ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ५ तावति हि मायीयाशुद्धविद्याराग-कलासंचार्यमाणस्य पशुत्वमेव । इतरापेक्षया तु कति- पयाध्वोत्तीर्णतया समुत्कर्षोऽपि स्यात् । तदुक्तम्- 'कस्य नाम करणैरकृत्रिमैः पश्यतस्तव विभूतिमक्षताम् । विभ्रमादवरतोऽपि जायते त्वां व्युदस्य वरद स्तुतिस्पृहा ॥' इति श्रीमद्विद्यापतिना । एतच्च आगमकाण्डे निरूपयिष्यामः । तस्मात् निखिलोत्कर्ष- परामर्शनमपि तत्र स्वीकार्यम् । यद्यपि आयातदृढेश्वरशक्तिपातस्य स्वयमेवेयमिती परमशिव- भूमिरभ्येति हृदयगोचरम्, न तु अत्र स्वात्मीयः पुरुषकारः कोऽपि निर्वहति, सर्वस्य तस्य मायामयत्वेनान्धतमसप्रख्यस्यामायीयं शुद्धप्रकाशं स्वप्रतिद्वन्द्विनं प्रति उपायतानुपपत्तेः तथापि तदेव तथाविधं रूपं प्रख्योपाख्याक्रमेण स्वात्मपरावभासविषयभावजिगमिषया निःशेषोत्कर्ष- विशेषाभिधायि-जयत्यादिशब्दानुवेधेन परामर्शनीयम्, इति नमस्कारे जयत्यर्थ आक्षेप्यः । गया है-"विद्या के राग से रंगे हुए होने के कारण परमदेव का वास्तविरूप नहीं जान पाते हैं।" क्योंकि तब तक मायीय-अशुद्ध विद्या, राग, कला आदि में भ्रमण करने वाले पशुजीव ही कहलाते हैं और इसी में रहना ही एक प्रकार की पशुता मानी जाती है। बौद्धादि की अपेक्षा से तो जरूर कुछ-न-कुछ सांख्यादि लोग मार्ग उत्तीर्ण कर समुत्कर्ष प्राप्त किये हुए हैं। श्री विद्यापति ने इस विषय में ठीक ही कहा है- "हे श्रेष्ठ वस्तु को देनेवाले वरद ! अकृत्रिम इन्द्रियों से किस देखने वाले की तुझे छोड़कर अन्य में स्तुति करने की इच्छा भ्रम से भी हो सकती है ? अर्थात् व्यापक पूर्णदेव को छोड़कर किसी अन्य परिच्छिन्न देवी-देवता में कभी भी भ्रम से भी इच्छा नहीं हो सकती।" इस बात का हम आगम काण्ड में अच्छी तरह निरूपण करेंगे। इसलिए वहाँ पर सम्पूर्ण उत्कर्ष के परामर्श को भी माना हुआ है। ईश्वरसम्बन्धी शक्तिपात दृढरूप से हृदय में हो जाने पर तो अपने आप ही परमशिवभूमि प्राप्त हो जाती है, फिर उसे प्राप्त करने के लिए अन्य कोई भी यत्न करने की आवश्यकता नहीं दीखती, प्रयत्न तो अप्राप्त वस्तु के लिए किया जाता है किन्तु यह तो प्राप्त ही है फिर प्रयत्न क्यों किया जाये ? यहाँ कोई अपना पुरुषार्थ काम नहीं करता है, वह सब मायीय होने के कारण घनोभूत अन्धकार के समान होता है, वह मायीय शुद्ध प्रकाश का प्रतिद्वन्द्वी है वह उसका उपाय कैसे हो सकेगा, तो भी उसी प्रकार से उसीरूप में अपने आपको समझना और दूसरे लोगों को समझाने आदि क्रम से अपने को प्रकाशित करना और दूसरे को प्रकाशित कराना इत्यादि भाव को जनाने की इच्छा से सम्पूर्ण उत्कर्ष विशेष को कहने वाला है, इस विषय को 'जयति' इत्यादि शब्दों से परामर्श करते हैं, इसलिए यहाँ पर नमस्कार अर्थ में 'जयति' शब्द का आक्षेप किया हुआ है। १. अपने स्वरूप का ज्ञान करना प्रख्या कहा जाता है दूसरों को विदित करा देना उपाख्या है । प्रख्या से तो अपने आत्मा के अवभास का विषय बोध हो जाता है, क्योंकि अपने आप से ही अन्तर में प्रस्फुट हुए का विषय ज्ञान कर सकता है । उपाख्या से दूसरों में आभास का विषय बोध होता है । स्पष्ट रूप से उच्चारण किये गये शब्द का अर्थ दूसरों के द्वारा भी ज्ञान का विषय हो जाता है । इस प्रकार क्रमशः समस्त उत्कर्ष परमशिव रूप यह आभास के बिना भी स्वातन्त्र्य ( १-५-६) में आगे कहा गया