ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
अ.-१, आ.-५, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ८१ निरूपयति । तत्राद्येन श्लोकेन वस्तुनि प्रतिज्ञां करोति, एवंभूता ज्ञानशक्तिः इति, ततः श्लोक- द्वयेन प्रकाश एवार्थानां स्वरूपम् इत्याह । ततो द्वयेन प्रकाशबाह्यानामर्थानां सद्भावं विज्ञान- वादोपगतवासनादूषणेन दृढीकतम् आशङ्क्य, तृतीयेन तदनभ्युपगमेऽपि तावत् न किञ्चित् उपरुध्यत इति दर्शयति । अथ श्लोकेन स्वदर्शनेऽर्थतत्त्वम् उपदर्शयन् बाह्यार्थसद्भावे प्रत्यक्षं निराकरोति प्रमाणत्वेन । ततो द्वयेन अनुमेयतामपि बाह्यस्य निरस्यति । अनन्तरं श्लोकेन चिदात्मनि अर्थानाम् अवश्यं सद्भावः परामर्शत्मना इति प्रकटयति । ततोऽपि प्रकाशस्य प्रमातृरूपस्य प्रत्यवमर्श एव जीवितम्, इति श्लोकचतुष्टयेन अनुभवागमन्यायस्वरूपनिरूपणाभिः अभिधत्ते । अनन्तरं ज्ञानपरामर्श एव ज्ञेयं शुद्धं प्रमातृरूपतानु ज्ञप्तं च प्रथयति इति तस्यैव प्रधानत्वे न्यायं श्लोकत्रयेणाह । प्रकाशैकरूपत्वे च ज्ञानज्ञात्रादि भिन्नम् इति श्लोकेनाह । ततो ज्ञातरि इव विशुद्धे ज्ञानेऽपि अविकल्पकसविकल्पकरूपे विमर्श एव प्राणितम् इति श्लोकद्वयेनाह । ततो ज्ञातुर्ज्ञानस्य च पूर्वपक्षे दूषितं यत् भिन्नत्वं तत् उपसंहारदिशा श्लोकेन समर्थयते, इति तात्पर्यम् आह्निकस्य । श्लोकार्थस्तु निरूप्यते । ननु स्मरणविकल्पादीनाम् अनुभव एव जीवितम्, तत्र यदि भेदेन आभासन्तेऽर्थाः, तत् तेष्वपि तथैव अवभास उचितः, नो चेत् अन्यथा तदनुभव एव तावत् ज्ञानशक्तिरूपो विचारणीय इति आशयेनाह— वर्तमानावभासानां भावानांमवभासनम् । अन्तःस्थितवतामेव घटते बहिरात्मना ॥ १ ॥ इस श्लोक से उठाकर 'सक्रमप्रतिभासते' यहाँतक इक्कीस श्लोकों से निरूपण करेंगे । पहले श्लोक से ज्ञानशक्तिविमर्शरूप वस्तु में ऐसी ज्ञान-शक्ति रहती है यह प्रतिज्ञा करते हैं, दो श्लोकोंसे प्रकाश ही अर्थ का स्वरूप है इस बात को कहेंगे । इसके बाद दो श्लोकों से बाहर में होनेवाले अर्थों के सद्भाव को विज्ञानवाद से प्राप्त वासना दोष से दृढ़ किये हुए को आशंका कर तीसरे श्लोक से उसको न मानने पर भी हमारी कुछ भी हानि नहीं होगी, यही बतायेंगे । अनन्तर एक श्लोक से अपने दर्शन में पदार्थतत्त्व के स्वरूप को दिखाते हुए बाह्य अर्थ के सद्भाव में प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है ऐसा खण्डन करेंगे । तब दो श्लोकों से बाह्य पदार्थ का अनुमान भी निरस्त करेंगे । इसके बाद एक श्लोक से चिदात्मा में अर्थों का परामर्शरूप से सद्भाव अवश्य रहता है यह प्रकाशरूप प्रमातृरूप का प्रत्यवमर्श ही जीवन है, पश्चात् चार श्लोकों से अनुभव, आगम न्याय के स्वरूप को, निरूपण द्वारा कहेंगे । अनन्तर तीन श्लोकों से ज्ञान परामर्श में प्रमातृरूपता को न छोड़कर शुद्ध ज्ञेय का विस्तार करेंगे, उसकी प्रधानता में ही न्याय 'युक्ति' बतायेंगे और एक श्लोक से प्रकाश की एकरूपता में ज्ञान, ज्ञातादि भिन्न है—ऐसा कहेंगे । दो श्लोकों से ज्ञाता की तरह विशुद्ध ज्ञान में भी निर्विकल्पक और सविकल्पकरूप विमर्श ही जीवन है—इसको कहेंगे । एक श्लोक से ज्ञान और ज्ञाता में पूर्वपक्षी ने पहले भिन्नता दिखाकर दोष दिया था उसका उपसंहार करते हुए समर्थन करेंगे, इस आह्निक का यहो तात्पर्य है । अब श्लोक के अर्थ का निरूपण करते हैं । अब प्रश्न करते हैं कि अनुभव ही स्मरण विकल्पादि का 'प्राण' जीवन है, यदि उसमें पदार्थ भेद से आभासित होते हैं, तो उन अनुभव स्मरणादि विकल्पों में भेद से ही अवभास होना ११
८२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-२ वर्तमानत्वेन स्फुटतया अवभासनम् इदमित्येवमाकारं येषां तेषाम्, यदेतत् बहिरात्मना— कल्पितमायीयशून्यादिशरीरान्तप्रमातृपृथग्भावेन हेतुना भिन्नानां, ततो मायाप्रमातुः विच्छिन्नानाम् 'अवभासनम्' तत् परमार्थप्रमातरि शुद्धचिन्मये 'अन्तःस्थितवतां' तेन सह ऐकात्म्यम् अनुज्झित- वतामेव 'घटते' प्रमाणेन उपपद्यते, तेन अनुज्झितसंविद्भेदस्य भावस्य कल्पितप्रमात्रपेक्षया भेदेन प्रकाशनं भगवतो ज्ञानशक्तिरित्युक्तं भवति ॥ १ ॥ प्रमाणेनोपपद्यते, इत्युक्तं तत् प्रमाणं दर्शयति— प्रागिवार्थोऽप्रकाशः स्यात्प्रकाशात्मतया विना । न च प्रकाशो भिन्नः स्यादात्मार्थस्य प्रकाशता ॥ २ ॥ अर्थो नीलादिः, तस्य नीलादिरूपतैव यदि प्रकाशमानता न पुनरपरा काचित् अर्थशरीरो- त्तीर्णा प्रकाशामता तर्हि यथा सर्वान् प्रति नीलमेव तत्सम्भावनया भण्यते, न कञ्चित् वा प्रति, वस्तुतो वा स्वात्मन्येव तत् नीलं परस्य परिनिष्ठितानुपपत्तेः, स्वात्मनि वा न नीलं न अनीलम् प्रकाशानुग्रहेण विना व्यवस्थानायोगात् । तथा प्रकाशमानतापि अस्य सर्वान् प्रति न कञ्चित् उचित है, यदि ऐगा नहीं मानते हो तो अनुभव का ही पहले ज्ञान-शक्ति के रूप से विचार करना पड़ेगा, इस अभिप्राय से कहते हैं— वर्तमानरूप में अवभासित होनेवाले पदार्थों का ही बाह्यरूप से अवभासित होना घटता है ॥ १ ॥ जिनका देश-काल के आभास से विशिष्ट होकर वर्तमानकाल में भिन्न-भिन्न रूपों से भासित होना ही 'आकार' स्वरूप है उन स्फुटरूप का बाहरी रूप से कल्पित मायीय प्रमाता के भीतर भिन्नभाव से भिन्न हुए का कारण से भासित होना है, इसी कारण माया-प्रमाता से भिन्न होकर भासता है 'अवभासनम्' जो कि मायीय-प्रमाता में भासित हुआ था अर्थात् अविच्छिन्न हुआ था, वही शुद्धचिन्मय प्रमाता में 'अन्तःस्थिताम्' भीतर रहकर उसके साथ एकता को प्राप्त कर न छोड़ते हुए 'घटते' प्रकाश को अपने में बनाये रखता है अर्थात् एकता की स्थिति के प्रमाण से प्रमाणित होता है, इसलिए संविद्रूप भेद को न त्यागनेवाले भाव का कल्पित प्रमाता को अपेक्षा भेद से प्रकाशित होना ही तो भगवान् महेश्वर की ज्ञान-शक्ति है । यही सारांश निकलता है ॥ १ ॥ प्रमाण से प्रमाणित होता है, ऐसा जो कहा है—उस प्रमाण को दिखाते हैं— पूर्वरूप के बने बिना तो पूर्व की तरह पदार्थ अप्रकाशित ही रहेगा, अपने स्वरूप की प्रकाशरूपता प्रकाश से भिन्न नहीं हो सकती है ॥ २ ॥ जो अर्थ है वह नीलादि पदार्थ है, यदि इसकी नीलादिरूपता ही प्रकाशमानता है, तब तो परमार्थवपु से हटी हुई प्रकाशमानता नहीं हुई । जैसा कि सबके लिए यह नील है इस सम्भाववा से कहा जाता है अथवा किसी के प्रति नहीं भी है, यह कहा जाय, वस्तुतः अपने में ही वह नील है दूसरे में इसकी सत्ता नहीं बन सकती, या अपने में नील नहीं है, अनील नहीं है, प्रकाश के अनुग्रह बिना व्यवस्था का योग नहीं बैठ सकता है तथा प्रकाशमानता भी सबके लिए या किसी के लिए नहीं है, अपितु अपने में है या अपने में भी नहीं है, इससे जगत् में अन्धकार फैल जायेगा । इसलिए
अ.-१, आ.-५, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ८३ वा प्रति अपि तु स्वात्मन्येव, स्वात्मन्यपि वा न स्यात् इति अन्धता जगतः। अथ इन्द्रियालो- कादिक्षणवर्गात् प्रकाशरूपोऽसौ नीलक्षणो विशिष्ट एव जातः, एवमपि स एव प्रसङ्गः, प्रकटता- वादेऽपि अयमेव दोषः, सर्वथा अर्थशरीरविश्रान्तः चेत् प्रकाशो मम अवभासते इति प्रमातृलग्नतया प्रकाशस्थितिः दुरुपपादा। प्रमाता हि तदानीम् इन्द्रियार्थमयोऽर्थरूपस्य प्रकाशस्य कारणं भवेत्, बीजमिव अङ्कुरस्य। न च अङ्कुरो बीजापेक्षोऽङ्कुरात्मा, ततो यदि न प्रकाशात्मा स भवेत् 'प्रागिव' ज्ञानोदयात् पूर्वं यथा सोऽप्रकाशः, तथा ज्ञानोदयेऽपि स्यात्। ननु ज्ञानम् अर्थप्रकाश- रूपमेव, तत् कथं ज्ञानस्य उदयानुदययोः अर्थस्य तुल्यता स्यात्। स्यात् एतत् यदि उपपद्येत, यावता अर्थात् भिन्नं यत् ज्ञानं प्रकाशरूपं, तत् अर्थस्य सम्बन्धितया कथं स्यात्। यदि तावत् अर्थः प्रकाशते, इत्येवंभूतं ज्ञानस्य स्वरूपं तत् अर्थज्ञानयोः अभेद एवायाततः—अर्थस्वभावस्य ज्ञानत्वेन उक्तत्वात्, अर्थस्वभावत्वे च प्रकाशस्य अर्थात्मतायाम् उक्तं दूषणम्। अथ अर्थं प्रकाश- यति इति ज्ञानस्य स्वरूपम्, तर्हि प्रकाशमानमर्थं करोति ज्ञानम् इति आपतिते पुनरपि स एव दोषः। कृतप्रतानश्च अयं प्रकृत्यर्थण्यर्थविवेको मयैव भेदवादविदारणे इति तत एव अन्वेष्यः। तस्मात् भिन्नः प्रकाशोऽर्थस्य सम्बन्धी भवति इति सम्भावनैव नास्ति। अतश्च इदम् उपपत्त्या आयातम्—अर्थस्य स्वरूपं प्रकाशमानत्वं प्रकाशाभिन्नत्वम् इति। प्रकाशश्च यदि घटेऽन्यः पटेऽन्यः तदा अनुसन्धानस्य अयोगः—द्वयोः प्रकाशयोः स्वात्ममात्रपर्यवसानात् इति वितत्य उपपादितं इन्द्रिय