ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १५ वृत्तिमात्रं व्याख्यातुमुद्यतेन नेदं स्पृष्टम्, अस्माकं तु सूत्रव्याख्यान एव उद्यम—इति विभज्य व्याख्यातम् । एवं सर्वत्र । एवमनेन श्लोकेन अभिधेयं, प्रयोजनं, तत्प्रयोजनं, तत्प्रयोजनम्, अधिकारिनिरूपणं, गुरुपर्वक्रमः, संबन्ध—इति दर्शितम् । तथाहि—समस्तसंपल्लक्षणो व्याख्यातो योऽर्थः पूर्वं पुण्यपापादौ संसारमूलकारणे हेतुः, स एव प्रत्यभिज्ञायते अनया—इति करण- एवं टीकाकार के द्वारा भी वृत्तिमात्र की व्याख्या करना ही उद्देश्य था उससे अतिरिक्त थोड़ा सा भी कहीं स्पर्श नहीं किया हुआ है और हमारा भी तो यत्न मात्र सूत्र की व्याख्या करने में है; इससे अधिक नहीं है, इसलिए हमने खूब-खोल-खोलकर व्याख्या की है। इसी प्रकार ही सब जगह व्याख्या की गयी है । इस श्लोक से जो विषय करना था उसे भी अभिधेय के रूप से कहा है, प्रयोजन और उसका प्रयोजन तथा प्रयोजन के भी प्रयोजन को दिखलाया है, अधिकारी के विषय में भी कहा है कि इस प्रत्यभिज्ञाशास्त्र को प्राप्त करनेवाले कौन अधिकारी हो सकते हैं इसका भी अच्छी तरह से निरूपण हुआ है, तथा गुरु-परम्परा के क्रम को भी दिखाया है। इन ईश्वरप्रत्यभिज्ञा आदि शास्त्रों की कौन-कौन से गुरुजनों के द्वारा रचनाएँ हुई हैं एवं आदि से अन्त तक इनके प्रधान गुरु लोग रहे, तथा इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा का प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव रूप जो सम्बन्ध है उसे भी हमने दिखा दिया है । [ अभिधेय का उपाय और प्रयोजन का जो उपाय ज्ञान है एवं उसका प्रयोजन प्रत्यभिज्ञान होना, प्रत्यभिज्ञान का भी प्रयोजन परमेश्वर सम्बन्धी ऐश्वर्य की प्राप्ति करना है। अधिकारी तो जिस किसी भी जाति-वर्ग का पवित्र हृदय वाला हो सकता है । श्री कण्ठनाथ प्रभृति गुरु सम्बन्ध क्रम में आ जाते हैं। श्री कण्ठनाथ के शासन काल के चले जाने पर दुर्वासामुनि हुए उन्होंने भी इस दर्शन के उद्धार के लिए आदेश दिया, उन्होंने भी भगवान् देव से आदेश प्राप्तकर त्र्यम्बकादित्य नाम के मानस पुत्र को पैदा किया । गुरु प्रवर्तित मार्ग को चलाने के लिए श्री अनन्तनाथ से शिवतत्त्व श्री कण्ठनाथ ने प्राप्त किया, वह भी भगवान् शक्ति से, इस प्रकार आगमों में गुरु परम्परा के सम्बन्ध क्रम का निरूपण हुआ है यहाँ प्रतिपाद्य- प्रतिपादक भाव सम्बन्ध है । ] वैसे तो समस्त संपत्ति को देनेवाला जो अर्थ है उसी की व्याख्या की गयी है; क्योंकि पूर्व जन्म के अर्जित पुण्य-पापादि ही तो इस असार-संसार का मूल कारण है, इस व्याख्यान से उसी की पहचान होती है 'प्रत्यभिज्ञायते अनया' इस कथन को करण १. इस 'दर्शन' प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में विषय उपाय है और प्रयोजन उपाय ज्ञान है, उसका प्रयोजन प्रत्यभिज्ञान है, उसका प्रयोजन पारमैश्वर्य की प्राप्ति करना है। इसका अधिकारी जो कोई शक्तिपात-परमेश्वर का अनुग्रह वाला, पवित्र हृदय से युक्त हो सकता है। श्री कण्ठनाथ से लेकर श्री सोमानन्द आदि तक गुरु परम्परा का सम्बन्ध द्योतित होता है। 'कैलासाद्रौ भ्रमन् देवो मूर्त्या श्रीकण्ठरूपया। अनुग्रहायाव- तीर्णश्चोदयामास भूतले ॥ मुनिं दुर्वाससं ऽऽऽशास्त्रं रहस्यं कुरु तादृशम् ॥' कलिकाल के कालुष्य से यह शैवाद्वैत दर्शन प्रायः लुप्त हो गया था और उसकी परम्परा का ह्रास हो जाने से बहुत काल के बाद कैलास पर्वत पर परिभ्रमण करते हुए भगवान् शंकर ने श्री कण्ठमूर्ति रूप को धारण कर दुर्वासा मुनि को इस शैव शास्त्र का प्रचार-प्रसार करने के लिए आज्ञा की। उनकी आज्ञा को शिरोधार्य समझकर दुर्वासा मुनि ने अखिल आगम रूप उपनिषद्-वेद के सारभूत षडर्ध