ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रति । तत्र श्लोकत्रयेण स्मृत्यनुसंधानं संस्कारात् सिद्धम्—इति अन्यथासिद्धत्वात् आत्मानुमानाय न पर्याप्तम्—इति प्रोक्तम् अनुमेयात्मवादिनः प्रति । तत्र श्लोकेन ज्ञानादिगुणैर्गुणििन प्रतिपत्तिः— इति अनुमानं निरस्तम्। एवम् आत्मानं निराकृत्य, ततो ज्ञानक्रियाशक्तिसंबन्धरूपमैश्वर्यं निराकर्तुं ज्ञानस्य स्वरूपमेव व्यतिरिक्तं वाद्यन्तरमते, सांख्यमते च अयुज्यमानम्—इति निरूपितं श्लोकद्वयेन । तत एकेन क्रिया नाम न काचित् क्वचिदपि अस्ति—इति कथितं । तत्र साधकं प्रतिक्षिप्य बाधकं च उपन्यस्यति । ततः संबन्धस्य श्लोकेन नास्तित्वं प्रतिपादितं प्रमाणाभावं वदता। श्लोकेनैव तत्र बाधकं प्रमाणमुक्त्वा, न आत्मा स्थिरो, नापि ज्ञातृत्वकर्तृत्वलक्षणम् अस्य ऐश्वर्यम्—इति स्वपक्ष उपसंहृतः—इति पूर्वपक्षस्य पिण्डार्थः । अथ ग्रन्थो व्याख्यायते ननु स्वलक्षणाभासं ज्ञानमेकं परं पुनः । साभिलापं विकल्पाख्यं बहुधा नापि तद्द्वयम् ॥ १ ॥ नित्यस्य कस्यचिद्द्रष्टुस्तस्यात्रानवभासतः । अहंप्रतीतिरप्येषा शरीराद्यवसायिनी ॥ २ ॥ उपलब्धि से अभाव कहा गया है, मानसप्रत्यक्षात्म-अद्वैत-शैव-मतावलम्बियों के लिए। तीन श्लोकोंसे संस्कार के द्वारा स्मृति का अनुसन्धान सिद्ध किया जायेगा—अन्यथा सिद्ध होने के कारण आत्मा के विषय में अनुमान करना पर्याप्त नहीं होगा—यह अनुमेय आत्मवादी नैयायिकों के लिए कहा हुआ है। अनन्तर एक श्लोक से ज्ञानादि गुणों के द्वारा गुणवान् आत्मा का ज्ञान होता है तार्किक मत से । इस प्रकार से अनुमान को निरस्त कर दिया गया। आत्मा का निरास करके ज्ञान, क्रिया-शक्ति के सम्बन्ध रूप ऐश्वर्य को निरस्त करने के लिए ज्ञान का स्वरूप भिन्न होता है यह दूसरे वादियों के सिद्धान्त की बात है। और इसके पश्चात् दो श्लोक से यह अयुक्त है सांख्यमत में इसका निरूपण किया जायेगा। इसके बाद क्रिया नाम की कोई चीज ही नहीं है जो कि कहीं पर किसी को देखने में आयी हो—ऐसा बताया है। साधक प्रमाण का खण्डन करके बाधक प्रमाण का उपपादन करेंगे। इसके बाद एक श्लोक से ज्ञान-क्रिया के सम्बन्ध का अभाव प्रमाणाभाव के कारण से होता है यह बताया गया है। और एक श्लोक से बाधक प्रमाण कहकर, आत्मा स्थिर नहीं है और न तो उसका ( ज्ञातृत्व-कर्तृत्व ) जानना और करना घटित होता है और इसका ऐश्वर्य है, यह अपने पक्ष का उपसंहार किया हुआ है और यही पूर्वपक्ष का निचोड़ है। अब ग्रन्थकी व्याख्या करते हैं—अपने आप ही भासित होने वाला स्वयंप्रकाश ज्ञान ही एक श्रेष्ठ पदार्थ है विकल्प रूप अपना ही अभिलाप है बहुतसे या दो प्रकार के भी विकल्प नहीं होते हैं ॥ १ ॥ क्योंकि नित्य द्रष्टा यहाँ कोई भासित नहीं होता है। अहंप्रतीति यह जो होती है वह शरीर को ही विषय करती है ॥ २ ॥