आलोकादि क्षण समूह से प्रकाशरूप नीलक्षण [ प्रकाशमान घटरूप ] विशिष्ट ही हो गया, इस तरह भी वही प्रसंग उपस्थित होगा, [ कौमारिलों के मत ] प्रकटतावाद में यही दोष आ जायेगा, सब प्रकार से यदि अर्थ-शरीर में विश्रान्ति मानोगे तो मुझे प्रकाश भासित होता है इस प्रकार प्रमाता में प्रकाश की स्थिति नहीं सिद्ध कर सकते हो; क्योंकि उस समय प्रमाता ही इन्द्रिय और पदार्थ से युक्त होकर अर्थरूप प्रकाश का कारण बनेगा, जैसे अंकुर का कारण बीज होता है और अंकुर बीज की अपेक्षा किये बिना अंकुरत्व प्राप्त नहीं कर सकता, यदि वह प्रकाशात्मा नहीं होता तो ज्ञान के उदय के पूर्व जैसे अप्रकाशित था--उसी प्रकार उदय होने पर भी अप्रकाशित ही रहता। अब प्रश्न करते हैं कि ज्ञान को भी अर्थप्रकाशवाला ही मान लिया जाय, वह ज्ञान के उदय और अनुदय होने पर अर्थ की समानता कैसे करता। यदि वह कर सकता था तब तो ठीक ही होता, जबतक अर्थ से भिन्न ज्ञान प्रकाशरूप है तबतक अर्थ के सम्बन्धी होकर कैसे रहेगा। प्रथम पक्ष में यदि अर्थ का प्रकाश होता है, ऐसा ही यदि ज्ञान का रूप है तो अर्थ और ज्ञान में अभेद ही हो गया; क्योंकि अर्थस्वभाव को ज्ञानत्वरूप से कह दिया है और अर्थस्वभाव में प्रकाश का अर्थरूप हो जाने में भी पूर्वोक्त दोष बता दिया है, तृतीय पक्ष में यदि ज्ञान का स्वरूप अर्थ को प्रकाशित करता है, ज्ञान अर्थ को प्रकाशमान करता है पुनः भी यही दोष आ पड़ेगा और इसका अच्छी तरह विस्तार भी कर दिया है—जो यह प्रकृत्यर्थ और ण्यर्थ [ प्रकाशते और प्रकाशयति ] का विचार मैंने भेदवाद खण्डन में कर दिया है इसलिए वहाँ पर ही खोजना होगा। अतः भिन्न अर्थ का प्रकाश अर्थ का सम्बन्धी होता है ऐसी शंका भी नहीं करनी चाहिए। अतः उपपत्ति से यही सम्पन्न हुआ कि अर्थ का स्वरूप प्रकाशमानत्व प्रकाश से अभिन्न है और प्रकाश यदि घट में दूसरा और पट में दूसरा ही है तो फिर अनुसन्धान योग नहीं बन पायेगा; क्योंकि दोनों प्रकाशों को
८४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-३ 'नश्येत् जनस्थितिः' इत्यत्र। तस्मात् एक एव प्रकाशः। एतदेव आवृत्त्या दर्शितं 'न च प्रकाशो भिन्नः स्यात्' इति ॥ २ ॥ व्यतिरिक्तस्य ज्ञानस्य अर्थप्रकाशरूपताम् अभ्युपगम्यापि बाधकान्तरमाह— भिन्ने प्रकाशे चाभिन्ने संकरो विषयस्य तत् । प्रकाशात्मा प्रकाश्योऽर्थो नाप्रकाशश्च सिद्ध्यति ॥ ३ ॥ यदि अर्थात् अन्य एव ज्ञानात्मा प्रकाशः अत एव भिन्नोऽर्थतः, र्तहि स्वात्मनि तस्य प्रकाशमात्ररूपत्वात् अभेद एव । तथाहि नीलस्य प्रकाशः, पीतस्य प्रकाशः इति यो नीलांशः पीतांशश्च, स तावत् ज्ञानस्य स्वरूपम् भेदवादत्यागापत्तेः। अथ विषयः, तदेवेदं विचार्यते—इह प्रकाशबलात् नीलपीतयोः भेदोऽभ्युपगन्तव्यः, येनैव च प्रकाशेन नीलो नील एव इति उपगम्यते, तेनैव च प्रकाशेन पीतः पीत इति कथं संगच्छताम्, नीलेन जनितः, पीतेन जनितः, तेन वा सह एक- सामग्रीक इत्यादि यत् उच्यते, तत् सिद्धे नीलपीतयोर्भेदे स्यात्, स एव विचार्यः। अथ अपने में ही लीन रखते हैं; इसका भी हमने 'नश्येत् जनस्थितिः' में विस्तारपूर्वक कह दिया है। 'न च प्रकाशो भिन्नः स्यात्' इस वचन से इसी बात को बारम्बार ही दिखलाया है॥ २ ॥ अर्थ से भिन्नज्ञान अर्थप्रकाशरूप ही होता है इस बात को मानकर भी दूसरा बाधक उपस्थित करते हैं— प्रकाश अर्थ से भिन्न रहने पर यदि तुम अभिन्न मानोगे तो विषय का सांकर्य हो जायेगा । प्रकाशरूप अर्थ प्रकाशित किया जाता है इसीलिए अर्थका प्रकाशित न होना नहीं सिद्ध होता है ॥ ३ ॥ यदि पदार्थ से भिन्न ही ज्ञानरूप प्रकाश है इसलिए अर्थ से भिन्न है, तब तो प्रकाशमात्ररूप होने से ही अपने में उसका अभेद हो जायेगा । जैसे नील का प्रकाश पीत का प्रकाश है उसमें नीलांश और पीतांश है, वही ज्ञान का वास्तविक स्वरूप है, भेदवाद को त्यागना आवश्यक है । अब 'ज्ञान के विषय ऊपर विचार किया जाता है—यहाँ पर प्रकाश के सामर्थ्य से नील और पीत का भेद मानना पड़ेगा और जिस प्रकाश से नील वस्तु नील ही होती है और उसीप्रकार पीत वस्तु पीत ही होती है, यह कैसे मेल खायेगा ? [ कौमारिल मत यह है कि साकारता के द्वारा किया हुआ ही यह नियम चलता है— 'तत्रानुभवमात्रेण ज्ञानस्य सदृशात्मनः । भाव्यं तेनात्मना येन प्रतिकर्म विभज्यते ॥' अनुभव मात्र से अपने सदृश का ज्ञान होना चाहिए । जिससे प्रत्येक कर्म विभाजित हो जाता है । ] यह नील से पैदा हुआ, पीत से पैदा हुआ, जिस सामग्री से पदार्थ का प्रकाश होगा उसी सामग्री से ज्ञान का भी प्रकाश होगा, नील और पीत का भेद जब सिद्ध होगा तभी यह बात घटेगी, नील पीत का भेद ही तो विचारणीय है । सौत्रान्तिकमत से यदि नीलाकार वह प्रकाश
अ.-१, आ.-५, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ८५ नीलाकारोऽसौ तत् यदि प्रतिबिम्बबलात् तद्विद्वितीयबिम्बानवभासात् अयुक्तम् । अथ अभेदः, तर्हि त्यक्तो भेदवादः, तथा कारणतादिवादे शिखरस्थज्ञानं बहुतरनीलादिजन्यम् एकत्र पटु अन्यत्र मन्दम् इति कथं भेदः —प्रकाशशरीरस्य अभेदात्, तथाभूते च अन्यतरदर्शनोद्बोधितेऽपि संस्कारे बलादेव अशेषस्मरणप्रसङ्ग इति भूयान् संकरः । स्यात् एतत्, अर्थ एवास्तु, किमनेन दोषोपपादकेन प्रकाशेन इति । अत्राह—अप्रकाशस्य प्रसिद्धिरैव न काचित्, स्वात्मनि हि नीलं यदि पीतं न किंचित् वा; तत् किं दुष्येत्, अत एव ग्रन्थकृतैव अन्यत्र उक्तम्— एवमात्मन्यसत्कल्पाः प्रकाशस्यैव सन्त्यमी । जडाः प्रकाश एवास्ति स्वात्मनः स्वपरात्मभिः ॥ इति, तत् यदि प्रकाशः तदा भवति अर्थः, प्रकाशश्च असौ कथम् । यदि प्रकाशतैव घटस्य वपुः सैव पटस्य इत्यादि विश्ववपुः प्रकाशः सिद्धः ॥ ३ ॥ एकस्यैव प्रकाशस्य एवंभूतक्रमाक्रमकार्यकारणभावादिविचित्रवैश्वरूप्यप्रदर्शनसामर्थ्यरूपम् ऐश्वर्यम्, इति तावत् पर्यवसाययितव्यम् । तच्चैवं पर्यवस्यति, यदि प्रकाशस्य विचित्रभावे हेत्वन्तरम् अपाकृतम् तत्र प्रकाशस्य अविचित्रस्य क्रमेण विचित्रताकारणं प्रतिबिम्बात्मकं, प्रतिबिम्ब के बल से होता है तो वह प्रकाश द्वितीय बिम्ब के भाससे नहीं हो सकता, विषय की संकीर्णता आ जायेगी। यदि अभेद कहो, तो फिर भेद छोड़ना पड़ेगा, पाटवादि की संकीर्णता होने से कारणतावाद स्वीकार करने पर चोटी का स्थान अत्यन्त अधिक नीलादि से जन्य होगा, एक जगह पटु है तो दूसरी जगह मन्द है यह भेद कैसे होगा ? प्रकाश शरीर के अभेद होने से । [ स्मृति द्वारा संकर दिखाते हैं ] स्मृति के द्वारा अभिन्न मानने पर दूसरों को देखने पर संस्कार उद्बुद्ध होगा तो भी एक ही बार सम्पूर्ण = अशेष के स्मरण का प्रसङ्ग आ पड़ेगा इस प्रकार बहुत से संकर पैदा हो जायेंगे। यह भले ही होता हो, नीलादि पदार्थ रहे, दोष को उत्पादन करनेवाले प्रकाश से क्या प्रयोजन है अर्थात् पदार्थ ही रहे प्रकाश न रहे। यहाँ पर स्मृति में कहते हैं कि अप्रकाश की कोई प्रसिद्धि ही नहीं है, यदि अपने स्वरूप में नील या पीत [ अनील ] कुछ भी न हो तो क्या बिगड़नेवाला है, अत एव स्वयं ग्रन्थकार ने ही दूसरी जगह कहा है— इस प्रकार आत्मा में नहीं के बराबर रहते हुए भी ये सारे के सारे जड पदार्थ प्रकाश के ही स्वरूप हैं। प्रकाश न तो प्रकाश से भिन्न है और न अर्थ से ही भिन्न है परात्मा के साथ अपना ही प्रकाश है। [ स्वयं प्रकाशरूप ज्ञान से अर्थ अभिन्न ही रहता है ] यदि वह प्रकाश है तभी अर्थ है, नहीं तो अर्थ कहाँ रहेगा अर्थात् प्रकाश में अर्थ रहता है। यदि प्रकाशता ही घट का स्वरूप है और वही पट का भी है तो फिर विश्व का स्वरूप ही प्रकाश का स्वरूप सिद्ध होगा [ इसलिए बोधरूप प्रकाश से अभिन्न ही अर्थ रहता है। यही सिद्धान्त है।]॥ ३॥ इस प्रकार क्रम-अक्रमरूप से, कार्य-कारणभावादिसे विचित्र-चित्र विश्व के रूप को दिखाने का सामर्थ्यवाला यह सारा ऐश्वर्य एक प्रकाश का ही है, [ स्वयं अपने आगम शास्त्र की युक्ति से और दूसरों की भी युक्ति से निश्चय होने पर हृदयङ्गम करना चाहिए।] इस प्रकार वह समाप्त हो जाता है, प्रकाश के विचित्र भाव में सौत्रान्तिक ने दूसरा हेतु दिया था—उसे खण्डित किया, वहाँ पर अविचित्र प्रकाश क्रम से विचित्र बनाने का कारण
