ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-३, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ५९ चेत्, विशेषणद्वारेण हेतुमाह 'अन्योन्यं' तावत् 'भिन्नानि' ज्ञानानि-अन्यत् अनुभवज्ञानं, अन्यत् इदानीन्तनं ज्ञानं विकल्पाभिमतं, अन्यत् स्मरणसंमतं ज्ञानं । तत् एतानि स्वविषयप्रकाशमात्र- रूपाणि परविषये जडान्धानेडमूककल्पानि, नच अन्योन्यस्य प्रकाशरूपाणि । एवं न स्वरूपतो न वेद्यतो वा एकीभावरूपम् अनुसंधानम् अस्ति । अन्योन्यं च विषयविषयिभावो नास्ति । नै२च तुर्यं ज्ञातेयनिबन्धनम् अनुसंधानाद्यापि संभाव्यते,–इति ध्वंसेरन् व्यवहाराः । न च ध्वंसन्तामिति भवदभीष्टापमात्रान् ते ध्वंसन्ते प्रकाशन्ते यतः तत एतत् आपद्यते, एतदेव समर्थयितुम् उद्यन्तव्यम्-इति ॥ ६ ॥ तच्च अस्मदभिमतप्रकारेण विना विधेरपि अशक्यसमर्थनम्-इति दर्शयति- न चेदन्तःकृतानन्तविश्वरूपो महेश्वरः । स्यादेकश्चिद्वपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान् ॥ ७ ॥ 'संवित् तावत् प्रकाशते' इति तावत् न केचित् अपह्नुवते । सा तु संवित् यदि स्वात्म- दूसरे को यथार्थ बोध हो जाये इसलिए पञ्चावयववाक्य का उत्थापन किया जाता है 'कुतः' अर्थात् किससे ? यदि ऐसा कहते हो, तो विशेषण के द्वारा हेतु को दिखाते हैं-'अन्योन्यं' परस्पर 'भिन्नानि' भिन्न-भिन्न ज्ञान एक प्रमाता में विश्रान्त होनेवाले ज्ञान के बिना जो दूसरा शुद्ध अनुभवात्मक ज्ञान है, दूसरा इस समय का ज्ञान जो विकल्प से युक्त होता है, 'अन्यत्' शब्द का दूसरा अर्थ यह है कि स्मरणजन्य ज्ञान । इसी कारण वे सभी ज्ञान अपने विषय का प्रकाश मात्र करते हैं दूसरे के विषय में तो जड अन्धे और बहरे के समान हो जाते हैं और एक दूसरे का प्रकाश नहीं कर सकते हैं। इसीलिए न स्वरूपतः स्मृति अनुभव को विषय कर सकती है और न तो अनुभूत को वेद्यरूप से विषय करती है। वेद्य और स्वरूप से भी एकीभावरूप होकर अनुसन्धान नहीं हो सकता है और परस्पर विषय-विषयीभाव भी नहीं हो सकता है । चौथा परस्पर भिन्नों का एक में ज्ञातेयरूप अनुसन्धान भी नहीं हो सकता, क्योंकि उनका होना सम्भव नहीं है इसलिए जगत् के सारे व्यवहार नष्ट हो जायेंगे और 'ध्वंसन्ताम्' ध्वस्त हो जायें ऐसा आपके कहने मात्र से तो न ध्वंस ही हो सकेंगे और न प्रकाशित ही हो सकेंगे, क्योंकि जिससे यह होता है उसीसे उदय भी होता है ॥ ६ ॥ इसीलिए हमारी अभीष्ट इच्छा के बिना विधाता का भी समर्थन अशक्य ही है-इसको दिखाया जाता है-जिसने अनन्त विश्व अपने भीतर कर लिया है, जो ज्ञान, स्मृति और अपोहन शक्तिरूप तथा चेतन शरीरवाला है ऐसा महेश्वर यदि नहीं होता तो (जनस्थिति नष्ट हो जाती ) ॥ ६ ॥ 'संवित् तावत् प्रकाशते' पहले जब तक संवित्-ज्ञान प्रकाशित रहता है तब तक कोई ज्ञान १. स्मृति न तो अनुभव को विषय करती है, न वेद्य से अनुभूत विषय को विषय करती है । २. चकार शब्द अत्यन्त असम्भावना अर्थ में दिया है ।