भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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६०/] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-७ मात्रविश्रान्ता अर्थस्य सा कथं प्रकाशः ?, स हि अर्थधर्म एव तथा स्यात्; ततश्च अर्थप्रकाशः तावत्येव पर्यवसितः,--इति गलितो ग्राह्यग्राहकभावः। अतोऽर्थप्रकाशरूपां संविदम् इच्छता बलादेव अर्थोऽपि तद्रूपान्तर्गत एव अङ्गीकर्तव्यः; स च अर्थप्रकाशो यदि अन्यश्च अन्यश्च, तत् न स्मरणम् उपपन्नम्,--इति अत एक एव असौ,--इति एकत्वात् सर्वो वेद्यराशिः तेन क्रोडीकृतः,--इत्येतदपि अनिच्छता अङ्गीकार्यम्। एवमपि सततमेव उन्मग्ने निमग्ने वा विश्वात्मना प्रकाशेत, तथास्वभावत्वात्। न चैवम्, अतः स्वरूपान्तर्बुडितम् अर्थराशिम् अपरमपि भिन्नाकारम् आत्मनि परिगृह्य, कांचिदेव अर्थं स्वरूपात् उन्मग्नम् आभासयति,-इति आपतितम्। सैषा ज्ञानशक्तिः। उन्मग्नाभाससंभिन्नं च चित्स्वरूपं बहिर्मुखत्वात् तच्छायानुरागात् नवं नवं ज्ञानमुक्तम्। एवमपि नवनवाभासाः प्रतिक्षणम् उदयव्ययभाजः,--इति सैव व्यवहारनिवह- हानिः। तेन क्वचित् आभासे गृहीतपूर्वे यत् संवेदनं बहिर्मुखम् अभूत्, तस्य यत् अन्तर्मुखं चित्स्वरूपत्वं तत् कालान्तरेऽपि अवस्थासु स्वात्मगतं तद्विषयविशेषे बहिर्मुखत्वं परामृशति,— इति एषा स्मृतिशक्तिः। यच्च तत् नवं भासयति स्मरति वा तत् वस्तुतः संविदा विश्वमय्या तादात्म्यवृत्ति,--इति विश्वमयं पूर्णमेव,--इति नवं न किंचित् आभासितं स्मृतं वा स्यात् । छिपा नहीं रहता है। यदि वह संवित् = ज्ञान अपने स्वरूप मात्र में विश्रान्त होता हो तो फिर वह अर्थविषय को प्रकाशित कैसे करेगा ? पदार्थधर्म ही उसी प्रकार होता हो तो, पदार्थों का प्रकाश उतने में ही लीन रहता। इससे फिर जितने भी ग्राह्य-ग्राहक भाव हैं, वे सब समाप्त हो जाते हैं। इसीलिए अर्थविषयक प्रकाश करनेवाली संवित् को माननेवाले बौद्ध को हठात् अर्थ का प्रकाश भी उसी (संवित्) के अन्तर्गत मानना पड़ेगा और यदि वह अर्थ प्रकाश कोई दूसरा है और वह उससे भी भिन्न है तब तो फिर स्मरण नहीं बनेगा, इसलिए एक ही यह है, भिन्न नहीं है। एक होने के कारण सब वेद्य-राशि को अपने भीतर सम्मिलित कर लिया, इस प्रकार नहीं चाहते हुए भी मानना पड़ेगा। इसी तरह सर्वदा उन्मग्न और निमग्न होनेवाला विश्वरूपसे प्रकाशित होगा; क्योंकि उसी प्रकार का अपना उसका स्वभाव है और ऐसा नहीं देखा जाता है, इसीलिए अपने स्वरूप से अर्थराशि उसी में डूबी रहती है और दूसरे भी विभिन्न आकारवाले को अपने में सम्मिलित करके स्वरूप से अलग कुछ ही पदार्थ भासित करता है—यही कहना पड़ेगा। वही यह ज्ञान-शक्ति है और शरीरादि से अवच्छिन्न संकुचित प्रकाशरूप बहिर्मुख होने के कारण उसकी छाया के सम्पर्क से नया-नया ज्ञान प्रकाशित होता है—ऐसा कहा गया है। इस तरह ज्ञान-शक्तिके समर्थन करने में नये-नये बहिर्मुखी आभास प्रतिक्षण उदय एवं अस्त होते रहेंगे, वही व्यवहारसमूह का लोप कहा जायेगा। इसलिए कहीं आभास पहले गृहीत होने पर जो ज्ञान बहिर्मुख हुआ था, उसका जो अन्तर्मुख चेतनस्वरूपज्ञान है वह कालान्तर में एवं दूसरी अवस्था में भी अपने विषय विशेष में बहिर्मुखता का परामर्श करता है—इसी का नाम स्मृति-शक्ति है। नया रूप भासित करती है या स्मरण करती है। वस्तुतः वह विश्वमय संवित् से तादात्म्यवृत्ति प्राप्त कर रहती है, इसलिए १. शरीरादि में माया प्रमाता अवच्छिन्न संकुचित स्वभाववाला होकर अपनी अपेक्षा से भिन्न-भिन्न पदार्थों को प्रकाशित करते हैं उसका बहिर्मुखी ज्ञान नया-नया कहा जाता है और उसमें जो ऐश्वर्य, स्वातन्त्र्य है वही ज्ञान-शक्ति है।