भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-२, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३५ विकल्पप्रत्ययः । ननु तथापि किम् अनेन विकल्प्यते, शरीरसन्तानो वा कृशोऽहम्—इत्यादि- प्रत्ययात्, ज्ञानसन्तानो वा सुख्यहम्—इत्यादिप्रतीतेः । मत्वर्थीयश्च सन्तानमेव स्पृशति नातिरिक्तम् । तदेतदुक्तम्—'अहंप्रतीतिरपि' शरीरम्, आदिग्रहणात् ज्ञानम् अवस्यति, सन्तान- रूपतया विकल्पयति अवश्यं; सदृशापरापरभावभेदग्रहणसामर्थ्यवासनाविष्टत्वात्—इति । 'एषा' इति न अस्माभिर्निह्नुता, 'साभिलापं विकल्पाय्यम्' इत्यनेन संगृहीतत्वात् । एतदुक्तं भवति— अहंप्रतीतिरेव तावत् न आत्मा, तस्या अपि विकल्परूपत्वात् अस्थैर्याच्च । एतत्प्रतीतिप्रत्ययोऽपि नास्ति अन्यः शरीरादेः, भवन्नपि वा वेद्यपक्षपतितः स्यात्—इति । तथापि संवित्संवेद्यव्यति- अनुगत होकर विकल्प का बोध कराता है । प्रश्न करते हैं कि इससे तुम क्या विकल्प करते हो, 'मैं कृश हूँ' इत्यादि प्रत्यय से शरीर-सन्तान का विकल्प करते हो ? या 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि ज्ञान सन्तान का विकल्प करते हो ? क्योंकि मत्वर्थीय जो प्रत्यय है वह सन्तान को ही स्पर्श करता है किसी अन्य को नहीं । इसीलिए यही कहा जाता है कि अहं-प्रतीति भी शरीर को ही स्पर्श करती है आदि ग्रहण से ज्ञान को भी लिया जाता है, सन्तान रूप से अवश्य विकल्पित किया जा सकता है, सदृश अन्य-अन्य भाव-भेद के ग्रहण-सामर्थ्य की वासना से आविष्ट होने के कारण । 'एष' शब्द से साभिलाप जो विकल्प है हमने उसको नहीं छिपाया है किन्तु उसका संग्रह कर दिया है । इसका यह निचोड़ निकलता है कि अहं शब्द से जो प्रतीति होती है वह आत्मा को विषय नहीं करती; क्योंकि वह भी तो विकल्परूप है और अस्थिर है । शरीरादि से भिन्न इस प्रतीति का दूसरा कोई विषय नहीं होता यदि हो तो भी वेद्य का ही पक्षपात करनेवाला होगा । फिर भी १. अनादि अनवच्छिन्न धारा से प्रवृत्त हुए ज्ञानों का कार्य-कारण-भावरूप प्रवाह ही सन्तान है । 'अहं' प्रतीति से मैं जानता हूँ, मैं देखता हूँ—इस प्रकार अनुभव से शरीर-सन्तान अथवा ज्ञान-सन्तान का निश्चय करता है, इससे अतिरिक्त कोई ज्ञाता अथवा द्रष्टा का ज्ञापन नहीं हो रहा है—ऐसा सौगतों का कहना है । २. आत्मानमात्मनात्मैव लिङ्गादनुमिनोति हि । तन्न नूनमुपेतव्या कर्तृता कर्मतास्य च ॥ तत्रानुमानज्ञानस्य यथात्मा याति कर्मताम् । तथाऽहं-प्रत्ययस्यैव प्रत्यक्षस्यापि गच्छतु ॥ देहादिव्यतिरिक्तश्च यथा लिङ्गेन गम्यते । तथाऽहं प्रत्ययेनापि गम्यतां तद्विलक्षणः ॥ अपने ही लिङ्ग से आत्मा का अनुमान होता है । इसलिए उसमें निश्चय ही उसकी कर्तृता और कर्मता को मानना पड़ेगा । जैसा कि आत्मा अनुमान ज्ञान का कर्म होता है उसी प्रकार ही वह प्रत्यक्ष अहंप्रत्यय की कर्मता को प्राप्त करे । देहादि से भिन्न आत्मा जिस प्रकार अपने लिङ्ग से जाना जाता है उसी प्रकार अहं प्रत्यय से भी उसको विलक्षण होने के कारण जाना जाय । अब प्रश्न करते हैं कि आत्मा का जो रूप है क्या वह प्रत्यय साक्षात् किया जाता है, यदि सुखादि आत्मा का रूप है तो उसका मानस प्रत्यक्ष होगा ? शंका होती है कि आनन्दादि स्वभाव प्रसिद्ध ही रूप सुखादि का है, तब तो उसको आधारता से अपनी आत्मा का भी रूप जानना चाहिए—