ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ व्युत्पत्त्या उपायः इह लोकोत्तरमार्गं प्रति निर्णीतः, —इति अतिदुर्घटकारित्वलक्षणमैश्वर्यम् 'मार्गों नव' (४ अ० ३ आ० १६ श्लो०) इति शास्त्रान्ते निरूपयिष्यमाणं सूचयता उपायः प्रदर्शितः अभिधेयत्वेन । अत एव 'तथाहि जडभूतानाम्' (१ अ० १ आ० ४ श्लो०) इत्युपक्रमपूर्वं श्लोकान्तरं भविष्यति । प्रयोजनं च प्रत्यभिज्ञोपायज्ञानं, तस्य प्रयोजनं प्रत्यभिज्ञानं, तस्यापि प्रयोजनं समस्तसंपल्लक्षणपारमैश्वर्यैकरूपप्रथनं; ततः परं नास्त्येव, तस्य सर्वपर्यन्तफलत्वात् अंशांशिकयापि । यदुक्तं मयैव स्तोत्रे —'फलं क्रियाणामथवा विधीनां पर्यन्ततस्त्वन्मयतैव देव । फलेप्सवो ये पुनरत्र तेषां मूढा स्थितिः स्यादनवस्थयैव ।।' इति । एतद् वक्ष्यति 'तदत्र निदधत्पदम्' व्युत्पत्ति होने से लोकोत्तर मार्ग का देनेवाला है यह उपाय निर्णीत हो जाता है, इसका अति- दुर्घटकारीरूप ऐश्वर्य माना जाता है जो कि आगे कहा भी है—'मार्गों नव' (४।३।१६) । इस प्रकार शास्त्र के अन्त में निरूपण करते हुए हमने उपाय भी इसके सूचित किये हैं जो प्रतिपाद्य विषयक हैं । इसलिए 'तथाहि जडभूतानाम्' (१ अ. १०४ श्लोक) जैसा कि जडभूतों की प्रतिष्ठा जीव के आश्रित होती है उस तरह उपक्रमपूर्वक दूसरे-दूसरे श्लोक कहे जायेंगे तब फिर प्रयोजन क्या वस्तु है ? उत्तर यह है कि प्रत्यभिज्ञा का उपाय जानना ही यहाँ पर प्रयोजन है, उसका भी प्रयोजन ईश्वर का प्रत्यभिज्ञान होना कि मैं महेश्वररूप हूँ, तब फिर उस प्रत्यभिज्ञान का क्या प्रयोजन है और किसलिए ? समस्त संपत्तिरूप परमेश्वर के परम ऐश्वर्य का प्रथन हो जाना ही वस्तुतः प्रयोजन है; इसके बाद कुछ अवशेष करना नहीं रह जाता है, सारा का सारा फल मिल जाने से कुछ भी आंशिकरूप से शेष नहीं रह जाता है । मैंने स्वयं ही स्तोत्र में बताया है— 'हे देव ! क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले अथवा विधियों से होने वाले जितने भी फल होते हैं; उन सब से हम तुम्हारे पूर्ण व्यापकरूप में तन्मय हो जायें । जो लोग फल की आकांक्षा रखते हैं वे सभी मूढ़ ही हैं और इससे अनवस्था ही होगी ।' इस विषय में आगे विवेचन किया जायेगा । दो पाद से 'तदत्र निदधत्पदम्' (४ अ० ३ आ० १६ श्लोक) 'जनस्य' इसके द्वारा अधिकारी कौन हो सकता है, इसे दिखाया है । जिसका उपसंहार करते समय बताया जायेगा— [ त्रिक ] शास्त्र जो संसार में विलुप्त हो गया था इसके प्रचारार्थ त्र्यम्बक आदित्य नामक मानस पुत्र को उत्पन्न किया और इन्होंने भी इस प्रकार मानस प्रक्रिया से सृष्टि क्रम के द्वारा पुत्र उत्पन्न किया, स्वयं गुहा में जाकर ध्यानस्थ हो गये । इस प्रकार क्रमशः सृष्टि-प्रक्रिया चलती आयी । आगे चलकर मानुषी सृष्टि का क्रम चला । इस मानुषी सृष्टि में संगम आदित्य और वर्षादित्य पुत्र उत्पन्न हुए, उनके भी भगवान् अरुणादित्य नाम के पुत्र पैदा हुए । श्री सोमानन्द आनन्दादित्य से हुए । इस प्रकार शैवा- द्वैत दर्शन के प्रचारार्थ श्री सोमानन्द का अत्यधिक योग रहा है । इनका बनाया हुआ 'शिवदृष्टिशास्त्र' इस दर्शन का सर्वप्रथम ग्रन्थ है । इसके आधार पर उत्पलदेव एवं अभिनवगुप्त, लक्ष्मणगुप्त, वसुगुप्त, क्षेमराज एवं रामेश्वर झा आदि ने ग्रन्थों की रचनाएं की । इस ग्रन्थ का प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव सम्बन्ध है । १. सम्पूर्ण सम्पत्ति की प्राप्ति होने पर ही पूर्णता दिखायी देती है । राज्य, भोग, स्वर्ग, भवन इत्यादि भोग पदार्थ की प्राप्ति में भी उत्तरोत्तर इच्छा विशेष बढ़ती ही जाती है, कहाँ पूर्णता को स्थान मिला माना जाय ? जब परमार्थ मिल जाने पर तो इससे अतिरिक्त प्राप्त करने के लिए रह ही नहीं जाता है, उस परमेश्वर भाव में सम्मिलित हो जाने पर तो फिर क्या वाञ्छनीय रह जाता है—इसका यही आशय है ।