८६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-४-५ तत्प्रतिबिम्बसजातीयं यत् तदेव नीलादिरूपं बाह्यम्, तच्च यद्यपि अनुमेयं, तथापि इदं नीलमिति प्रत्यक्षेण अध्यवसायात् अध्यवसायप्राणितत्वाच्च प्रमाणस्थितेः प्रत्यक्षव्यपदेश्यं भविष्यति । बाह्यार्थवादिकथितमिति हेत्वन्तरम् अनुमीयमानं बाह्यरूपम् आशङ्क्यमानत्वेन प्रदर्शयति— तत्तदाकस्मिकाभासो बाह्यं चेदनुमापयेत् । न ह्यभिन्नस्य बोधस्य विचित्राभासहेतुता ॥ ४ ॥ न वासनाप्रबोधोऽत्र विचित्रो हेतुतामियात् । तस्यापि तत्प्रबोधस्य वैचित्र्ये किं निबन्धनम् ॥ ५ ॥ इह बोधः तावत् अभिन्नः, प्रकाशमात्रमेव हि अस्य परमार्थः, प्रकाशाधिकं यदि नीलस्य रूपं, तर्हि तत् अप्रकाशरूपम् इति न प्रकाशेत । अथ तथा प्रकाशत्वमेव अस्य रूपम्, पीतप्रकाशः कथं स्यात् । अथापि क्रमिकनीलपीतादिप्रकाशरूपमेव तस्य रूपम्, नीलाद्याभासशून्योऽहमिति प्रकाशः स्वापाद्यवस्थासु न स्यात् । तस्मात् प्रकाशः प्रकाश एव, अणुमात्रमपि न रूपान्तरम् अस्य अस्ति इति अभिन्नो बोधः, तस्य च अभिन्नस्य कदाचित् नीलाभासता कदाचित् पीताभासता इति ये विचित्राभासाः तत्र कारणत्वम् हि यस्मात् न उपपन्नम्—हेतौ अभिन्ने कार्यभेदस्य असंभवत्वात्, तस्मात् स स विचित्रनीलपीतादिरूप आकस्मिकोऽज्ञातप्रत्यक्षसिद्धहेतुकः सन् बाह्यं विज्ञानगत- प्रतिबिम्ब रूप था, उस [ नीलादिजातीय ] प्रतिबिम्ब के समान सजातीय जो बाह्य नीलादि रूप है और वह यद्यपि अनुमान का विषय है, फिर भी यह नील है—ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान होने से और अध्यवसाय से जीवित होने के कारण प्रमाण की स्थिति से प्रत्यक्ष कहना पड़ेगा । यही बाह्यार्थ- वादी का कहा हुआ दूसरा हेतु बाह्यरूप से अनुमान किये जानेवाले के प्रति आशङ्का करके प्रदर्शित करते हैं— वह अज्ञात हेतुक आकस्मिक आभास यदि बाह्य पदार्थ का अनुमान करावें तो उससे अभिन्न ज्ञान का विचित्राभास हेतु नहीं बन सकता है ॥ ४ ॥ इसी ढङ्ग से विचित्र वासना का ज्ञान भी हेतुता को नहीं प्राप्त करेगा। उस ज्ञान की भी विचित्रता में क्या कारण होगा। इसलिए बाह्य अर्थ ही आभास की भिन्नता में हेतु हैं ॥ ५ ॥ ज्ञान पदार्थ से भिन्न नहीं है, प्रकाश से [ विरुद्ध ] अधिक नील का स्वरूप होता तो, वह अप्रकाश रूप हो जायेगा और प्रकाशित ही न होगा ! नील रूप से ही इसका स्वरूप स्फुरित होता है नील का पीत से भेद होने से पीत का प्रकाश कैसे होगा। क्रम से नील पीतादि प्रकाशरूपता ही इसका स्वरूप है, नीलादि आभास से शून्य जो अहं प्रकाश है वह स्वप्न-मूर्च्छादि अवस्था में रहता है। इसीलिए प्रकाश को प्रकाश ही मानो, थोड़ा-सा भी इसका दूसरा रूप नहीं होता है, अतः पदार्थ प्रकाश से अभिन्न ही ज्ञान प्रकाश है, और उस प्रकाश को अभिन्न ही मान लिया जाय तो कभी नील का होना ये जितने भी विचित्र आभास हैं उन विचित्र आभासों में [प्रकाश की] कारणता का न होना नहीं बनेगा; क्योंकि हेतु के अभिन्न होने पर कार्य का भेद नहीं हो सकता है, इसीलिए वह विचित्र नील-पीतादिरूप जो आकस्मिक अज्ञात प्रत्यक्ष से सिद्ध हेतुवाला होता
अ.-१, आ.-५, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ८७ प्रतिबिम्बात्मकस्वस्वभावसंपादकम् औचित्यवशात् निजरूपसदृशं क्रमोपनिपतद्रूपबहुतरभेदात्मकं ज्ञानात् सर्वथा पृथग्भूतम् अनुमापयति इति संभावयते बाह्यार्थवादी । न च अस्य इदं संभावना- मात्रम् अपि, तु निश्चयपर्यवसायि एव भवति । तथाहि विज्ञानवादिना यो हेतुः वैचित्त्ये वासना- प्रबोधलक्षण उक्तः स न उपपद्यते । 'स्मृतिजनकः संस्कारो वासना' इति तावत् प्रसिद्धम्, इह तु अनुभववैचित्त्ये हेतुः पर्येषणीयो वर्तते । अस्तु वा नीलाद्याभाससंपादनसामर्थ्यरूपा ज्ञानस्य योग्य- तात्मिका शक्तिः वासना, तस्याश्च स्वकार्यसंपादनोंन्मुख्यं प्रबोधः, ततो बोधेषु आभासवैचित्त्यम् इति । तत्रापि तु ब्रूमः-यद्यपि आभासानां ज्ञानान्तर्वर्तिनाम् अपारमार्थिकं संवृतिसत्त्वम् उच्येतापि, तथापि यत् एषां कारणम् तत् वस्तुसदेव अङ्गीकार्यम्-अवस्तुनः सर्वसामर्थ्यविर- हितालक्षणस्य कार्यसंपादनप्राणितसामर्थ्यात्मकस्वभावानुपपत्तेः । एवं स्थिते या एता वासना आभासकारणत्वेन इष्यन्ते, तासां बोधात् यदि भिन्नं रूपम्, तच्च परमार्थसत्, तत् अयं शब्दान्तरप्रच्छन्नो बाह्यार्थवादप्रकार एव । अथ संवृतिसत्, तर्हि तेन रूपेण कारणत्वानुपपत्तिः, अथ येन रूपेण आसां पारमार्थिकता तेन कारणता । तत् तर्हि ज्ञानमात्रं, तच्च अभिन्नम्, इति नीलाद्याभासरूपस्य कार्यभेदस्य असिद्धिः । एवं वासनानाम् अविचित्रत्वे तत्प्रबोधो विचित्र इति
हुआ भी अप्रकाशमान बाह्य विज्ञानगत प्रतिबिम्बरूप अपने स्वभाव को स्वतन्त्र बनानेवाला, उचित होने के कारण अपने स्वरूप के सदृश क्रम से आनेवाले बहुत से भेद ज्ञान सर्वथा अलग रखे हुए अपने को अनुमान करावेंगे, बाह्यार्थवादी की यही सम्भावना है और इसकी यह सम्भावना मात्र ही नहीं है-अपितु निश्चय ही पर्यवसाय होता है । विज्ञानवादी के द्वारा जो वासना-प्रबोधरूप हेतु विचित्रता में कहा है वह सङ्गत नहीं बैठता है । 'स्मृति जनकः संस्कारो वासना' स्मृति का जनक संस्कार वासना है, यह तो प्रसिद्ध ही है, यहाँ तो अनुभव की विचित्रता में जो हेतु है उसे खोजना चाहिए । अथवा ज्ञानके नीलादि आभास को सम्पादन करने की सामर्थ्यवाली योग्यतात्मिका-शक्ति वासना है और वह वासना अपने नीलादिरूप का सम्पादन करने की उन्मुखता रखती है यही ज्ञान-शक्तिरूपता है, इसी कारण बोधादि में आभास की विचित्रता दिखायी देती है । सौत्रान्तिकने जो युक्ति दी है, उस पर भी हम कहते हैं-ज्ञान के भीतर आभासित होनेवाले पदार्थों की अपारमार्थिक संवृत्ति-विकल्प बुद्धि है; यदि ऐसा कहते हो, तो भी जिसका जैसा कारण है उस वस्तु का कार्य भी सदरूप ही स्वीकार करना होगा-अवस्तु तो सामर्थ्य से रहित होती है एवं कार्य साधने की योग्यता उसमें नहीं रहती है । [ ऐसी स्थिति में तो हमारे मनोरथरूपी कल्पवृक्ष से यह फलित हुआ कि हमारे ही सिद्धान्त में आप आ गये हो ] इस तरह ये वासनाएँ आभास की हेतुता खोजती हैं, उनका यदि ज्ञान से भिन्न रूप होता तो वह वस्तुतः परमार्थ सत् ही है उसको दूसरे शब्दों से यह समझो कि प्रच्छन्न-छिपा हुआ ही बाह्यार्थवाद है । अब कहो कि कारण को भी सद्रूप माना जाय तब तो विकल्प-बुद्धिरूप से कारणता की सिद्धि ही नहीं बन पायेंगी, अब तो यही कहना ठीक होगा कि जिस रूप से इन आभास-पदार्थों को पारमार्थिकता है उसी रूप से आभास पदार्थों की कारणता भी माननी होगी । तब तो ज्ञानमात्र ही रह जायेगा और उसी की अभिन्नता भी रह जायेगी-ऐसा माना जाय, जो नीलादि आभास रूप हैं उनमें कार्य भेद की सिद्धि नहीं हो सकती हैं । एवं वासनाओं की अविचित्रता होने पर उसका बोध विचित्र कैसे होगा अर्थात् कोई बाधा भी इसमें नहीं होती है । अथवा भले ही
२. क्रिया अधिकार: क्रिया-शक्ति, कार्यकारण-भाव एवं देशकाल-विमर्श
८८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-४-५ का प्रत्याशा । भवन्तु वा वासना भिन्नाः, तथापि बोधमात्रातिरिक्तस्य देशकालभावादेः प्रबोध- काभिमतस्य विचित्रस्य कारणस्य अभावात् प्रबोधोऽविचित्र इति एक एव प्रबोधः इति सममेव नीलादिवैचित्र्यं भासेत । अथ स्वसन्तानवर्त्तीनि बोधान्तराणि विचित्राणि प्रबोधकारणानि इति, तदसत्, सुख-दुःख-नील-पीतादि-पूर्वापरादिदेश-कालभेदस्य विज्ञानमात्ररूपत्वे विज्ञानस्य च प्रकाशमात्रपरमार्थतायां स्वरूपभेदासम्भवे बोधवैलक्षण्यानुपपत्तेः । परप्रमातृरूपेषु बोधान्तरेषु सन्तानान्तरशब्दवाच्येष्वपि तुल्योऽयम् अवैलक्षण्यप्रकारः । तत्रापि परकीयाभिमतस्य कृशस्थूलादेः कायस्य, श्वासप्रश्वासादेः प्राणस्य, सुखदुःखादेः धीगुणस्य, अनुमात्राभिमतसंविन्मात्ररूपा- भेदे परत्वं कस्य इति न विद्मः । बोधस्य तन्निष्ठस्य इति चेत्, सोऽपि प्रमाणेन यदि न सिद्धः तत् असन् एव, सिद्धोऽपि प्रमेयंतया चेत् तत् जड एव, तथापि च कायादिवत् एव ज्ञानमात्र- स्वभावः—स्वसंविन्मात्ररूपत्वे परं प्रति अस्य असिद्धेः । ननु व्याहारादिक्रिया स्वात्मनि इच्छया व्याहरेयम् इत्येवंरूपया हेतुभावेन व्याप्ता दृष्टा तत् चैत्रकायेऽपि तया तद्धेतुकया भाव्यम् । न च मत्संततिपतिता समीहा अस्ति इति स्वसंवेदनेन निश्चितम्, ततश्च परसमीहा सिद्धयति, तदेव वासना भिन्न हो, फिर भी बोधमात्र से अतिरिक्त जो देश-कालादि हैं उसे प्रबोध करनेवाले के माने हुए विचित्र कारण का अभाव होने से बोध अविचित्र ही रहता है एक ही [ आभास रूप ] प्रबोध नीलादि विचित्रता को युगपत् भासित करेगा । [ विज्ञानवादी के मत की आशंका 'अथ' शब्द से करते हैं ] अपने सन्तान 'प्रवाह' में रहनेवाले