ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-१, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९ रोपाधेयप्रकाशात्मकसिद्ध्यनुपयोग एव । ननु अनवच्छिन्नस्तदीयः प्रकाश—इति कथमेतत्; घट- सुखादिप्रकाशे हि तत्प्रकाशः कुतः ?, तदप्रकाशेऽपि सुप्तमूर्च्छादौ नतरां; स्वप्रकाशेऽपि वा ईश्वरे प्रमातॄणां किं वृत्तं, येन तेषां प्रमाणव्यापारानुपयोग ?—इत्याशङ्क्याह— कर्तरि ज्ञातरि स्वात्मन्यादिसिद्धे महेश्वरे । अजडात्मा निषेधं वा सिद्धिं वा विदधीत कः ॥ २ ॥ इह क ईश्वरे कीदृशे कीदृशेन प्रमाणेन अस्ति-इति ज्ञानलक्षणां सिद्धिं, नास्तीति ज्ञानलक्षणं वा निषेधं कुर्यात् ? प्रमाता इति चेत्, स एव कः ? देहादिर्जडः उत तदन्यो वा कश्चित् आत्मादि- शब्दवाच्यः ? सोऽपि स्वप्रकाशस्वभावो वा न वा ? देहादिर्जडः इति चेत्, स एव स्वात्मनि सकती है—ऐसा यदि करते हो ? तो यह होना असम्भव सा ही है क्योंकि अनवच्छिन्न प्रकाश वाले के प्रमाण व्यापार को लगाकर उसे प्रकाशित करने वाली सिद्धि उपयुक्त हो नहीं बैठती है । पुनः शङ्का करते हुए कहते हैं कि उसका प्रकाश अनवच्छिन्न माना जाता है तब यह कैसे घटित होगा; क्योंकि घट-सुखादि के प्रकाश में उसका प्रकाश कहाँ से आया हुआ माना जाय ? उस अनवच्छिन्न प्रकाशात्मा के प्रकाश न रहने पर भी स्वप्न-मूर्च्छा, शयनादि में तो उससे भी अधिक नहीं रहेगा । [ ‘अक्षैरर्थोऽवग्रहः पुंसां तज्जाग्रदिति कथ्यते । यत्तैर्विनाऽर्थस्मरणं मनसा स्वप्नसंज्ञितम् ॥ यत्रार्थस्मरणे न स्तस्तत्सौषुप्तमिति स्मृतम् । शुद्धबोधैकरूपो योऽवस्थातः सैव तुर्यता ॥ जिसमें चक्षु इन्द्रियों के द्वारा पुरुष को अर्थ का ग्रहण होता हो उस अवस्था का नाम जाग्रत् है । जब उनके बिना मात्र मन से ही अर्थ विषय का ग्रहण जिसमें होता हो उसे स्वप्न अवस्था कहते हैं । जिसमें अर्थ का स्मरण भी न होता हो उसी का नाम सुषुप्ति अवस्था है । जिसमें शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-नित्य स्वभाव का बोध हो उसे चतुर्थ अवस्था ‘शिव’ कहा जाता है । उसमें भी सुषुप्ति अवस्था दो प्रकार की मानी जाती है । मूर्च्छादि न्याय से, एक संवेद्य है और दूसरी अपवेद्य है । ‘मैं सुखी हूँ’—इसी का नाम संवेद्य है और ‘मैंने कुछ भी नहीं जाना’ यह अपवेद्य है । ] ईश्वर के स्वप्रकाश रहने पर प्रमाताओं का इसमें क्या बिगड़ना है, जिससे उन प्रमाताओं के प्रमाण-व्यापार का अनुपयोग होता हो ? इस विषय में आशङ्का कर उत्तर देते हैं— अपने आप स्वयं कर्ता, ज्ञाता, आदि सिद्ध महेश्वर के रहने पर कौन चेतन निषेध या सिद्धि अपने आप की करेगा ॥ २ ॥ कौन व्यक्ति कैसे ईश्वर में प्रमाण के द्वारा ज्ञान लक्षणा की सिद्धि या निषेध कर सकता है, उसकी सत्ता है या नहीं है ऐसे कैसे कर सकेगा ? यदि माना जाय कि ईश्वर के अस्तित्व में सिद्धि या निषेध प्रमाता करता है तो वही प्रमाता कौन है जो सिद्धि और निषेध करने चल पड़ा है ? चार्वाकादि नास्तिक लोग देहादि जड-पदार्थों को मानते हैं यदि ऐसा कहो, तो क्या सचमुच देहादि जड या उससे भिन्न कोई आत्म शब्द का वाच्य माना जाय ?