ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-२, का.-३ रिक्तस्य आत्मनो न सिद्धिः—इत्येतत् अपिशब्देन द्योतितम् । एवं नास्ति आत्मा संवित्संवेद्य- व्यतिरिक्तो दृश्यस्य अनुपलब्धेः—इति ॥ २ ॥ अत्र आत्मवाद्यनुमानमुत्थापयितुमाह— अथानुभवविध्वंसे स्मृतिस्तदनुरोधिनी । कथं भवेन्न नित्यः स्यादात्मा यद्यनुभावकः ॥ ३ ॥ इह स्मृतिकाले सुस्मूर्षितोऽर्थो भवतु, ध्वंसतां वा—इति किम् अनेन, अनुभवस्तावत् ध्वस्तः—इत्यत्र सर्वस्य अविवादः, तमेव च अनुरुन्धाना स्मृतिर्जायते । तथाहि—स्मृतौ न अर्थस्य प्रकाशः, न अध्यवसायः, नापि अनुभवस्य, अर्थस्य च अङ्गुलिद्वयवत्, नापि अनुभवविशिष्टस्य ज्ञान-संवित् संवेद्य से भिन्न आत्मा की सिद्धि नहीं हो सकेगी। यह ‘अपि’ शब्द से द्योतित होता है। [ संवित् ज्ञान-सन्तान और संवेद्य शरीर-सन्तान है, उन दोनों से भिन्न है । ] इसलिए मानना पड़ेगा कि दृश्य की अनुपब्धि के कारण संवित् संवेद्य से भिन्न आत्मा नहीं है ॥ २ ॥ आत्मवादी अनुमान का उत्थापन करने के लिए कहते हैं— अनुभव के ध्वंस हो जाने पर भी स्मृति उस अनुभव को स्थिर रखती है । यदि आत्मा अनुभव करने वाला नित्य न होता तो स्मृति किसी भी प्रकार से नहीं हो सकती है ॥ ३ ॥ स्मृतिकाल में सूक्ष्मरूप से अर्थ स्मृत हो जाय अथवा ध्वस्त हो जाय—इससे क्या प्रयोजन, अनुभव तो विनष्ट हो जाता है इस विषय में किसी को भी विवाद नहीं है, और उसी अनुभव को स्थिर करती हुई स्मृति पैदा होती है। जैसा कि—स्मृति में अर्थ का प्रकाश नहीं होता है, और न निश्चय रूप से अध्यवसाय ही होता है, एवं अनुभव भी नहीं होता है, और अर्थ का दो अङ्गुली के जैसा समानरूप से प्रकाश होता है, न तो अनुभव विशिष्ट अर्थ का सुखादि चेत्यमानं हि स्वतंत्रं नानुभूयते । मतुबर्थानुवेधस्तु सिद्धं ग्रहणमात्मनः ॥ इदं सुखमिदं ज्ञानं दृश्यते न घटादिवत् । अहं सुखीति तु ज्ञप्तिरात्मनोऽपि प्रकाशिका ॥ अपि च ज्ञातृज्ञानविशिष्टार्थग्रहणं किल भाष्यकृत् । स्वयं प्रादीदृशत्तच्च किं वा युक्तमुपेक्षितुम् ॥ विशेष्यबुद्धिमिच्छन्ति नागृहीतविशेषणाम् । अनुभव में आया हुआ सुखादि भी स्वतन्त्र रूप से अनुभूत नहीं होता है ‘मतुप्’ को लगा देने पर तो आत्मा का ग्रहण होना सम्भव है । यह सुख है, यह ज्ञान है ऐसा घटादि के समान नहीं दिखता है किन्तु मैं सुखी हूँ, मैं ज्ञाता हूँ, यह प्रकाशित होता है । इस बात को भाष्यकार ने भी बताया है—ज्ञाता के ज्ञान से विशिष्ट ही अर्थ ग्रहण होता है । स्वयं उन्होंने इसको बता दिया है इसलिए यह उपेक्षा करने योग्य नहीं है । अत एव विशेष बुद्धि को ही चाहते हैं विशेषण को नहीं ग्रहण करना चाहिए ।