अन्य-अन्य ज्ञान विचित्र कारण होंगे, ऐसा बाह्यार्थ- वादी का कहना ठीक नहीं बैठता है, क्योंकि सुख-दुःख नीला-पीतादि, पूर्वोत्तर देश-काल के भेद का विज्ञानमात्र स्वरूपत्वमें और विज्ञान का प्रकाशमात्र परमार्थरूप में स्वरूप भेद सम्भव नहीं होने से बोध की विलक्षणता नहीं बैठ सकती है । इसीमें दूसरे पक्ष से कहते हैं । प्रमातृरूप दूसरे बोध में, दूसरे सन्तान प्रवाह शब्द के वाच्य में बोध की स्वरूपता अभिन्न ही रहती है अर्थात् दूसरे सन्तान में भी समानता का ही समर्थन किया जाता है। अभेदता में भी दूसरे से माना हुआ कृश-स्थूलादि शरीर का श्वास-प्रश्वासादि प्राण का, सुख-दुःखादि बुद्धि के गुग का, अनुमान करनेवाले के अभिज्ञान मात्र से अभेद होनेसे किसको तुम परत्व कहोगे; यह हमारी समझ में नहीं आता है । यदि बोधको परनिष्ठ मानते हो तो, वह भी प्रत्यक्ष प्रमाण से यदि सिद्ध नहीं है तब तो वह असत् ही है, प्रमेयरूप [ बोधरूप ] से यदि सिद्ध भी मान लिया जाय तो भी वह जडरूप ही हो जायेगा और जडता होने पर भी शरीरादि के समान ज्ञानमात्र स्वभाववाला परनिष्ठ अर्थात् जडरूप ही होगा, ज्ञानमात्ररूप होनेपर वह दूसरों के प्रति असिद्ध हो जायेगा; क्योंकि ज्ञानोंकी परस्पर संवेद्यता नहीं बनती है । 'ननु' कहकर [ सौगत ] बौद्धलोग प्रमाण देते हैं कि व्याहारादि क्रिया [ बोलना ] अपने आप [ स्व सन्तान ] में इच्छा से बोलेंगे इस हेतु रूप भाव से व्याप्त देखी गयी है वही चैत्र के शरीर में भी उसी [ इच्छारूप हेतु ] से होनी चाहिए । क्षण सन्तान में आनेवाली अन्य की इच्छा नहीं है अपने अनुभव ज्ञान से निश्चित होती है इसीलिए दूसरे की इच्छा सिद्ध हो जाती है, वही
अ.-१, आ.-५, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ८९
संतानान्तरम् इति। अत्रोच्यते—इह अनुमातुः व्याहाराभासो द्विधा भवति—व्याप्तिग्रहण- कालेऽविच्छेदप्राणोऽहं व्याहरामि इत्येवंरूपः। अनुमानावसरे च ‘व्याहरति अयम्’ इति विच्छेद- जीवित इति अन्यस्य व्याप्तिः गृहीता, अन्यश्च आभासः कथम् इदानीं हेतुः स्यात्, व्याहरति इति आभासस्य च हेतुः अविदित एव इति कथं ततो हेतोः समीहा अनुमीयेत, किं च ‘व्याहरति अयम्’ इति यः प्रमात्रन्तरेऽनुमातृसंमते विच्छिन्नतया अवभासः सोऽनुमेयसंमतायाः परसमीहायाः कथं कार्यः स्यात्। तस्या हि व्याहरामीत्याभासः कार्यो योऽसौ अविच्छेदजीवितः। न च अविच्छेदमयस्य विच्छेदमयः कार्यम् इति युक्तम्—तथाभूतकार्यकारणभावग्रहणोपायाभावनाव्, नहि स्वात्मनि योऽयम् अविच्छिन्नाभासः, स परत्र विच्छिन्नं ‘व्याहरति अयम्’ इत्येवंरूपम् आभासं जनयति, इति केनचित् प्रमाणेन सिद्धम्—परसिद्धिपूर्वकत्वात् अस्य अर्थस्य, परप्रमातृसिद्धेश्च। एवंभूतार्थसिद्धयधीनत्वेन इतरेतराश्रयात्। न च अवश्यम् अविच्छिन्नात् विच्छिन्नेन भाव्यम् इति नियमोऽस्ति व्यभिचारात्। न च विच्छिन्नोऽपि आभास उत्पद्यताम्, इति तदनुसन्धानात् तदुत्पत्तिः नियता—तत्सद्भावेऽपि अनुत्पत्तेः तदभावे च उत्पत्तेः, विच्छिन्न आभासः परत्र उत्पद्यताम् इति या समीहा तया सह परत्र उत्पन्नस्य विच्छिन्नाभासस्य कार्यकारणभावग्रहणमेव परासिद्धौ न युक्तम्
परकाय चैतन्य है अर्थात् दूसरा सन्तान है। [ अब सौत्रान्तिक लोग दूसरे सन्तान अनुमान के विषय में कहते हैं ] यहाँ पर अनुमान करनेवाले का व्याहाराभास दो प्रकार का है [ दूसरे का व्याहार ही समीहापूर्वक हो सकता है, हमारे व्याहार की तरह ] व्याप्ति ग्रहण काल में भिन्न काल न होता हुआ अविच्छेदरूप से मैं बोलता हूँ—ऐसा ही यह होगा और अनुमान काल में ‘व्याहरति अयम्’ भेद मूलक अन्य की व्याप्ति गृहीत होती है और विच्छेद प्राणवाला आभास कैसे दूसरों की समीहा का गमक [ बतानेवाला ] होगा, ‘बोलता है’ इस आभास का इच्छारूप हेतु अविदित ही है कैसे उसकी इच्छा अनुमान करेगी और भी ‘व्याहरति अयम्’ यह दूसरे प्रमाता में अनुमातृरूप से माना गया भेदपूर्वक अवभास अनुमेयरूप से मानी गयी दूसरे की इच्छा का कैसे कार्य हो सकता है। ‘मैं कहता हूँ’ यह आभास अपना स्वात्म अविच्छेदरूप से प्राणित है और अविच्छेदरूप [ व्याहरामि इत्येवं रूपाभासस्य ] का विच्छेदरूप [ व्याहरति अयम् ] से कार्य होना उचित नहीं है, उसी प्रकार होनेवाले कार्य-कारणभाव ग्रहण करने के लिए कोई उपाय नहीं है, अपने में होनेवाला जो ‘व्याहरामि’ अविच्छेद आभास है वह [ अनुमेय ] दूसरी जगह में विच्छिन्न होकर ‘व्याहरति अयम्’ इस रूप में आभास पैदा करता है, किस प्रमाण से सिद्ध होगा, क्योंकि ये अर्थ दूसरे के सिद्ध होने पर ही सिद्ध होते हैं [ अविच्छिन्नाभास के रहने पर विच्छिन्नाभास उत्पन्न होता है ] इस प्रकार से तो अन्योन्याश्रय दोष आ जायेगा। अविच्छिन्न आभास से कहीं विच्छिन्नाभास होता है अर्थात् ‘व्याहरामि’ की जगह ‘व्याहरति अयम्’ ऐसा क्या बोला जा सकता है ? नहीं, यह नहीं हो सकता है और ऐसा कोई नियम भी नहीं है जो अविच्छन्ना- भास से विच्छिन्नाभास होता हो, यदि मानते हो, तो इसका व्यभिचार होगा। विच्छिन्नाभास ‘व्याहरति अयम्’ दूसरे प्रमाता में उत्पन्न नहीं हो सकता है। अविच्छिन्नाभास के अनुसन्धान से ही विच्छिन्नाभास की उत्पत्ति सम्भव है—अविच्छेद के अभाव में उत्पन्न नहीं हो सकता और अविच्छेद के रहने पर उत्पन्न होगा, परप्रमाता में ‘व्याहरति अयम्’ ऐसा उत्पन्न हो, उसके साथ दूसरे प्रमाता में उत्पन्न विच्छिदाभास परप्रमाता के सिद्ध न होने से कार्य-कारणभावादि का १२
९० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-६ इति व्याप्तेरेवासिद्धिः। प्रमात्रन्तराणि च यदि भिन्नानि तदा तन्निष्ठानाम् अवभासानां भेद एव, 'ज्ञानाद्व्यतिरिक्तं च' इति न्यायात्। ततश्च एकाभासनिष्ठत्वाभावात् एकाभासविश्रान्तः सम्भूय प्रमातृणां व्यवहारो न स्यात्—इति अन्योन्यानुपरक्तं भूतग्रस्तप्रकृतिप्रायं जगत् आपद्येत। अनुमीय- मानमपि च बोधान्तरम् अनुमातृसम्मतात् बोधात् यदि भिन्नम्, तत् अस्ति तावत् सम्भवः —यत् प्रमेयं बोधात् भिन्नम् अस्ति इति। सहोपलम्भनियमादेः अनैकान्तिकत्वात् नीलपीतादिनापि प्रमेयराशिना किम् अपकृतम्, येन अस्य स्वरूपविश्रान्तिः न सह्यते, तस्मात् प्रमात्रन्तराणामपि असिद्धिरेव, सिद्धौ वा सर्वप्रमात्रन्तर्गता आभासा एकैकत्र परत्र आभासवैचित्र्यहेतुं वासनोद्- बोधवैचित्र्यं जनयेयुः —नियमे हेत्वन्तराभावात् इति, तथापि न नीलादिवैचित्र्यसिद्धिः। एवं वासनानां तदुद्बोधहेतूनां च विचित्राणाम् अनुपपत्तिरेव। ततश्च स्थितमेतत्, अभिन्नो बोधः तस्य आकस्मिकाभासभेदहेतुत्वानुपपत्तेः बाह्योऽर्थोऽनुमेयः सम्भाव्यते—इति यदि बाह्यार्थवादिना उच्यते, इति श्लोकद्वयार्थः। चेच्छब्दः श्लोकद्वयवाक्यार्थशङ्काद्योतकः ॥ ४-५ ॥ एवम् आशङ्क्यमानत्वेन परसम्भावना दृढा दर्शिता, अधुना तु एनां सम्भावनां शिथिलयितुं तावदाह— स्यादेतदवभासेषु तेष्वेवावसिते सति। व्यवहारे किमन्येन बाह्येनानुपपत्तिना ॥ ६ ॥ ग्रहण नहीं होगा—यह व्याप्ति ही नहीं बनेगी और यदि अन्य जीव भिन्न हैं तो अन्य प्रमाओं में रहनेवाले आभास का भेद ही रहेगा, [ 'ज्ञानाद्व्यतिरिक्तं च' ज्ञान से अभिन्न अर्थान्तर कैसे होगा, यह आचार्य धर्मकीर्ति का कथन है।] इसी कारण एक वस्तु में न रहने के कारण एकाभास में रहकर मिले हुए प्रमाताओं का 'शिविका' पालकी के समान व्यवहार नहीं होगा। इस तरह आपस में न मिलने से भूत से ग्रस्त हो जाने के समान मूर्च्छित ही प्रायः जगत् का व्यवहार हो जायेगा। अनुमान किया जानेवाला दूसरा ज्ञान अनुमाता के सम्मत ज्ञान से यदि भिन्न है, तब तो वह प्रमेय ज्ञान से भिन्न है, यही सम्भव हो सकता है, कर्ता और कर्म का तादात्म्य नहीं होने से। एक ही साथ ज्ञान और ज्ञेय का बोध हो सकता है, यह कोई निश्चित नहीं है या हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता है, तो फिर नील-पीतादि समूह ने क्या अपकार किया है, जिस अपकार से प्रमेय के स्वरूप में विश्रान्ति होना तुम विज्ञानवादियों द्वारा नहीं सहन होता है, इससे अन्य प्रमाताओं की असिद्धि ही होगी, सिद्धि मानने पर भी प्रमाताओं के भीतर रहनेवाला आभास ज्ञान प्रत्येक स्थान में आभास की विचित्रता के हेतु वासना में उद्बोध वैचित्र्य पैदा कर देंगे; क्योंकि नियम में कोई हेतु नहीं है, ऐसा यत्न करने पर भी नीलादिकों की विचित्रता में विचित्रताओं की अनुपपत्ति ही होगी। इससे यह बात रह गयी, अभिन्न चिन्मात्र ज्ञान आकस्मिका- भास भेद का हेतु नहीं बन सकता है इसीलिए बाह्यार्थ अनुमेय है यह बात सम्भव है और यही बाह्यार्थवादी का कहना है दोनों श्लोकों का यही अर्थ है। 'चेत्' शब्द दोनों श्लोकों के वाक्यार्थ की शङ्का का द्योतक है ॥ ४-५ ॥ बाह्यार्थवादी द्वारा को हुई आशङ्का को दृढता पूर्वक बतलाया, किन्तु अब उस सम्भावना को शिथिल करने के लिए [इसके बाद में ईश्वर अद्वैतवादी] कहेंगे—
