ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 30, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ७ भट्टदिवाकरवत्सो विवेकाञ्जने 'प्रकाशश्चैष भावानाम्.....' इत्यादि '.....न शापोक्त्या विलीयते ।' इत्यन्तम् । तत्र तु कार्यकारणभावेऽपि क्वचित् परिपूर्णस्वातन्त्र्यलक्षणमाहेश्वर्यानान्तरीयकताक्रोडी- कृतानन्तशक्तिचक्रचुम्बितभावभावितप्रथान्तरव्यवधानं चकास्ति; स तु मायोयत्वेन व्यवस्था- पयिष्यते, जडचेतनाद्यवान्तरभेदशतसम्भिन्नश्च असौ तत्कृतश्च सर्वोऽयं निष्पाद्य-निष्पादकभाव- ज्ञाप्य-ज्ञापकभावावभासो लोकव्यवहाररूपः । यत्र तु शुद्धप्रथात्मकानुत्तरशक्तिशालिनिरर्गल- स्वात्मप्रकाश एव मायोयप्रथान्तरव्यवधानवन्ध्यो निबन्धनं, तत्र तस्यैव भगवतः कारणत्वम् । एष च अनुग्रहलक्षणोऽन्त्यः पञ्चमः पारमेश्वरः कृत्यविशेषः परपुरुषार्थप्रापकः, तन्निबन्धनत्वात् पर- मार्थमोक्षस्य । अन्यत्रत्यो हि अपवर्गः कुतश्चित् मुक्तिः, न सर्वत इति निःश्रेयसाभास इति वक्ष्यामः । कारणभाव भी ठीक ही प्रकाशित होता है, क्योंकि प्रकाश छिपाया नहीं जा सकता है । जिसे भट्टदिवाकरवत्स ने विवेकांजन में कहा है—"प्रकाशश्चैष भावानाम्...।" इत्यादि से लेकर "...न शापोक्त्या विलीयते ।" यहाँ तक । यह पदार्थों का ही प्रकाश है, उसे गाली देकर लुप्त नहीं कर सकते । किन्तु वहाँ पर कार्यकारणभाव में भी कहीं परिपूर्ण स्वतन्त्ररूप महेश्वरता को अपने में अन्तर्भाव करने पर अनन्तशक्ति से युक्त तरह-तरह का प्रकाश दिखायी देने लगता है; परन्तु वह मायिक ही प्रकाश कहलाता है, और यह जड और चेतनादि अनन्त भेद से युक्त रहता है, और उसी के द्वारा ही इस जगत् का सारा ज्ञाप्य-ज्ञापकभाव एवं निष्पाद्य-निष्पादकभाव सम्बन्ध होता है इसी से लोकव्यवहार भी चलता है । जहाँ पर शुद्धप्रथारूप अनुत्तरशक्तिशाली निरन्तर अपना प्रकाश ही मायीय अन्यप्रथाओं के व्यवधान से शून्य कारण रहता है, वहाँ पर भी उस भगवान् की ही कारणता रहती है और यही भगवान् का सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान और अनुग्रह नामक पञ्चकृत्य विशेष है । पिधान उसे कहते हैं जो संस्काररूप से स्थिर पदार्थ वस्तु है उसका भी विलीनीकरण कर देना, एवं अपने स्वस्वरूप में तादात्म्यरूप से अवस्थापन करना ही अनुग्रह है जो कि ये पाँचों परमपुरुषार्थ देनेवाले हैं, और वे परमार्थ मोक्ष में भी कारण हैं । क्योंकि अन्यदर्शनों में तो कहीं अपवर्ग शब्द से तो कहीं मुक्तिशब्द से कहा जाता है । किसी एक अंश में ही मुक्ति होती है सब तरह से नहीं होती; इसलिए वह निःश्रेयसाभास मात्र है यह हम आगे बतायेंगे । [ बुद्धितत्त्वे स्थिता बौद्धा गुणेष्वार्हंताः स्थिताः । स्थिताः वेदविदः पुंसि, ह्यव्यक्ते पांचरात्रकाः ॥ बुद्धितत्त्व में बौद्धलोग, गुणों में जैनजन, पुरुष के विषय में वेदान्ती, और अव्यक्तरूप के विषय में पञ्चरात्रमत वालों की स्थिति रहती है, जो भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में शिवतत्त्व का रहना होता है उसी भूमिकाओं में ही सभी दर्शनों की अवस्थिति रहती है 'तद् भूमिकाः सर्वदर्शन- स्थितयः' । ] ये सभी भूमिकायें नट की स्वेच्छा से गृहीत भूमिका के समान ही हैं जो कि कृत्रिम ही होती है । 'चैतन्यविशिष्टशरीरमात्मा' चैतन्यविशिष्ट शरीर ही आत्मा है—ऐसा मत नास्तिक चार्वाकों का है । ज्ञानादि गुणसमुदाय का आश्रय बुद्धितत्त्व ही आत्मा है—ऐसा न्यायदर्शन के निपुण नैयायिक आदि लोग मानते हैं । एवं अपवर्ग में उसका उच्छेद होने से शून्यप्राय बताते हैं 'अहम्' प्रतीति से जानने के योग्य, सुख दुःखादि उपाधि से रहित आत्मा है—ऐसा मीमांसकों का सिद्धान्त है । जिसका समावेश बुद्धि में ही होता है । ज्ञान का क्षणिक