भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-२, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३३ 'ननु' इति आक्षेपे; इह आत्मा संवित्स्वभावः स्थिरः-इति तावदयुक्तम्, स्थिरस्य स्वप्रकाशस्य अप्रकाशनात् । तथाहि—घटप्रकाशो, घटविकल्पो, घटप्रत्यभिज्ञा, घटस्मृतिः, घटोत्प्रेक्षा—इत्यादिरूपेण ज्ञानान्येव प्रकाशन्ते, भिन्नकालानि भिन्नविषयाणि भिन्नाकाराणि च । तत्र नीलप्रकाशः 'स्वलक्षणाभासं ज्ञानं' । 'स्वम्' अन्याननुयायि स्वरूपसंकोचभागि 'लक्षणं' देशकालाकाररूपं यस्य तस्य 'आभासः' प्रकाशनम् अन्तर्मुखं यस्मिन् बहिर्मुखीनस्वरूपधारिणि ज्ञाने तत् अविकल्पकं, विषयभेदेऽपि एकजातीयं स्वरूपे, तद्वैचित्र्ये कारणाभावात् । विकल्पे हि वैचित्र्यकारणम् अभिलापः, स च अत्र नास्ति; नहि अभिलापो नीलस्य धर्मः, नच चक्षुर्ग्राह्यः, ततोऽसौ प्राच्यः स्मर्तव्यः, अप्रबुद्धे च संस्कारे न स्मृतिः, तत्प्रबोधश्च वस्तुदर्शनोत्थितः-इति वस्तुदर्शनसमयेऽभिलापस्मृतिर्नास्ति । ततः 'परं' विकल्पकं ज्ञानं, सर्वस्य विकल्पस्य साक्षात्, पारम्पर्येण वा निर्विकल्पकमूलत्वात् । 'परम्' इति च अन्यरूपं सामान्यलक्षणं तस्य विषयः, स्वलक्षणेऽतिसंकोचिनि विततविकल्पसाध्यस्य वृद्धव्यावहारिकस्य, औपदेशिकस्य वा संकेतस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्, कृतस्यापि वैयर्थ्यात्, तेन हि अननुयायिना न पुनर्व्यवहारः । तच्च बहुभेदं, 'ननु' शब्द का प्रयोग कहे हुए सिद्धान्त का निराकरण करने के लिए किया गया है। ज्ञान, क्रिया-शक्ति से युक्त संवित् ज्ञान का स्वरूप है। 'ननु' आक्षेप अर्थ में भी है; आत्मा संविद्रूप स्वभाव वाला एवं स्थिर नित्य है यह कहना कोई युक्तियुक्त नहीं है, स्थिर स्वभाव वाला जो स्वप्रकाश है उसका प्रकाश न होने के कारण। देखो—घट का प्रकाश हुआ, घट का विकल्प हुआ, घट की प्रत्यभिज्ञा हुई और घट की स्मृति हुई एवं घट की उत्प्रेक्षा हुई—इत्यादि जो कुछ है वह सब ज्ञानरूप से भासित होता है, जो कि भिन्न कालवाले, भिन्न विषयवाले और भिन्न आकार-प्रकारवाले हैं। [क्योंकि ज्ञानों की क्षणिकता होने से] नील प्रकाश निर्विकल्परूप है 'स्वलक्षणाभासं ज्ञानं' वह अपने स्वरूप का आभासरूप ज्ञान है। दूसरों का अनुकरण नहीं करता है अपने स्वरूप का संकोच करनेवाला होता है 'लक्षण' देश, काल और आकाररूप लक्षण है जिसका। उसी का आभास-प्रकाश अन्तर्मुख रहता है, बहिर्मुख स्वरूपधारी ज्ञान में अविकल्प स्थिर रहता है, विषय के भेद होने पर भी अपने स्वरूप में एक जातीय ही रहता है, उसकी विचित्रता में कारण का अभाव होने से। क्योंकि विकल्प में विचित्रता का कारण अभिलाप होता है और वह इसमें नहीं है; अभिलाप नीलका धर्म नहीं है और चक्षु इन्द्रिय से ग्रहण भी नहीं होता, इसलिए वह समयरूप से स्मरणीय है और जबतक संस्कार उद्बुद्ध नहीं होता तबतक स्मृति नहीं होती है, उसका ज्ञान वस्तु के दर्शन से ही होता है—इस प्रकार वस्तु-पदार्थ के दर्शन के समय में अभिलाप की स्मृति नहीं होती है। इसलिए 'परं विकल्पं ज्ञानं' सब से अच्छा ज्ञान विकल्प का होता है; क्योंकि वह सभी विकल्पों का साक्षात् या परम्परा रूप से निर्विकल्पमूलक रहता है। 'परं' इसका तात्पर्य यह है कि अन्यरूप सामान्यलक्षण उसका विषय है, अपने लक्षण में जो अति संकोचशील है जिसका विकल्प साध्य वृद्धजनों से व्यवहार करने योग्य या औपदेशिक संकोच करने के लिए अशक्य होता है, संकोच करना भी उसका निरर्थक है, क्योंकि वह किसी का अनुयायी नहीं होता और उसका फिर से व्यवहार भी नहीं हो सकता एवं उसमें अनेक भेद भी मिलेंगे; क्योंकि सङ्कल्पात्मक अभिलाप होने से वह कथन रूप होने के कारण साथ में हो रहता है ५