसका भट्टनारायण ने भी उल्लेख किया है— सुगिरा चित्तहारिण्या पश्यन्त्या दृश्यमानया । जयत्युल्लासितानन्दमहिमा परमेश्वरः ॥ चित्त को आकर्षित करनेवाली दृश्यमान पश्यन्तीरूप वाग्रूपता से आनन्दकन्द महिमावाले परमेश्वर का उत्कर्ष उल्लसित होता है। १४
[१०६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१४ मात्मनो मुख्यं स्वातन्त्र्यम् ऐश्वर्यम् ईशितृत्वम् अनन्यापेक्षितवम् उच्यते । परापरं तु इदंभावरूपस्य प्रत्यवमर्शस्य अख्यातिप्राणस्य—उद्बोधमात्रेऽपि अहंभाव एव विश्रान्तेः श्रीसदाशिवादिभूमौ पश्यन्तीदशायाम् । अपरं तु इदंभावस्यैव निरूढौ मायागर्भाधिकृतानामेव विष्णुविरिश्चेन्द्रादीनाम्, तत्तु एषां परमेश्वरप्रसादजमेव इति । अन्यानिरपेक्षतैव परमार्थत आनन्दः, ऐश्वर्यं, स्वातन्त्र्यं, चैतन्यं च । तस्मात् युक्तमुक्तम्—‘········तेन जडात्स हि विलक्षणः ।' इति ॥ १३ ॥ प्रधानागमे ऽपि एतत् प्रदर्शितमेव इति निरूपयति— सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी । सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥ १४ ॥ इह घटः कस्मात् अस्ति, खपुष्पं च कस्मात् नास्ति, इति उक्ते वक्तारो भवन्ति, घटो हि मुख्य स्वातन्त्र्यरूप ऐश्वर्य एवं स्वामीपन है, जिसमें किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती है। अपने में रहना सुख-संपन्नता है और दूसरों के आधीन रहना ही दुःख-दीनता है। अपना स्वरूप नहीं भासित होना ही इदंभाव का परामर्श कहलाता है। केवल उद्बोध हो जाने पर भी सदाशिव भूमिरूप पश्यन्तीदशा में अहंभाव की विश्रान्ति हो जाती है। जब इदंभाव की अभिवृद्धि होती है तो मायागर्भ में रहनेवाले ब्रह्मा, बिष्णु आदि तथा सभी लोकपालों का प्रभाव-प्रताप तो सब का सब महेश्वर के प्रसाद से ही होता है। किसी की अपेक्षा न रखना यही परमार्थतः आनन्द ऐश्वर्य और स्वातन्त्र्य है। इसलिए युक्तियुक्त ही कहा है—'तेन जडात् स हि विलक्षणः ।' क्योंकि वह जड से विलक्षण ही है ॥ १३ ॥ [ रहस्य आगमों में तथा परमेश्वर भाषितवेदान्तादि में प्रकाश की ही प्रधानता है ] इस प्रकार समस्त आगमशास्त्रों में भी विमर्शरूप प्रकाश की ही प्रधानता मानी जाती है। इसका निरूपण करते हैं— वह देदीप्यमान महा सत्ता है जिसमें देश-काल का ‘विच्छेद' स्पर्श नहीं होता, वह परमेश्वर की सारतत्त्ववाली चिति-शक्ति को हृदय अर्थात् प्रतिष्ठा स्थान कहा गया है ॥ १४ ॥ यहाँ पर घट रहता है और आकाशकुसुम नहीं रहता है, इस बात को बोलनेवाले कहते हैं, क्योंकि घट को मैं प्रत्यक्षरूप से देखता हूँ, आकाशकुसुम तो प्रत्यक्ष स्फुरित नहीं होता है, यदि घटत्व ही स्फुरित होता है तो वह प्रत्येक व्यक्ति को स्फुरित होगा। नहीं होता है, तो किसी आनन्दघन परम स्वातन्त्र्यरूप परमेश्वर का उल्लास परम-महा पश्यन्ती अवस्थाके कारण ही उल्लसित होता रहता है। वह परावाग्रूपता ही भगवान् की शक्ति है—ऐसा दिखला दिया है। आपस में एक-दूसरे से प्रेम प्राप्त करना ही रतिक्रीडा का आनन्द उल्लास है—इस प्रकार लौकिक दृष्टान्त से भी आनन्द ही प्रकट हुआ झलकता है। १. जबकि मुनि ने कहा है—'सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्' पराधीनता में ही दुःख है और अपने में रहना सुख है । २. ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्रादि देव मायागर्भ के अधिकारी होने के कारण, इनमें अपना कुछ भी करने का सामर्थ्य नहीं होता।