ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 41, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ मयम् उपकारम् इच्छन्, महेश्वरस्य दास्यम् आसाद्य, समस्तसंपत्समवाप्तिहेतुं तत्प्रत्यभिज्ञाम् उपपादयति; ततश्च प्रत्यभिज्ञामेवंभूतां वयं प्राप्ता एव—इति । इत्थमेव हि अधिकारिणि शास्त्रार्थस्य बिम्बप्रतिबिम्बवत् संक्रान्तिः लोङ्लिङादीनां विषयीभवति—इति प्रथमपुरुषार्थः उत्तमपुरुषार्थे पर्यवस्यति, न तु तात्स्थ्येन; अधिकार्यनधिकारिणोः प्रतिपत्तौ विशेषाभावप्रसङ्गात् । आरोग्य- कामाः शिवां सेवन्तां सेवेध्वम्—इति वा वाक्यार्थस्य सेवामहै-इत्येवंरूपेण अधिकारिणि द्वितीय- कक्ष्यासंक्रान्तौ तृतीयकक्ष्यायामेव भाविकोटिपतितामपि पुरुषार्थसंपत्तिम् अकालकलितस्वरूपानु- प्रवेशेन स्वात्मीकृताम् अभिमन्यमाने, तत एव विततसंवित्सुन्दरपरामर्शे पूर्णताभिमानप्रतिलम्भात्, अन्यस्य तु अनेवंरूपत्वेनैव अधिकारिता तात्स्थ्यप्राणा—इति । तदास्ताम् अवान्तरमेतत् अति- गहनं च—इति स्थितमेतत् । एतेन श्लोकेन ईश्वरसामुख्यं विनेयानां प्रयोजनादिप्रतिपादनं च क्रियते—इति ॥ १ ॥ अनन्तभावसंभारभासने स्पन्दनं परम् । उपोद्घातायते यस्य तं स्तुमः सर्वदा शिवम् ॥ ननु ईश्वरस्य सिद्धिरेव कर्तव्या, केयं सिद्धिः ! न तावत् उत्पत्तिः नित्यत्वात् । नापि ईश्वर- सिद्धिकारादयस्तस्योत्पत्तिं विदधते । ज्ञप्तिः सिद्धिरिति चेत् ! अनवच्छिन्नप्रकाशस्य प्रमाणव्यापा- की दासता को पाकर, सम्पूर्ण अलौकिक सम्पत्ति प्राप्ति में हेतुरूप ईश्वर की प्रत्यभिज्ञा का उपपादन करते हैं,—ऐसी प्रत्यभिज्ञा हमलोग प्राप्त कर चुके हैं। इस प्रकार अधिकारी में ही शास्त्र का अर्थ बिम्ब-प्रतिबिम्बभाव के समान संक्रमण हो जाता है; यह ‘लोट्’ लकार और ‘लिङ्’ लकार का अर्थ है—इस प्रकार प्रथमपुरुष का अर्थ उत्तम- पुरुष के अर्थ में पर्यवसित होता है, तटस्थरूप से नहीं होता है; क्योंकि अधिकारी और अनधि- कारी के जानने में किसी तरह की विशेषता नहीं है। आरोग्य की कामना चाहने वाले भगवतीशक्ति को सेवा करें; तुम लोग सेवा करो या वाक्यार्थ के लिए उत्तमपुरुष का प्रयोग ‘सेवामहै’ हमलोग सेवा करते हैं इस प्रकार से अधिकारी में द्वितीय कक्षा का संक्रमण हो जाने पर ‘सेवेध्वम्’ इस तृतीय कक्षा में पड़ने पर आगामी कोटि ‘लोट्’ लकार में पुरुषार्थ सम्पत्ति को अकालकलित कोटि में प्रविष्ट कराकर अपने अधीन कर उसे मानने पर उत्तमपुरुष का प्रयोग होता है, इसलिए खूब विस्तृत संवित् सुन्दरता के परामर्श में पूर्णता ला देने के कारण दूसरे का तो उससे भिन्न तटस्थरूप में अधिकारिता है। रहने दो, इसको यह तो बड़ा भीतर घुसा हुआ और अति कठिन भी है जिस परिस्थिति में है उसी में रखना ही समुचित दिखायी देता है। इस श्लोक से शिष्यों के प्रयोजन आदि का और ईश्वर की सन्मुखता का प्रतिपादन विषय भी हो जाता है ॥ १ ॥ अनन्त भावपदार्थ समूह को प्रकाशित करने में जिसका सर्वश्रेष्ठ स्पन्दन-उपोद्घात होता है। उस शिव की हम लोग स्तुति करते हैं ॥ अब शंका करते हैं कि ईश्वर की सिद्धि करनी चाहिए, किन्तु कौन सी यह सिद्धि है ? ईश्वर की उत्पत्ति हो नहीं सकती है क्योंकि ईश्वर नित्य-शुद्ध-बुद्ध स्वभावरूप है और न तो ईश्वर की सिद्धि करने वाले लोग उनको उत्पत्ति के विषय में कुछ बता भी सकते हैं ठीक ढंग से, या उत्पत्ति दिखा सकते हैं। ईश्वर के विषय में ज्ञानरूप मात्र सिद्धि सम्भव हो