भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ जयपदोदीरणेऽपि तादृशसमुत्कर्षातिशयशालिनि स्वात्मानमप्रह्वीकुर्वाणस्य तटस्थस्य परनमात्मो- पकारित्वम्-इति समुत्कर्षविशेषाक्षिप्त एव नमस्कारोऽवश्यमभ्यन्तरीकार्यः, इत्यनया युक्त्या जय-नमस्कारैकतरप्रक्रमे अन्यतरस्य अर्थाक्षिप्तता अवश्यमङ्गीकर्तव्या। वन्दन-नमन-स्मरण- प्रधानप्रभृतीनामपि नमस्कार-जयत्यर्थमात्रपरमार्थत्वात् इयमेव वर्तनी। अत्रायं पुनर्ग्रन्थकृता तादृक् प्रक्रम आश्रितः, यत्र द्वयमपि इदं स्वशब्दपरामृष्टमेव। एतच्च पदार्थव्याख्यानावसर एव प्रकटीभविष्यति। स्वशब्दपरामर्शश्च सर्वजनहितत्वाद्युक्तियुक्तः, स हि सर्वस्यैव झटिति हृदयंगमः, अर्थाक्षिप्तस्तु कतिचिदेव प्रति स्वप्रतिभोदितवाक्त्वविमर्शसंभवात्, वाक्त्ववावमर्शशून्यस्य च प्रकाशस्याप्रकाशकल्पत्वात्। एतच्च अग्रे स्फुटीभविष्यति। तदनेन अभिप्रायेण प्रसिद्धजय-नमः- प्रभृतिशब्दशय्यानाश्लेषेण इमां सरणिम् अनुसरति स्म ग्रन्थकारः। इह यद्यत्किञ्चित् स्फुरति तत्तद्दृश्यमानेश्वररूपस्वात्मप्रथामात्रं, तत्र तु उपायोपेयभाव- प्रभृतिः कार्यकारणभावोऽपि यथाप्रकाशं परमार्थभूत एव, प्रकाशस्य अनपह्नवनीयत्वात्। यदाह जयपद के उच्चारण करने से वैसे उत्कर्ष वाले परमेश्वर में अपने आपको नम्र विनयशील बनाकर, तटस्थ जो परमात्मा है उसका उपकार करना इसी उत्कर्ष विशेष का आक्षेप ही नमस्कार है। उसको इसके गर्भ में रखना है, इस युक्ति से जय या नमस्कार किसी एक के कहने से भी दूसरे का आक्षेप अर्थात् अवश्य अङ्गीकार करना चाहिए। वन्दन, नमन, स्मरण और ध्यान आदि सभी का नमस्कार पर्यन्त, अर्थ मात्र में ही तात्पर्य है यही इसका मार्ग भी है। ग्रन्थकार पुनः यहाँ पर उसो क्रम का आश्रय लेते हैं, जहाँ पर नमन और उत्कर्ष अपने ही शब्दों से परामृष्ट होते हैं और यह पदार्थों के व्याख्यान करने के अवसर पर प्रकट होंगें। अपने शब्द से परामर्श करना ही सभी लोगों के लिए हितकारी होगा, क्योंकि वह सभी को शीघ्र ही हृदयङ्गम हो जाता है, जिसका अर्थ से आक्षेप किया जाता है वह तो किसी-किसी को ही हो सकता है, अपनी प्रतिभा से वाक्त्व का अवमर्श सम्भव न होने के कारण सबको प्रायः सम्भव नहीं होता जो कि वाक्त्व का परामर्श कर सके, और जो वाक्त्व के अवमर्श से शून्य है उसका प्रकाश तो अन्धकार तुल्य ही है। इस बात को आगे "स्वभावमवभासस्य" (१-५-११) इस स्थल पर स्पष्ट करेंगे। इसी अभिप्राय से प्रसिद्ध, 'जय, नमः', प्रभृति शब्दों की भूमिका से इस बात का अनुसरण ग्रन्थकार ने किया है। [यहाँ पर सूत्र के थोड़े अंश को लेकर परामर्श करते हुए उसके अर्थ का समर्थन करने के लिए दो प्रकार का कार्यकारणभाव दिखाते हैं] इस सूत्र में जो कुछ कार्य कारणभाव विवरण के रूप में झलकाया गया है वह वर्तमान और आगे आनेवाले ईश्वर के स्वरूप का फैलावमात्र है, वहाँ उपाय और उपेयभाव आदि कार्य है इस नीति से अपने और दूसरे की प्रकाश्यता की प्राप्ति के लिए समावेश (समाधि) अवस्था के उपदेशादि में परामर्श करना होगा। १. परामर्श के स्वभाव को जानने वाले अवभास को जानते हैं। विमर्श का अर्थ है कि 'अहम्' ऐसा जो असांकेतिक, स्वातन्त्र्य रूप एवं आत्मविश्रान्ति स्वभाव वाला होता है। तत्त्वज्ञ लोग इसे मन्त्र शरीर श्री मातृका, श्री मालिनी-इत्यादि रूपों में मानते हैं। प्रकाश का मुख्य रूप प्रत्यवमर्श होता है, उसके बिना अर्थ के द्वारा भेद किये गये आकारका मात्र स्वच्छ ही रूप रहता है किन्तु चेतनता नहीं रहती क्योंकि चमत्कार का उसमें अभाव है।

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