अ.-१, आ.-५ का.-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९१ स्यादेतत्—इति पूर्वोक्तसम्भावनाभ्युपगमे यदा व्याख्यायते तदा किं तु इति वाक्यशेषेण तच्छैथिल्यविषयं सम्भावनान्तरं शेषश्लोकेन दर्श्यत इति व्याख्येयम् । यदि तु अध्याहारो न सह्यते तदा स्यादेतदिति इदमपि सम्भावनान्तरं स्यात्, यदनेन श्लोकेन उच्यते इति एकवाक्य- तया योज्यम्, अनयापि कष्टकल्पनया बाह्यान् अर्थान् प्रसाधयता भवता तैः न किंचित् कर्तव्यम्, आभासैरेव तैः भवता अभ्युपगतैः व्यवहारसिद्धेः, न हि नित्यानुमेयेन कश्चित् व्यवहार इति किं बाह्येन, यत्र साधकं च नास्ति प्रमाणम्, बाधकं च प्रकाशात् भेदे अनुमेयतयापि प्रकाशना- भाव इति तावत् मुख्यम् । अभ्युच्चयबाधकास्तु अवयविनो वृत्त्यनुपपत्तिः, समवायासिद्धिः, कम्पाकम्पावरणानावरणरक्तारक्तदिग्भागभेदादिविरुद्धधर्मयोगः । अणुसंचयबाह्यवादेऽपि संचयस्य यह सम्भव हो सकता है उन आभासों की समाप्ति होने पर जिसकी उपपत्ति न बैठती हो । ऐसे व्यवहार में अन्य बाह्य-पदार्थ से क्या क्षति आयेगी ॥ ६ ॥ हो सकता है—पूर्वोक्त सम्भावना को मान लेने पर जब व्याख्यान करोगे तब तो इस वाक्य शेष से उसके शैथिल्य विषय की दूसरी सम्भावना को शेष श्लोक से बताते हैं—ऐसी व्याख्या करना ठीक है । यदि अध्याहार-समुच्चारण सह्य नहीं होता हो, तब तो यह भी दूसरी सम्भावना हो सकती है, जब कि इसी श्लोक से यह कहा जाता है—ऐसी एक वाक्यता जोड़नी चाहिए वाक्य भेद करना समुचित नहीं होता, [ अब दोनों के पक्षों में समान अर्थ हो गया । ] इस कष्टदायी कल्पना से भी बाह्य-अर्थों की सिद्धि करोगे तभी भी उन बाह्य-अर्थों से प्रयोजन कुछ सिद्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि जिन आभासों को आपने मान लिया है उन आभासों से ही व्यवहार की सिद्धि हो जायेगी, नित्य अनुमेय से कोई भी व्यवहार नहीं होगा, अप्रकाशमान होने के कारण बाह्यार्थ से क्या उपस्थित है । जहाँ पर साधक कोई प्रमाण नहीं है, और बाधक प्रमाण प्रयोजन है, क्योंकि प्रकाश से भेद होने पर अनुमेय से भी प्रकाशन का अभाव मुख्य रहता है । प्रकाश से भिन्न अप्रकाश होता है तो यही अधिक बाधक प्रमाण हो गया; इस इस विषय में जैसा भी सोचो, किन्तु जब प्रकाश से भिन्न मानोगे तब तो वह अप्रकाश हो ही जायेगा । इसका प्रकाशित न होना ही एकमात्र निष्कर्ष निकलता है अवयवों में अवयवी रहता है तथा अवयवी का अवयवों में नहीं रहना ही अभ्युच्चय बाधक कहलाता है, अर्थात् जब १. पूर्व में तो प्रमाण के व्याज से प्रवृत्त हुए बाधक को कह दिया किन्तु अब अपने आप भी प्रमेय के अपने निरूपण में प्रवृत्त हुए प्रवृत्ति द्वारा प्रवृत्त प्रमेय के स्वरूप का उन्मूलन कर देना ही इसका अधिक बाधकत्व है । २. हाथ चलता है इसमें केवल हाथ का ही चलन हो रहा है, सारे शरीर का नहीं होता है, तभी अवयव और अवयवी की युतसिद्धि हो जाती है । न्यायकन्दली में इसका प्रतिपादन किया हुआ है । हाथ के कम्पन होने पर हाथ के आश्रयभूत शरीर का कम्पन होता हुआ नहीं देखा जाता अथवा पैर का कम्पन होने पर तद्गत शरीर कम्पित होता नहीं देखा जाता, यही इसमें विरुद्धधर्मता मिलती है । उसी प्रकार एक अवयव के ढक जाने पर उसमें समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले अवयवी का ग्रहण नहीं
९२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-६ अन्यस्य अभावे अणव एव, ते च यदि संयुज्यन्ते निरन्तरतया तत् अवश्यं दिग्भागभेदः, देवनाक्षे षट्सु दिक्षु संचीयमानेषु षट्सु अणुषु मध्यमस्य परमाणोः यत्रैव धाम्नि एको लग्नः तत्रैव यदि अपरः तत् एकपरमाणुमात्रता । अथ अन्यत्र एकः अन्यत्र अपरः तत् अवश्यं भागभेदापत्तिः, इति भाग एव परमार्थसन्, तस्यापि एषैव सरणिः इति न किंचित् अवशिष्यते बाह्यं तत्त्वतः । न चैतत् वाच्यम् — मूर्तानाम् एकदेशत्वायोगात्, संयोगे भिन्नदेशत्वाव्यावृत्तेः तन्निष्ठं द्व्यणुकं नाम कार्यद्रव्यम् अणुपरिमाणम्, तेभ्यः त्रिभ्यो महत्कार्यम् इति । अवयविवादो हि अयम्, स च पूर्वमेव अपबाधितः । यच्च अव्याप्यवृत्तित्वं संयोगस्य उच्यते तन्निरंशे कथं संगच्छताम् । स्वाश्रये हि यदि असौ समवैति किम् अन्यत् अस्य अवशिष्टम् यत् न व्याप्नुयात् इति, अभ्युच्चयबाधकं च इदम्, इति न अत्र अस्माभिः भरः¹ कृतः । विस्तरेण च प्रज्ञालङ्कारे दर्शितम् आचार्यशंकर- नन्दनेन ॥ ६ ॥ अवयवी वस्तु ही नहीं है तो अवयव किसमें रहेगा, यही वृत्ति की अनुपपत्ति है, समवाय की भी तो असिद्धि हो जाती है, क्योंकि अवयव अवयवी की सत्ता में ही समवाय की सत्ता रहती है, कम्पन-अकम्पन [ स्थैर्य ] आवरण-अनावरण, रक्त-अरक्तादि दिशाओं का भेद विरुद्ध धर्मों के संयोग मूर्त में बाध माना जाता है। अणु समुदायवाद में भी अणु समुदाय दूसरे परमाणु विलक्षण के अभाव में अणु ही रह जाते हैं और वे यदि निरन्तर संयुक्त होकर मिले रहते हैं तब तो अवश्य ही दिशाओं से उपलक्षित होनेवाले भाग का भेद हैं, ऐसी स्थिति में तो दिशाओं में भी भेद मानना पड़ेगा, षट् कोणवाली दिशाओं का ही भेद होता है, परमाणुओं का संयोग- वियोग भी बन सकता है इसो प्रकार वहाँ पर भी मान लो, इसीलिए यथार्थता में बाह्य कोई पदार्थ नहीं है और वह एक परमाणु मात्र का समर्थन भी नहीं कर सकता है मूर्तों के एक स्थान में रहना असम्भव होने से, संयोग हो जाने पर भिन्न देश में रहना नहीं बनेगा उसमें रहनेवाले दो परमाणु कार्य द्रव्य अणुपरिणाम ही रहेगा तीन परमाणु से महत् कार्य होता है। इस अवयवि- वाद का तो हमने पूर्व में ही खण्डन कर दिया है। अव्याप्यवृत्ति संयोग अक्षपाद के मत की आशङ्का कर कहते हैं ‘यच्चेति’—संयोग का अव्याप्यवृत्तित्व निरंश में कैसे हो सकेगा। यदि यह कहो कि अपने आश्रय में संयोग रहता है तो कौन वस्तु ऐसी है जहाँ पर संयोग व्याप्त नहीं होता है और यह बाधकों की भरमार है इसलिए हमने कोई जोर नहीं दिया है और इसका सविस्तार प्रतिपादन श्रीआचार्य शङ्करनन्दन ने प्रज्ञालङ्कार में किया भी है ॥ ६ ॥ होगा, आवरण हट जाने से तो ग्रहण होता है, इस प्रकार एक साथ भी ग्रहण होता है। अब कहो कि अवयवी का सम्बन्ध एक-एक अवयवी के साथ रहता है अथवा सम्पूर्णतया रहता है, एक देश से [ वृत्ति का ] रहना बन नहीं सकता है; अवयव से भिन्न एक देश का अभाव होने से, अथवा सम्पूर्णतया रहता है यह कहो तो भी दूसरे अवयव में वृत्ति नहीं रहती है; क्योंकि एक अवयव के संसर्गावच्छिन्नरूप में दूसरे अवयवों का स्थान न रहने से, उस स्वरूप से अतिरिक्त इसका दूसरा स्वरूप नहीं होने से भी यह बात है । १. भरः—शब्द अतिशय प्रयत्न—अर्थ में है ।
अ.-१, आ.-५, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९३ ननु बाधकं नाम प्रमाणसिद्धे वस्तुनि न किंचित् कर्तुं समर्थम्—तेनैव दृढेन प्रमाणेन बाधकाभिमतस्य बाधितस्य अप्रमाणत्वसम्पादनात् । दर्शितं च इह साधकं प्रमाणं कार्यहेतुः 'तत्तदाकस्मिकाभास' इति कारिकया इत्याशङ्क्य आह— चिदात्मैव हि देवोऽन्तःस्थितमिच्छावशाद्बहिः । योगोव निरूपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ ७ ॥ इह तावत् स्वप्न-स्मरण-मनोराज्य-संकल्पादिषु नीलाद्याभासवैचित्र्यं बाह्यसमर्पकहेतु- व्यतिरेकेणैव निर्भासते इति यद्यपि अस्ति सम्भवः, तथापि तदाभासवैचित्र्यम् अस्थैर्यात् सर्वप्रमात्रासाधारण्यात् पूर्वानुभवसंस्कारजत्वसम्भावनात् अवस्तु इति शङ्क्येत । यत् पुनरिदं योगिनाम् इच्छामात्रेण पुरसेनादिवैचित्र्यनिर्माणं दृष्टम्, तत्र उपादानं प्रसिद्धमृत्काष्ठ-शुक्र- शोणितादिवैचित्र्यमयं न सम्भवत्येव, न हि एवं वक्तुं शक्यम्—सर्वगताः परमाणवो योगीच्छया झटिति संघटिताः कार्यम् आरप्स्यन्ते इति । यत एतत् लोकप्रसिद्धकारणभावानतिक्रमसिद्धये अब प्रश्न करते हैं कि प्रमाण से सिद्ध वस्तु में बाधक प्रमाण कुछ नहीं कर सकता; क्योंकि उस दृढ प्रमाण से जिसको बाधक माने हुए हो उसमें अप्रमाणत्व सम्पादित हो जाता है और इसमें साधक प्रमाण तो कार्य का हेतु है इसे 'तत्तदाकस्मिकाभासः' इस कारिका में दिखा दिया है; इस प्रकार आशङ्का कर कहते हैं— चिदात्मा देव ही अपने भीतर स्थित अर्थसमूह को इच्छाबल से बाहर की ओर प्रकाशित करते हैं जैसे योगी उपादान कारणादि के बिना भी अर्थसमूह को प्रकाशित करते हैं ॥ ७ ॥ स्वप्न, स्मरण, मनोराज्य, संकल्पादि में बाहरी कारणों के बिना भी नीलादि पदार्थ चित्र- विचित्र रूपों से भासित होते हैं, यह सब संभव है, उसी प्रकार आभास की विचित्रता अस्थिर होने से सभी प्रमाताओं में असाध्य होने के कारण पूर्वकाल के संस्कार से ही उत्पन्न होती है इसलिए अवस्तु ही है । जो कि यह योगी लोगों की इच्छा मात्र से पुर, सेना, गढ़-किला आदि का विचित्र-चित्र निर्माण देखा जाता है उसमें प्रसिद्ध उपादन [ कार्य से अभिन्न रहता है जैसे घट के प्रति मिट्टी उपादान कारण होती है ] मिट्टी, काष्ठ, शुक्र, शोणितादि वैचित्र्यमय कारणों की तो संभावना भी नहीं देखी जाती है, ऐसा नहीं कह सकते हो—योगी की इच्छामात्र से सब जगह रहनेवाले व्यापक परमाणु आपस में एक दूसरे से मिलकर शीघ्र ही कार्य संपादन कर देते हैं । जब कि यह लोक प्रसिद्ध कार्य-कारणभाव अनतिक्रम सिद्धि के लिए निरूपण करते हैं । यह प्रसिद्ध १. जिन लोगों ने अपना परम संविद्रूप स्वातन्त्र्य नहीं जाना है उन्हें सदैव संशय-विपर्यय बने ही रहते हैं । जिन्होंने संविद्रूप स्वातन्त्र्य प्राप्त कर लिया है उन्हें तो कभी-कभी दूसरे कारण को खोजने के लिए अन्वेषण नहीं करना पड़ता है । इस विषय में "भट्टदिवाकरवत्स" ने कहा है 'न दृश्यते त्वत्प्रतिभास- शक्तेः स्वप्नेऽर्थवैचित्र्यनिमित्तमन्यत् । तद्दृष्टसामर्थ्यतया सदैव विश्वप्रपञ्चप्रथनेकहेतुः ॥ हे प्रभो ! आपकी प्रतिभा-शक्ति से भिन्न कोई निमित्त अर्थवैचित्र्य के लिए स्वप्न काल में भी नहीं दिखते हैं । विश्वप्रपञ्च का विस्तार करने में एक मात्र कारण संविद्रूप का सामर्थ्य ही है । २. घटरूप कार्य से अभिन्न रहनेवाला उपादान कारण कहलाता है जैसे कि घट के प्रति मिट्टी ।
९४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-७ निरूप्यते । न च एतत् प्रसिद्धम्—परमाणुभ्य एव स्थूलं घटादि जायते इति, किं तु कपालादि- व्यवधानेन, तत्रापि नियंतसहकारिसमवलम्बनम् करचरणादिव्यापारो विशिष्टदेशकालधर्माधि- पत्ययोगः शिक्षाभ्यासप्रकर्ष इति, इयति च आश्रीयमाणे योगी कुम्भं निर्मिमाणः कुम्भकार- प्रसिद्धसमस्तसामग्रीसमर्जनपुरःसरं घटं घटयन् कुम्भकार एव स्यात्, तस्मात् प्रसिद्धकार- णोल्लङ्घने किम् असंचेत्यमानपरमाण्वाद्युपादानकारणान्तरचिन्तया इति । तत्र योगिसंविद एव सा तादृशी शक्तिः—यत् आभासवैचित्र्यरूपम् अर्थजातं प्रकाशयति इति । तत् अस्ति सम्भवः— यत् संवित् एव अभ्युपगतस्वातन्त्र्या अप्रतीघातलक्षणात् इच्छाविशेषवशात् संविदोऽनधिकात्म- ताया अनपायात् अन्तःस्थितमेव सत् भावजातम् इदमित्येवं प्राणबुद्धिदेहादेः वितीर्णकियन्मात्र- संविद्रूपात् बाह्यत्वेन आभासयति इति, तत् इह विश्वरूपाभासवैचित्र्ये चिदात्मन एव स्वातन्त्र्यं किं न अभ्युपगम्यते स्वसंवेदनसिद्धम्, किमिति हेत्वन्तरपर्येषणप्रयासेन खिद्यते । एवकारेण इदमाह—सर्वेण तावत् वादिना विषयव्यवस्थापनं संविद्रूपम् अनपह्नवनीयम् आदिसिद्धं हि तत् इति उक्तम् । तस्य च स्वातन्त्र्यमेव देवशब्दनिर्दिष्टं चिद्रूपत्वम्, इति किम् अपकारणान्वेषण- व्यसनितया । हि यस्मात् एवं प्रकाशयति देव इति सम्भाव्यते, तस्मात् किं बाह्येन अनुपप- त्तिना, इति पूर्वेण सम्बन्धः ॥ ७ ॥ नहीं है कि परमाणुओं से ही घटादि की उत्पत्ति होती हो । किन्तु दो कपाल आपस में जब मिलते हैं तभी घट तैयार होता है, उसमें भी नियत सहकारी कारणों [घटरूप कार्य से भिन्न देश में रहने- वाले जैसे चक्र, दण्ड, चीवरादि सहकारी कारण कहलाते हैं] का अवलम्बन करना, हाथ, पैर आदि के व्यापार विशिष्ट देश-काल धर्म का योग होना अपेक्षित है । घट निर्माण के लिए घट सम्बन्धी शिक्षा, ज्ञान एवं अभ्यास का होना आवश्यक होता है । इतनी वस्तु-सामग्री के रहने पर योगी घट बनावे तो कुम्भकार ही सिद्ध हो जायेगा, इसलिए प्रसिद्ध कारण के उल्लंघन करने में जो संभव नहीं है उस परमाणु से भिन्न कारण की चिन्ता करना व्यर्थ है । उसमें तो योगी के ज्ञान की ही वह वैसी शक्ति है—जो आभास वैचित्र्यरूप से अर्थसमूह को प्रकाशित करती है । इसलिए संभव हो सकता है जो कि संवित् ही अपनी मिली हुई स्वतंत्रता से, निर्बाधरूप से, इच्छा विशेष से, अधिक न होनेवाली संवित् का नाश न होने से, भीतर रहनेवाले पदार्थ समूह को ही बाहर में प्राण, बुद्धि, देहादि रूप से, कुछ फैली हुई संविद्रूप से, बाहर में आभासित करती है, इसलिए बाहर के भावपदार्थों की विचित्र-चित्ररूपता में चिदात्मा का ही स्वातन्त्र्य क्यों नहीं मान लेते हो जोकि वह स्वयं संवेदन ज्ञान से सिद्ध है, क्यों दूसरे-दूसरे हेतु के खोजने के परिश्रम से खिन्न होते हो । 'एवकार' शब्द से यह कहते हैं कि सब वादी से विषय की व्यवस्था संविद्रूप मानो जाती है जो कि आदि सिद्ध है उसे हमने पहले ही कह दिया है और उसके स्वातन्त्र्य को 'देव' शब्द से व्यक्त किया है, क्यों दूसरे कारण को खोजने में व्यसनी बनते हो, 'हि' जिससे ऐसा यह देव प्रकाशित होता है, ऐसी संभावना करना संभव हो सकता है । इसलिए बाह्य कारण की क्या आवश्यकता है जबकि बन नहीं सकता ॥ ७ ॥ १. 'इति' शब्द वाक्य की समाप्ति अर्थ में दिया गया है । २. घटरूप कार्य से भिन्न देश में रहनेवाले का नाम सहकारी कारण है । जैसे घट के प्रति दण्ड-चक्रादि ।
अ.-१, आ.-५, का.-८-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९५ ननु एवम् उभयथापि सम्भावनानुमानम् उन्मिषति, तत्र किं मुकुरप्रतिबिम्बितघटादि- दृष्टान्तेन ज्ञानप्रतिबिम्बिताभासबैचित्र्ये विज्ञानदर्पणातिरिक्तं तत एव बाह्याभिमतं हेतुं कल्पयेम ? किं वा योगिदृष्टान्तेन संवित्स्वातन्त्र्यमेव हेतुभावेन ब्रूयाम ? तदिदं सांशयिकं वर्तते इति आशङ्क्य बाह्यार्थानुमानसम्भावनां सूत्रद्वयेन अपाकर्तुमाह— अनुमानमनाभातपूर्वे नैवेष्टमिन्द्रियम् । आभासमेव बीजादेराभासाद्वेतुवस्तुनः ॥ ८ ॥ आभासः पुनराभासाद्बाह्यस्यासीत्कथंचन । अर्थस्य नैव तेनास्य सिद्धिर्नाप्यनुमानतः ॥ ९ ॥ न केवलम् अनन्तरश्लोकनिर्दिष्टाभिः युक्तिभिः प्रत्यक्षेण बाह्योऽर्थो न आभासते, इयदेव हि प्रत्यक्षं—यत् नीलं भाति इति स्वप्रकाशसंविद्रूपं, नाधिकं किञ्चित् इति, यावत् अनुमानेनापि न अस्य बाह्यस्य सिद्धिः इति अपिशब्दः । तत्र अनुमानम् अत्र नैव प्रवर्तितुम् उत्सहते । प्रवृत्त- मपि न प्रकृतसिद्धम् आदध्यात् इति अनेन सूत्रद्वयेन दर्श्यते । तत्र अनुमानं—विकल्पः, सर्वश्च अयं विकल्पोऽनुभवमूल इति प्रसिद्धम् । तेन यत् सर्वथा अनाभातपूर्वम्—अननुभूतचरं तत्र अब शंका करते हैं कि आगे कही जानेवाली दोनों तरह की संभावना से अनुमान निकलता है, [ सर्वथा ही दूसरे में रहनेवाले अनुमान को सिद्ध करना होगा और उस सम्भावनारूप अनुमान से तो दोनों समान ही विकसित होंगे अतः इसमें फिर किसका त्याग किया जाय और किसका ग्रहण किया जाय । ] घटादि का दर्पण में पड़े हुए प्रतिबिम्ब के समान अथवा ज्ञान में जो प्रतिबिम्बता का आभास है उसकी विचित्रता में विज्ञान दर्पण से भिन्न और उसीसे बाहर माने हुए [ अपने सदृश दूसरे भाव-पदार्थ का संक्रमण होना ] हेतु की क्या कल्पना करोगे ? अथवा योगी के दृष्टान्त से ज्ञान की ही स्वतन्त्रता को हेतुभाव से क्या हम कहेंगे ? यही बात सन्देह में पड़ी हुई है ऐसी आशंका कर बाह्यार्थ के अनुमान की सम्भावना को दूर करने के लिए दो श्लोकों से कहते हैं— पूर्व में जिसका आभास नहीं हुआ है उसका अनुमान नहीं होता, हेतु देने योग्य जो बीजादि वस्तु है उस आभास से इन्द्रियाँ आभासित ही होती हैं ॥ ८ ॥ बाहर के आभास से किसी भी तरह उसका आभास था इसलिए बाहर का अनुमान नहीं हो सकता है, हेतु से अर्थ की सिद्धि नहीं हो सकती और अनुमान से भी नहीं हो सकती ॥ ९ ॥ इसके पूर्व में दिखाये गये श्लोक की युक्तियों से भी नहीं अपितु प्रत्यक्षरूप से भी बाह्य अर्थ नहीं आभासित होता है, इतना ही प्रत्यक्ष है जो नील आभासित होता है—इसे पूर्व में ही कह दिया है, अब कुछ भी अधिक कहना शेष नहीं रह जाता है। 'अपि' शब्द का अर्थ है कि अनुमान से भी इसकी सिद्धि नहीं होगी। अनुमान की भी इसमें प्रवृत्ति नहीं होती है। प्रवृत्त हो भी जाय तो भी बाह्यार्थ की सिद्धि नहीं कर सकता, यह बात दोनों सूत्रों से बतलायी जाती है। अनुमान-विकल्प करना, और समस्त विकल्प अनुभव मूलक ही रहता है यह सर्वजन विदित ही
