ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयप्रकाशनात्मना स्मृत्यभिधानाया भ्रान्तेः किंचिदपि सादृश्यम् अस्ति, सर्वथा विषयम- स्पृशन्त्याः ॥ ४ ॥ ननु योऽनुभवो यश्च तद्विषयः स यतः तया अध्यवसीयते, ततः अंशात् सादृश्यम् अनुभवेन स्मृतेः, तत्सिद्धये च संस्कारपरिग्रहः । 'अध्यवसीयते' इति किम् उच्यते ? 'प्रकाशयते' इति चेत् न भ्रान्तित्वं; 'न प्रकाश्यते' इति चेत् पुनरपि विषयो न स्पृष्ट एव अनया,—इति सादृश्यमपि शब्दगडुमात्रम्; तदेतत् दर्शयितुमाह— भ्रान्तित्वे चावसायस्य न जडाद्विषयस्थितिः । इह स्मृतेः अन्यस्य वा भ्रान्तिबोधस्य स्वसंवेदनांशे प्रकाशमाने न भ्रान्तिता, तत्र वैपरीत्याभावात्; यस्तु तत्र अध्यवसीयते स्वाकारः स विपरीततया अस्वाकारत्वेन अर्थतया,— इति तत्र अंशे भ्रान्तिता । स च अंशोऽर्थलक्षणो न स्मृत्या अन्यया वा भ्रान्त्या स्पृश्यते, तत्र असौ तूष्णीका,—इति बलादेव तत्र अंशे जडत्वम् अस्या आयातं घटज्ञानस्येव पटे । नच जडेन विषयस्य किंचित् कृत्यम्, ततश्च अर्थविषयो व्यवहारो विलुप्येत । ततोऽजाड्ये निजोल्लेखनिष्ठान्नान्नार्थस्थितिस्ततः ॥ ५ ॥ साथ स्मृति कही जाने वाली भ्रान्ति का कोई सादृश्य नहीं है, क्योंकि वह विषय को स्पर्श नहीं करती है ॥ ४ ॥ अब शंका करते हैं कि जो अनुभव और उसका विषय जितना जाना जाता है उतने अंश में तो अनुभव का स्मृति से सादृश्य सिद्ध हुआ, और उसकी सिद्धि के लिए संस्कार का भी ग्रहण करना पड़ेगा । 'अध्यवसीयते' इसका आप क्या अर्थ करते हैं ? यदि 'प्रकाशयते' ऐसा इसका अर्थ करते हो तो फिर भ्रान्ति नहीं हुई 'न प्रकाश्यते' प्रकाशित नहीं है ऐसा अर्थ यदि करते हो तो भी स्मृति द्वारा विषय का स्पर्श नहीं हुआ, सादृश्य भी तो निरर्थक मात्र शब्द रह गया; इसीको दिखाने के लिए कहते हैं— भ्रान्ति होनेपर ज्ञान की जड से विषय स्थिति नहीं होती है । यहाँ स्मृति का या उससे भिन्न भ्रान्ति के ज्ञान का अपना ज्ञानांश प्रकाशित होनेपर भ्रान्तिता कहाँ रहेगी; क्योंकि उसमें विपरीतता नहीं है; जब कि उसमें अपनी आकारता का भान होता है वह विपरीत होकर अपना आकारत्व ही भिन्न अर्थरूप द्वारा उस अंश में भ्रान्ति ही होती है । और अर्थरूप वह अंश स्मृति से या भ्रान्ति से नहीं स्पृष्ट होता है, वह वहाँ मौन है, इसलिए बलात् उस अंश में उसकी जड़ता आ जाती है । जैसे घटज्ञान की घटमें और जड वस्तुका विषय के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता है, इससे भी अर्थविषयक व्यवहार लुप्त हो जायेगा । इसलिए चैतन्य में अपनी और उल्लेख को निष्ठा से अर्थ की स्थिति नहीं रहती है ॥ ५ ॥ ८