भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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५८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-६ अथ तु तम् अवसायरूपं स्वसंवेदनांशं स्वाकारं वा अवलम्ब्य अजडत्वम् अस्याः, एवमपि 'अजाड्ये निजं' स्वसंवेदनम् 'उल्लेखश्च' स्वाकारः-इति इयति एषा परिनिष्ठिता स्मृतिः, - इति विषयस्य नामापि ग्रहीतुम् अशक्नुवतः 'ततः' स्मृत्यध्यवसायात् कथं विषयस्य व्यवस्थापनं व्यवहार्यत्वसंपादनसामर्थ्यम् ? ॥ ५ ॥ संस्कारे सत्यपि स्मृतिः न कथंचन घटते, ततश्च परस्परसङ्गतिहीनानि सकलानि ज्ञानानि, - इति यदुक्तं श्लोकपञ्चकेन तत् इदानीं प्रकृते योजयति- एवमन्योन्यभिन्नानामपरस्परवेदिनाम् । ज्ञानानामनुसंधानजन्मा नश्येज्जनस्थितिः ॥ ६ ॥ 'जनस्य' लोकस्य या काचन 'स्थितिः' व्यवहारः सा सर्वज्ञानानां यत् 'अनुसंधान' एक- विषयभावोपपन्नस्मृतिताप्राप्तिरूपं, तत्र आयत्ता । तथा हि-स्मरणनिबन्धनः सर्वो व्यवहारः । प्रथममपि हि प्रत्यक्षज्ञानम् 'अहम्' इति पूर्वापररूपानुसंधानेन स्मरणानुप्राणितेन बिना न घटते, प्रमातरि विश्रान्त्यभावात् अप्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात् । एवं सुखादौ मन्तव्यम् । हानादानप्रेरणा- भ्युपगमादयस्तु व्यवहाराः स्मरणमया एव । 'एवं ज्ञानानां' यत् 'अनुसंधानं' ततो जायमाना 'जनस्थितिः' 'एवम्' इति पराभ्युपगमे सति 'नश्येत्' नश्यति-इति संभाव्यते । कुतः ?-इति ज्ञानरूप स्वसंवेदन अंश का अवलम्बन कर, या अपने आकार का अवलम्बन करके इस स्मृति को चेतन मानोगे तो, ऐसा भी 'अजाड्ये निजं' जो चेतन में अपना ज्ञान या उल्लेख अर्थात् अपने आकार का ज्ञान-इतने में ही यह स्मृति निश्चित हो जाती है, जिस विषय का नाम लेनेमें भी असमर्थ होते हैं 'ततः' उसी कारण स्मृति के ज्ञान से कैसे विषय का व्यवस्थापन होगा और व्यवहार के सम्पादन में सामर्थ्य होगा ? ॥ ५ ॥ संस्कार के रहने पर स्मृति किसी प्रकार से भी नहीं घटती है, इसलिए सकल ज्ञान परस्पर सङ्गति से शून्य होते हैं, जिसको पाँच श्लोकों से कहा गया था; उसको अब प्रकृत प्रसङ्ग से बता देते हैं- इस प्रकार परस्पर एक दूसरे को न जाननेवाले ज्ञानों के अनुसन्धान से उत्पन्न होनेवाला लोक-व्यवहार विनष्ट हो जायेगा ॥ ६ ॥ 'जनस्य' लोगों का बाहर और भीतर की जो 'स्थितिः' व्यवहार वह सब ज्ञानों का 'अनुसन्धान' जो अनुसन्धान करना है वह एकविषयकभाव की स्मृति प्राप्त करना ही है, क्योंकि वह उसी के आधीन रहती है । जैसे कि स्मरणमूलक ही सब व्यवहार होते हैं । प्रथम अनुभव काल में भी प्रत्यक्ष ज्ञान होता है कि 'मैं यह जानता हूँ' इस तरह स्मरण से अनुप्राणित पूर्वोत्तररूप अनुसन्धान के बिना नहीं घटता, क्योंकि प्रमाता में उसका विश्राम नहीं होगा । साथ ही अप्रत्यक्ष का प्रसङ्ग उपस्थित हो जायेगा । इसी प्रकार सुख-दुःखादि में भी समझना चाहिए । छोड़ना, ग्रहण करना, प्रेरणा करना और स्वीकार करना रूप जितने भी व्यवहार हैं वे सभी स्मरणजन्य ही होते हैं । 'एवं ज्ञानानां' इस प्रकार ज्ञानों का जो अनुसन्धान है उससे होने- वाला 'जनस्थितिः' लोक-व्यवहार 'एवं' ऐसा बौद्ध सिद्धान्त के स्वीकार करने पर 'नश्येत्' विनष्ट हो जायेगा यह सम्भव है ।