९६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-८-९ अनुमानम् अनुमितिव्यापारो विकल्पात्मा नैव केनचित् वादिना इष्यते । ननु भवतु प्रत्यक्षतो दृष्टेऽनुमाने संकथा इयम्, सामान्यतो दृष्टे तु किं वक्ष्यसि यथा अर्थोपलब्धया इन्द्रियानुमाने ?, उच्यते—तत्रापि विकल्पेन यथा सोऽर्थः स्पृश्यते तथा अनुमेय इति स्थितः । विकल्पश्च न इन्द्रियादिकम् अर्थं केनचित् संनिवेशविशेषात्मना स्पृशति, अपि तु किंचिदुपलब्धेः कारणम् इति अमुना स्वभावेन, स च स्वभावः कारणतालक्षणः प्रत्यक्षगृहीत एव । तथा च बीजात् अङ्कुरः तन्तुभ्यः पट इत्यादौ कार्यकारणभावः प्रत्यक्षानुपलम्भबलेन तावत् निश्चेयः । तत्र च प्रत्यक्षं प्रत्याभासं प्रामाण्यं भजते, विमर्शलक्षणस्य प्रमितिव्यापारस्य एकैकशब्दवाच्येऽर्थे विश्रान्तेः, तदनुसारित्वाच्च प्रमाणस्य इति वक्ष्यते । 'एकाभिधानविषये मितिर्वस्तुन्यबाधिता ।' इति । आभासमात्रं च सामान्यम् इति निर्णेष्यते । अनुपलम्भोऽपि अन्योपलम्भरूप आभासमात्रविश्रान्त एव—इति कारणाभासो विशेषशून्यः परिगृहीत एव बीजात् अङ्कुर इति प्रतीतो यत् यं-यं नियमम् अनुविधत्ते अव्यतिरिक्तम् तत् तस्य कार्यम्, इति प्रतिघटं मृत्तिकादिरूपस्य हेतुतद्धन्मा- त्रस्य आभासात्, साभासात् बाह्यः पुनरनाभासरूपः, स च आभासते इति विप्रतिषिद्धम् । अनाभाते च नास्ति विकल्परूपस्य अनुमानस्य व्यापारः । ग्रामगृहादेस्तु यत् बाह्यं तत् अग्रामादिरूपं न उच्यते—प्रत्येकं वाटातूपकुड्यतुलादेः बाह्यत्वप्रसङ्गात् अपि तु तत्संनिकृष्टम्, तस्मात् ग्रामबाह्यम् आभासबाह्यम् इति च शब्दसाम्यमात्रम् एतत् न वस्तुसाम्यम् । एवं ये है। इसलिए जिसका पूर्व में आभास नहीं हुआ है उसमें अनुमान जो अनुमिति का व्यापार है उसका विकल्परूप किसी भी वादी को इष्ट नहीं है, भले ही प्रत्यक्ष से दृष्ट अनुमान के रहने पर हो, किन्तु सामान्यतो दृष्ट में क्या कहोगे, जैसा कि अर्थ उपलब्धि से इन्द्रियों के अनुमान में ? उत्तर देते हैं—सविकल्प और निर्विकल्प का प्रत्यक्ष में भी विकल्प से जैसा अर्थ आभासित होता है वैसा ही अनुमेय भी होता है और विकल्प किसी संनिवेश विशेष से इन्द्रियादि पदार्थ को नहीं स्पर्श [ प्रकाशित ] करता है, अपि तु किंचित् उपलब्धि के कारण इन्द्रियाँ हैं इसी कारण से, और वह स्वभाव प्रत्यक्ष से ही गृहीत होता है । वैसा ही बीज से अंकुर और तन्तु से पट इत्यादि में कार्य- कारणभाव प्रत्यक्ष और अनुपलब्भ से निश्चय होता है । और प्रत्यक्ष तो सभी आभास में प्रमाण होता है, विमर्शरूप जो प्रमा का व्यापार है उसके अभिधेय अर्थ में भासित होता है, और तदनुसार प्रमाण कहेंगे । 'एकाभिधानविषये मितिर्वस्तुन्यबाधिता' और आभास मात्र को सामान्य रूप से निर्णय करेंगे । अनुपलब्भ को भी अन्य उपलम्भरूप आभासमात्र में ही विश्रान्त रहेगा, जिसके रहने पर जो नियम से होता है वही उसका कार्य माना जाता है जैसा कि मिट्टी से घट और बीज से अंकुररूप, प्रत्येक घट में मिट्टी का आभास रहता है उसी का हेतुरूप से आभास होता है, जब आभास सहित होने के कारण बाह्य अनाभास रूप है और भासित होता है यह तो परस्पर विरुद्ध है । जब अनाभास होनेसे विकल्परूप अनुमान का व्यापार नहीं बन सकता । ग्राम, गृहादि से जो वस्तु बाह्य है उसे अग्राम, गृहादिरूप नहीं कहा जाता है यदि बाह्यरूप माना जाय, तो फिर प्रत्येक देश में रहनेवाले भित्तिका अर्थात् दीवाल, तुलादि को भी बाह्य रखना होगा । अपितु उसके भीतर की ही बात कही जाती है ग्राम के बाहर होने पर भी ग्राम की ही ये वस्तुएँ हैं ओर यह व्यवहार देखा भी जाता है, इसलिए ग्राम से बाह्य और आभास बाह्य मात्र एक कथन ही है वस्तु साम्य नहीं है अर्थात् इसमें दूसरा कोई अभिप्राय नहीं है । एवं विकल्प में वस्तु
अ.-१, आ.-५, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९७ विकल्पे वस्तु न आभाति इति मन्यन्ते तेषामपि तावत् अनुमानविकल्पो न बाह्ये उपपन्नः । अस्माभिस्तु उपपादितम्—अध्यवसायस्यापि आभासमानविषयत्वम् 'भ्रान्तित्वे चावसायस्य' इति सूत्रे । तेन अनुमानविकल्पात्मनापि प्रकाशेन यदि अनाविष्टो नीलादिः अर्थः तत् न अनुमित एव स्यात् । अथ आविष्ट एव, तर्हि 'प्रागिवार्थोऽप्रकाशः स्यात्' इति न्यायेन प्रकाशमात्रस्वभाव एव, न बाह्यः । तेन बाह्ये साध्ये यत् किंचित् प्रमाणम् आनीयते, तदबाह्यतामेव प्रत्युत प्रसाधयति इति विरुद्धमेव, अत एव आह 'कथंचन' इति, केनापि प्रकारेण प्रत्यक्षात्मना अनु- मेयात्मना वा आभासनम् आभासो बाह्यस्य अनाभासस्य न कदाचित् अभूत् इति, तस्मात् सिद्धम् 'चिदात्मैव हि देव' इति ॥ ८-९ ॥ ननु अन्तःस्थितं बहिः प्रकाशयेदित्युकतं तत् अन्तःस्थितत्वम् उपपादनीयम् इति आशङ्क्य आह— स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य भावजातस्य भासनम् । अस्त्येव न विना तस्मादिच्छामर्शः प्रवर्तते ॥ १० ॥ आभासित नहीं होती है ऐसा जो बौद्ध मानते हैं, उनका भी अनुमान विकल्प बाह्य में नहीं हो सकता । किन्तु हमने तो इसका 'भ्रान्तित्वे चावसायस्य' सूत्र में प्रतिपादन कर दिया है [ 'भ्रान्तित्वे' यह उपलक्षण है, इसलिए 'भासयेच्च स्वकालेऽर्थात्' इत्यादि से कहा है और 'केवलं भिन्नसंवेद्यः' इत्यादि में कहेंगे ] इसलिए अनुमान विकल्परूप प्रकाश से यदि नीलादि अर्थ आविष्ट नहीं है तो उसका अनुमान नहीं बनेगा; यदि कहो कि आविष्ट है तो 'प्रागिवार्थोऽप्रकाशः स्यात्' इस युक्ति से प्रकाशमात्र स्वभाव ही होगा, बाह्य नहीं है । बाह्य साध्य में जो कुछ प्रमाण ले आयेंगे वह तो अबाह्यत्व को ही सिद्ध करेगा इसमें तो आपको विरुद्ध ही दिखायी पड़ेगा, इसलिए कहते हैं 'कथंचन' किसी प्रकार भी प्रत्यक्षरूप से, अनुमेयरूप से आभासन वा आभास का अनाभास कभी भी नहीं हुआ, इसलिए 'चिदात्मैव हि देवः' चिदात्मा ही देव है—यह सिद्ध हुआ ॥ ८-९ ॥ अब इस पर प्रश्न करते हैं कि अन्तःकरण में अवस्थित रहे हुए का ही बाहर में प्रकाश होता है ऐसा जो कहा गया है उसे ही सिद्ध करना है [ यदि चिदात्मा देव में रहनेवाली पदार्थ राशि है तो फिर क्यों नहीं भासित होती है इसे युक्ति द्वारा साधते हैं ] इस तरह आशंका कर कहते हैं— चिदात्मा देव में रहनेवाले ही अर्थ-समूह भासित होते हैं । इसलिए उनमें अर्थराशि तो रहतो है किन्तु इच्छा के बिना परामर्श नहीं हो सकता है ॥ १० ॥ १. संवेदन ज्ञान के भीतर बाह्य अर्थ का प्रतिबिम्ब रहता है प्रतिबिम्बरूप आभास का उत्थापक है अर्थात् अन्तःकरण में ज्ञान का आभास तभी रहता है जब बाहर में पदार्थ विद्यमान रहता है इसमें कोई प्रमाण नहीं है इससे सिद्ध होता है कि चिदात्मा देव ही सब कुछ है बाह्यरूप कुछ भी नहीं है । २. बाहर में अवभासित होनेवाले पदार्थ समूह का अवभासन केवल इदन्तारूप से ही होना यह सकल लोक में प्रसिद्ध नहीं है जब कि भगवान् महेश्वर में अन्तःस्थितरूप से भी अवभासन रहता ही है, और बाहर में इदन्ता का उल्लास न होने कारण अहन्तारूप से अन्तर में नहीं है यह भी बात नहीं है अपितु अन्तर में सदैव आभास बना ही रहता है । ३. इसका यह आशय है कि चिदात्मा ईश्वर का जैसे अभेद में आभास होता है वैसे ही समस्त अर्थों में १३
