भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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३४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-२, का.-१-२ यतस्तत् अभिलापेन संजल्पात्मना शब्दनरूपेण सह वर्तते । शब्दनं च इदम्—इति, तत्—इति, तदिदम्—इति, भवेदिदम्—इति, इदं वा इदम्—इत्यादि 'बहुधा' भिद्यते । तच्च न विषयपक्षे वर्तते, अपि तु तस्य विकल्पस्य स्वरूपमेव विचित्रीकुर्वत् प्रतिभाति—इति विकल्पो बहुभेदः । एवम् अनुभवविकल्पपरम्परा तावत् स्वप्रकाशत्वेन भाति । स्यादेतत्, यल्लग्नासौ परम्परा सोऽपि आभाति—इति; तन्न, यतो द्वयमपि एतद् अविकल्पेतररूपं न अन्यस्य 'कस्यचित्' एतदतिरिक्तस्य 'द्रष्टुः' अनुभवितुः सम्बन्धि, दृश्यस्य तु भवतु बाह्यार्थवादे । अत्र हेतुः—यतः 'तस्य' द्रष्टुः, अत एव संवित्स्वभावतोपगमात् स्वप्रकाशतायोग्यत्वात् आपन्नोपलब्धिलक्षणप्राप्तेः; 'अत्र' एतद्बोधद्वयमध्ये नास्ति अवभासः । ननु अस्त्येव अवभासः—इति असिद्धा दृश्यानुपलब्धिः । तथाहि-अहं वेद्मि, निश्चिनोमि, स्मरामि इदम्-इति विदादिप्रकृत्यर्थरूपात् ज्ञानस्मृत्यादेः, इदम्—इति च कर्मरूपात् विषयात् अतिरिक्तमेव अहम्—इति अनुयायिनि प्रकाशे अनुयायि रूपं भाति । क एवमाह भाति—इति ? । भानं हि अविकल्पकम्, अहम्—इति शब्दानुविद्धो और इसका कथन भी यही होता है, वही यह है, यह ऐसा होगा, इस तरह इसके बहुत से 'बहुधा' भेद हो जाते हैं और वह प्रतिद्वन्द्वी के पक्ष में नहीं है अपितु, उस विकल्प के स्वरूप को ही चित्र- विचित्र करता हुआ स्वरूप से भासित होता है—इस प्रकार विकल्प भी बहुत भेदवाला होता है। एवं अनुभव-विकल्पों की धारा पहले स्वप्रकाशरूप से भासती है । यह हो सकता है, इसकी अपेक्षा जो उसमें मिला रहता है वह भी भासित होता है; क्योंकि ये दोनों अविकल्प और विकल्प से भिन्न रूप में किसी 'द्रष्टुः' द्रष्टा का अथवा तो अनुभव करनेवाले का सम्बन्धी नहीं हो सकता, किन्तु दृश्य का तो बाह्यार्थवादी के मत में हो सकता है। इसमें हेतु दिखाते हैं—क्योंकि 'तस्य' उस द्रष्टा का हो सकता है, इसलिए होता है कि संविद्रूप ज्ञान स्वभाव की प्राप्ति कर लेने के कारण अपने प्रकाश की योग्यता होने से, उपलब्धि की प्राप्ति होने से; 'अत्र' इन दोनों के ज्ञान के बीच में आभास नहीं है । 'ननु' कहकर शंका उठाते हैं कि अवभास रहता ही है दृश्य की अनुपलब्धि [ अप्राप्ति ] असिद्ध हो गयी जो सिद्ध है तब फिर दृश्य की उपलब्धि कैसे होगी । उसी प्रकार से होती है कि मैं जानता हूँ, मैं निश्चय करता हूँ और इसको मैं स्मरण करता हूँ—इत्यादि जो विदादि धातुओं के प्रकृत्यर्थ ज्ञान, स्मृति वगैरह है उन कर्मरूप विषयों से 'अहं' अतिरिक्त- भिन्न वस्तु है—इस प्रकार इच्छा करनेवाले के प्रकाश में अनुयायी रूप से भासता है। कौन कहता है कि भासता है ? क्योंकि भान तो अविकल्प ही होता है अहं जो है वह तो अहं शब्द से अनुविद्ध- १. अभिलाप विषय की परवशता का त्याग करा कर बोध स्वातन्त्र्य रूप होने के कारण विषय को तादात्म्यरूप में ले आता है, व्यक्तरूप से प्रमाता का साक्षात्कार करने तक परामर्श किया जाना ही अभिलाप है, आन्तर शब्द वाला संजल्प कहलाता है। श्री भर्तृहरि ने भी कहा है— सोऽयमित्यभिसम्बन्धाद्रूपमेकीकृतं यदा । शब्दस्यार्थेन तं शब्दमभिजल्पं प्रचक्षते ॥