भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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.अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १७ ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लो० ) इति पादद्वयेन । 'जनस्य' इत्यनेन अधिकारी दर्शितः । यत् निगम- यिष्यति 'अनिशमाविशन्' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लो० ) इति । 'कथंचित्' इत्यनेन गुरुपर्वक्रमः । वक्ष्यति 'महागुरुभिरुच्यते स्म शिवदृष्टिशास्त्रे यथा ।' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लो० ) इति । एवं प्रतिज्ञातव्यसमस्तवस्तुसंग्रहेण इदं वाक्यमुद्देशरूपं प्रतिज्ञापिण्डात्मकं च, मध्यग्रन्थस्तु हेतुवादि- निरूपकः, 'इति प्रकटितो मया' ( ४-३-१६ ) इति च अन्त्यश्लोको निगमनग्रन्थः,- इत्येवं- पञ्चावयवात्मकमिदं शास्त्रं परव्युत्पत्तिफलम् । नैयायिकक्रमस्यैव मायापदे पारमार्थिकत्वम्— इति ग्रन्थकाराभिप्रायः 'क्रियासंबन्धसामान्य' ( २ अ० २ आ० १ श्लो० ) इत्यादिषु उद्देशेषु प्रकटोभविष्यति — इति तावद् ग्रन्थस्य तात्पर्यम् । सुजनश्च लौकिकेश्वर- परिचित ईश्वरविषये जनम् अनुजीविगुणोपपन्नं प्रकाशयति, जनविषये च आभिगामिकादिगुणगण- सम्पन्नम् ईश्वरं प्रकाशयति, — इति इयानर्थः सामान्येन षष्ठीसमासेन दर्शितः 'तस्य प्रत्यभिज्ञा' इति । एतच्छ्लोकाकर्णनसमये च शिष्याणाम् एतदर्थसंक्रमेण परमेश्वरतादात्म्यमेव उपजायते तावत् । तथाहि — 'जनस्य' — इत्याकर्णनात् वयं ते जननमरणपीडिता अपर्युदस्तवृत्तयश्च, अस्माक- 'अनिशमाविशन्' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लोक में ) 'कथंचित्' इस शब्द से गुरु परम्परा का क्रम 'महागुरुभिरुच्यते स्म शिवदृष्टिशास्त्रे यथा' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लोक ) से कहा जायेगा । इस प्रकार प्रतिज्ञा करने योग्य सारी वस्तुओं का संग्रह करके प्रतिज्ञा को एक पिण्डाकार- रूप में दिखा दिया, और बीच का ग्रन्थ तो हेतु आदि का निरूपण करता है, 'इति प्रकटितो मया' ( ४-३-१६ ) और अन्तिम श्लोक से ग्रन्थ का उपसंहार किया हुआ है। इस प्रकार प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन रूप पाँचों अवयवों वाला यह शास्त्र परम व्युत्पत्तिरूप फल देने वाला है। नैयायिक लोगों के क्रम को ग्रन्थकार ने मायापद में पारमार्थिकरूप माना है, 'क्रिया- सम्बन्धसामान्य' ( २ अ० २ आ० १ श्लोक ) के उद्देश्यों में प्रकट किया जायेगा । यही इस ग्रन्थ का तात्पर्य है और सज्जन लोग लौकिक ईश्वर के विषय में परिचित हो जाने पर अनुचर- वर्ग को अपने स्वामी के विशेष गुणों का वर्णन किया करते हैं और लोगों के विषय में भी ईश्वर सम्बन्धी गुण गरिमा का प्रकाश डालते रहते हैं इतना अर्थ 'तस्य प्रत्यभिज्ञा' इस सामान्य षष्ठी समास के द्वारा दिखा दिया । इस षष्ठीसमास में कर्त्ता और कर्म ये दोनों हैं अर्थात् तत्कर्तृक प्रत्यभिज्ञा एवं तत्कर्मक प्रत्यभिज्ञा समझना चाहिए । इस श्लोक के सुनते समय में ही श्रद्धालु शिष्यों को इसका बोधार्थ संक्रमण क्रमशः परमेश्वर की तादात्म्यता उत्पन्न करा देता है। जैसा कि 'जनस्य' ऐसा सुनने मात्र से हम जन्म-मरण के दुःखों से बहुत ही पीडित हैं और प्रमाण-विपर्यय-विकल्प-निद्रा-स्मृति आदि वृत्तियों से भिन्न अथवा उसके सदृशवस्तुओं से भिन्न; हमलोगों का उपकार चाहते हुए, परमेश्वर १. जिनकी चारों ओर से बाहरी समस्त 'प्रमाण-विपर्यय-विकल्प-निद्रा-स्मृति' वृत्तियां अस्त हो चुकी हैं वे उदासीन कहलाते हैं इससे विपरीत अपर्युदास वृत्तियाँ होती हैं। अथवा सदृश वस्तु का परिग्रहण करना ही पर्युदास है, अपने से विपरीत वृत्तियों का ग्रहण नहीं करना ही उदासीन भाव है। अर्थात् किसी अन्य में अपनी वृत्ति को न रखना ही अनन्य वृत्ति कहलाता है । ३