९८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१० बहीरूपतयापि आभासने अन्तरूपता न त्रुट्यति 'प्रमात्रैकात्म्यमान्तर्यम्' इति हि वक्ष्यते, तच्च सदैव प्रकाशस्य प्रमातृत्वात्, तदात्मतया च विना प्रकाशमानस्य अवस्तुत्वात्, किं तु तत्र अहम् इति उचिते परामर्शे योऽयम् इदन्तापरामर्शः सैव बाह्यता, तच्च इह अन्तःस्थितत्वम् अह मित्येतावता चित्समुचितेनैव वपुषा परामर्शनम्, तच्च इह नीलादीनामस्त्येव, न तु नास्तिइति, यदि हि न स्यात् कुम्भकृतो 'घटं करवाणि' इति य उत्तरक्रियापेक्षया इच्छाशब्दवाच्यः परामर्शः एषणीयात्मना, स परामृश्येन अनियन्त्रितः चेत् ततः पटेच्छापि सा न कस्माद्इति संकीर्येरन् व्यवहाराः । अथ तत्रापि च एषणीयः तदानीमेव निर्मितः सम् तथा जातः, तर्हि तन्निर्माणं चिदा- त्मनि विनेच्छया नोपपन्नम् इति । 'तिष्ठासोरेवमिच्छैव हेतुता ।' इत्यत्र वर्णयिष्यते । ततश्च इच्छान्तरमपि विषयनियन्त्रितं ? न वा ? इति विकल्पेनानवस्था । विषयनियन्त्रितं चेत् स्यात् आत्मतैव जाता, न चेत् घटे पटेच्छा स्यात् । अथ तत्रापि तदानीमेव इति कृत्वा अनवस्था, तस्मात् सर्वोऽयं भावराशिः चिदात्मनि अहम् इत्येव वपुषा सततावभासुरवपुः ऐश्वर्यरूपाच्च स्वातन्त्र्य- लक्षणात् स्वामिभावात् विचित्रेण वपुषा क्रमाक्रमाविना संवित् एनं बहिष्करोति प्रमातृभेदप्रथन- पदार्थराशि बाहर रूप से प्रकाशित होने पर भी उसका भीतर रहना बना रहता है खण्डित नहीं होता है 'प्रमात्रैकात्म्यमान्तर्यम्' क्योंकि ऐसा आगे कहा जायेगा और वह भीतरी प्रकाश सदैव बाहर में भी प्रकाशित होता रहता है प्रमातारूप होने के कारण और उसके बिना प्रकाशमान न होने से अवस्तु हो जायेगी किन्तु 'अहं' इस समुचित परामर्श में जो यह इदन्ता परामर्श है उसी का नाम बाह्यरूपता है और यहाँ पर भीतर रहनेवाले 'अहम्' इस शब्द से समुचितरूप में परामर्श करना इतना ही माना जाता है वह नीलादि भाव-पदार्थों में रहता ही है, नहीं रहता है, ऐसी बात नहीं है, यदि वह न रहे तो कुम्भकार 'घटं करवाणि' द्वारा घट का निर्माण होना, मैं आज घट बनाऊँगा ऐसी आगे की क्रिया को लेकर इच्छा शब्द से कहे जानेवाला परामृश्यमान जो घट है उससे नियन्त्रित नहीं होगा, तब तो अन्तर में स्थित परामर्श को पट इच्छा क्यों न मानी जाय ? इस प्रकार सारा व्यवहार संकीर्ण होकर आपस में मिल जायेगा । अब कहो कि उस समय जो इच्छा का विषय है वह उसी समय उत्पन्न होगा, तब तो चिदात्मा में बिना इच्छा से कोई वस्तु-पदार्थ का निर्माण ही सिद्ध नहीं हो सकेगा 'तिष्ठासोरेवमिच्छेव हेतुता ।' इसका वर्णन किया जायेगा और इससे दूसरी इच्छा भी परामृश्यविषय से नियन्त्रित रहेगी ? या नहीं रहेगी ? ऐसा विकल्प करते करते अनवस्था हो जायेगी । यदि विषय से सम्बद्धता रखती है तो आत्मस्वरूप ही हो गया, यदि घट में पट इच्छा न हो तो दूसरी इच्छा में भी इसी ढङ्ग से अनवस्था हो जायेगी, इसलिए समस्त पदार्थराशि अहँरूप चिदात्मा में निरन्तर भासित होते रहना उसका स्वरूप नहीं है और ऐश्वर्यरूप से, स्वातन्त्र्यरूप से, स्वामी होने से, चित्र विचित्ररूप कार्य-कारणभाव के क्रम से अथवा अक्रम से संवित् ज्ञान ही इस पदार्थ राशि को बाहर की ओर प्रकाशित करता है, प्रमातृभेद के विस्तार के साथ, उसमें भी कहीं पर आभास में प्रमातृवर्ग को एक कर देता है । जैसे नृत्य करनेवाली नर्तकी अपनी भावभङ्गी से भी अभेद पूर्वक ही आभास होता है—अर्थात् अपने स्वरूप में पदार्थों का भी अभिन्नरूप से ही प्रकाश है, नहीं तो भासमान होनेवाले अर्थरूपी विषय प्रमाता का इच्छारूप विमर्श नहीं हो सकता है ।
अ.-१, आ.-५, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९९ पूर्वकम्, तत्रापि केचित् आभासे प्रमातॄन् एकीकरोति नितम्बिनीनृत्त इव प्रेक्षकान् । तावति हि तेषाम् आभासे ऐक्यम् । शरीरप्राणबुद्धिसुखाद्याभासांशेषु तु भेदस्य अविगलनात् न सर्वथा ऐक्यम् । अत एव प्रतिक्षणं प्रमातृसंयोजनावियोजनावैचित्र्येण परमेश्वरो विश्वं सृष्टिसंहारादिना प्रपञ्चयति । तदुक्तमाचार्येण—‘सदा सृष्टिविनोदाय सदा स्थितिसुखासिने । सदा त्रिभुवनाहार- तृप्ताय भवते नमः ॥’ इत्यादि । श्रीभट्टनारायणेनापि—‘मुहुर्मुहुरविश्रान्तस्त्रैलोक्यं कल्पनाशतैः । कल्पयन्नपि कोऽप्येको निर्विकल्पो जयत्यजः ॥’ इति । तस्मात् स्थितम् अन्तःस्थितं भावजातं— तेन विना तद्विषयस्य परामर्शस्य अयोगात् इति ॥ १० ॥ प्रेक्षकवर्ग की दृष्टि को अपनी ओर एक सी कर देती है । उतने अंश में ही उनके आभास में ऐक्य रहता है । शरीर, प्राण, बुद्धि और सुखादि का आभास के भागों में भेद न टूटने से सर्वथा ऐक्य नहीं होता है । इसलिए परमेश्वर प्रतिक्षण प्रतिपल प्रमाताओं के संयोजन [मलप्रेक्षादि में ] वियोजन [ अन्यत्र ] की विचित्रता से सारे विश्वको सृष्टि, स्थिति, संहार-प्रलयादि द्वारा प्रपञ्चित किया करते हैं । आचार्यपाद ने भी कहा है—‘सदा-सर्वदा विनोदरूपी सृष्टिकारनेवाले सदा सुखार्थ स्थितिरखनेवाले उसे अपने में लय करके परितृप्त हो जानेवाले ऐसे आपको नमस्कार हो ।’ इस प्रकार श्री भट्टनारायण ने भी कहा है—‘सैकड़ों कल्पनाओं से तीनों लोकों की बारम्बार कल्पना करते हुए भी विश्रान्ति लेनेवाले कोई एक निर्विकल्प अज की जय हो ।’ इसलिए मानना पड़ेगा कि चिदात्मा के भीतर पदार्थ समूह रहता है उनकी इच्छा के बिना परामर्श नहीं हो सकता ॥ १० ॥
१. आशय यह है कि सर्वशक्तिसम्पन्न शिवत्व का विभाग अवस्था में भी वैसा ही स्वरूप रहता है जैसा कि नर्तकी का नृत्याभास प्रेक्षकगण की दृष्टि को एक ही साथ अपने अभिमुख एकत्रित कर लेने में होता है । श्रीसोमानन्दपादने शिवदृष्टि शास्त्र में सर्वत्र शक्ति पञ्चक स्वभाव का उपसंहार करते हुए कहा है— ‘एवं न जातुचित्तस्य वियोगस्त्रितयात्मना । शक्त्या निर्वृतचित्तस्य तद्भागाविभागयोः ॥’ तथा च स्फुटमेव तेनैव प्रत्यभिज्ञापितम्, यथा । ‘यदा तु तस्य चिद्धर्मप्रभावामोदजृम्भया ॥ विचित्ररचना नानाकार्यसृष्टिप्रवर्तने । भवत्युन्मुखिता चित्ता सेच्छायाः प्रथमा तुटिः ॥’ इत्यस्य प्रस्तावे सा च दृष्ट्या हृदुद्देशे कार्यस्मरणकालतः । प्रहर्षवेगसमये दरसन्दर्शनक्षणे ॥ अनालोचनतो दृष्टे विसर्गप्रसरास्पदे । विसर्गोक्ति प्रसङ्गे च वाचने धावने तथा ॥ एतेष्वेवप्रसङ्गेषु सर्वशक्तिविलोलता । इति ।
१०० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-११ ननु परामर्शो नाम विकल्पः, स च अविकल्पशुद्धसंविद्वपुषि भगवति कथं स्यात् इत्याश- ङ्क्याह— स्वभावमवभासस्य विमर्शं¹ विदुरन्यथा । प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि² स्फटिकादिजडोपमः ॥ ११ ॥ 'एकोऽहं बहुस्याम्' भीतर रहता है तभी इच्छा होती है अन्यथा इच्छा ही नहीं होगी । इस पर कहते हैं कि परामर्श का नाम इच्छा है और वह इच्छा वेद्य की अपेक्षा रखती है । उस विशुद्ध, अविकल्प, संवित्स्वरूप भगवान् में कैसे होगी—ऐसी आशङ्का उठाकर उत्तर में कहते हैं— इस प्रकार इच्छा, ज्ञान और क्रियारूप शक्ति से जिसका कभी भी वियोग नहीं होता, चिद्रूप की स्थिति अन्तर में एवं बाहर में एक सी ही रहती है । विभाग में जैसी शक्तिपञ्चक की स्थिति रहती है वैसा ही कहना चाहिए—इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं— शुद्ध बोधरूप शिवतत्त्व में शक्तिपञ्चक के ऐक्यभाव का समर्थन कर देने पर और उस प्रसङ्ग के माध्यम से अपर अवस्था में भी चिद्रूप की वैसी ही चिदानन्दमय स्थिति अवस्थित रहती है । शक्तिरूप अवस्था जो परा-अपरा हैं उसमें भी इच्छादि पाँच निहित ही हैं यहाँ इससे द्योतित हो रहा है । चिद्रूप शिवभट्टारक का जो धर्म-स्वभाव है वही तो पञ्चविधकृत्य विभव है जो कि सृष्टि, स्थिति, प्रलय अनुग्रहादि करते रहते हैं । आमोद-प्रमोदरूप तथा स्वरूप परामर्शरूप से चिद्रूप का विकास होता है । अनेक प्रकार की सृष्टिकार्य की रचना में निरन्तर चिद्रूप की ही तो उन्मुखता झलकती है तब वह त्रुटि सूक्ष्म काल से परिच्छिन्न होनेवाली इच्छा-शक्ति की प्रथम अवस्था कही जाती है । वह सूक्ष्म उन्मुख-शक्ति हृदयस्थल में, कार्य के स्मरणकाल में तथा हर्ष के हेतुभूत पुत्रादि के जन्म समय में, भय के प्रथम क्षण में, अकस्मात् किसी को देख लेने पर, धातु के विसर्ग अवस्था के अन्त में तथा विसर्जनीय भाषण के प्रसङ्ग में, त्वरित गति से ग्रन्थ के पठन काल में और दौड़ने में इन्हीं प्रसङ्गों में पूर्वोक्त क्रम से भी शक्तियों की विलोलता अतिसूक्ष्म भावरूपता देखने में आती है स्पन्दन शास्त्र में भी कहा है— अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोति वा मृशन् । धावन्वा यत्पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ इति । अत्यधिक क्रोध को चरम अवस्था पर पहुँचा हुआ अथवा प्रहर्ष की पराकाष्ठा पर पहुँचा हुआ [ अकस्मात् किसी कारण से मैं क्या करूँ ? ] इस किं कर्तव्य विमूढता की स्थिति में पड़ा हुआ व्यक्ति जिस भी अवस्था में प्रविष्ट होता है उसी में स्पन्दता की झलक देखता है । १. जिन्होंने अपने स्वभाव परामर्श को प्राप्त कर लिया है वे ही विमर्श को अच्छी तरह जानते हैं । विमर्श 'अहम्' ऐसा असांकेतिक, स्वातन्त्र्यरूप, आत्मविश्रान्ति स्वभाववाला है, वेदवेत्ता लोग इन मन्त्रशरीर, श्रीमातृका, श्रीमालिनीयादि तत्त्व को मानते हैं । २. प्रकाश का मुख्य रूप प्रत्यवमर्श है, उसके बिना अर्थभेद मात्र स्वच्छ ही रहता है किन्तु चेतनता नहीं रहती, क्योंकि चमत्कार का अभाव उसमें होता है ।