ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-२, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१ स्त्रियं गच्छति—इत्येतद्विषयामेव हन्त्यर्थमाहुः । एवं श्लोकचतुष्टयार्थभावनादार्ढ्यादेव लभ्यते परमशिवः—इति शिवम् ॥ ५ ॥ इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवशिष्य—श्रीमदाचार्यलक्ष्मणगुप्तदत्तोपदेश—श्रीमदाचार्या- भिनवगुप्तविरचितायां श्रीप्रत्यभिज्ञाविमर्शिन्यां ज्ञानाधिकारे उपोद्घाताख्यं प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥ अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे पूर्वपक्षविवृत्याख्यं द्वितीयमाह्निकम् पूर्वपक्षतया येन विश्वमाभास्य भेदतः । अभेदोत्तरपक्षान्तर्नीयते तं स्तुमः शिवम् ॥ इह यत् परमार्थरूपं तद् आशङ्क्यमानप्रतिपक्षप्रतिक्षेपेण निरूप्यिष्यमाणं सुष्ठुतमां स्पष्टी- कृतं भवति । यदाह भट्टनारायणः । ‘नमस्ते भवसंभ्रान्तभ्रान्तिमुद्भाव्य भिन्दते । ज्ञानानन्दं च निर्द्वन्द्वं देव वृत्वा विवृण्वते ॥’ तत्रेह अनात्मानिश्वरवादिनां भ्रान्तिभेदनपूर्वकं परमार्थं विवरीष्यन् तदुद्भावनं तावत् एकादशभिः श्लोकैः करोति ‘ननु स्वलक्षणाभासम् ....’ इत्यादिभिः ‘....तेन कर्तापि कल्पितः ॥’ इत्यन्तैः । तत्र श्लोकद्वयेन आत्मनो ध्रुवस्य दृश्यानुपलब्ध्या अभाव उक्तः प्रत्यक्षात्मवादिनः का ज्ञान रूप भी अर्थ निकलता है, जिसके द्वारा प्रमेय विषय का ज्ञान होता हो । कुछ लोग तो स्त्री के समीप जाने में ही ‘हन्’ को गति-अर्थक मानते हैं । इस प्रकार चारों श्लोकों की अर्थ भावना को हृदय में दृढ कर देने से परम शिव की प्राप्ति होती है ॥ ५ ॥ प्रथम आह्निक समाप्त जो पूर्वपक्ष के द्वारा विश्व को भेद पूर्वक आभासित कर उत्तरपक्ष को अद्वैत-अभेद के भीतर ले जाता है उस शिवकी हम स्तुति करते हैं । यहाँ पर जो परमार्थ रूप है उस पर आशंका करने वाले प्रतिपक्षी का उत्तर देकर निरूपण किया जाना अच्छा होता है । जैसा कि भट्टनारायण ने भी इस विषय में कहा है ‘हे देव ? आपको नमस्कार हो ।’ आप संसार की भ्रान्ति को बनाकर फिर उसका विनाश करते हैं तथा सुख-दुख के द्वन्द्वों से विनिर्मुक्त ज्ञानानन्द को विवरण करके प्राप्त करा देते हैं ।’ अनात्मा के विषय में अनीश्वर-वादियों की जो भ्रान्ति है उसे दूर करते हुए परमार्थ स्वरूप का विवरण करेंगे और उसका उत्थापन ग्यारह श्लोकोंसे करते हैं ‘ननु स्वलक्षणाभासम् ....’ इत्यादि से लेकर ‘...तेन कर्तापि कल्पितः ॥’ दो श्लोक से नित्य आत्मा का दृश्य के अभाव की