ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ कथंचिदासाद्य महेश्वरस्य दास्यं¹ जनस्याप्युपकारमिच्छन् । समस्तसंपत्समवाप्तिहेतुं तत्²प्रत्यभिज्ञामुपपादयामि ॥ १ ॥ इह परमेश्वरं प्रति या इयं कायवाङ्मनसां तदेकविषयतानियोजनालक्षणा प्रह्वता सा नमस्कारस्य अर्थः । सा च तथा कर्तुम् उचिता प्रामाणिकस्य भवति, यदि सर्वतो नमस्करणीयस्य उत्कर्षं पश्येत् । अन्यथा युक्तिम् अपरामृशतः अपरमार्थरूपेऽपि नमस्कारोद्यतस्य सांसारिक- पशुजनमध्यपातित्वमेव । यथोक्तम् 'न विन्दन्ति परं देवं विद्यारागेण रञ्जिताः।' इति । किसी प्रकार अनायासरूप से महेश्वर की दासता प्राप्त होकर दूसरे लोगों को भी प्राप्त हो जाये—ऐसे उपकार की भावना रखते हुए, जो समस्त सम्पत्ति की प्राप्ति में कारण है, मैं उस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा का कारिका के रूप में विस्तार करता हूँ ॥ १ ॥ इस प्रत्यभिज्ञाशास्त्र में परमेश्वर के प्रति मन, वाणी और शरीर की एक-विषयाकाररूप से वृत्ति का होना ही उसमें नम्रीभाव है । नमस्कार करने का अर्थ भी वही है, प्रामाणिक- जनों के लिए ऐसी श्रद्धा भक्ति का रखना ही समुचित माना जाता है । सब जगह यदि नमस्कार करने के अर्थ को ही उत्कर्षरूप में देखेंगे तभी ठीक होता है अन्यथा ठीक नहीं होता, क्योंकि जो उचित ढंग से विचार विमर्श करनेवाले नहीं हैं, अर्थात् परमार्थरूप नहीं है उस में भी उनका नमस्कार होने लगेगा । जैसा कि सांसारिक पशुजनों का नमस्कार होता है । कहा भी १. जिसको स्वामी के द्वारा यथेष्ट-अभीष्ट पदार्थ प्राप्त हो जाता है वही दास है [ दीयते स्वामिना यदभि- लषितमिति दासः ] अपने इष्टदेव की सेवा-शुश्रूषा में विभोर हो जाना ही दास्यभाव है इसकी व्युत्पत्ति है 'दास + ष्यञ्, दास्य = दासता । किन्तु इस प्रसङ्ग में महाफल का आस्वादन कर लेना ही दासता है । यह लौकिक दासता नहीं है । जिसमें दासता को हीन-दीन समझा जाता है । इसमें तो ईश्वर तदात्मता प्राप्त करना ही दासता कही गयी है और ईश्वर सम्बन्धी उत्कर्ष भी इसी का नाम है । दासता के कारण ही ईश्वर तत्त्व की उपलब्धि होती है और उसी ईश्वरपद माहेश्वर्य में विश्रान्ति भी प्राप्त कर लेते हैं । २. प्रत्यभिज्ञा शब्द का अर्थ अपने स्वरूप की पहचान करना होता है । इस अपार संसार में आकर जीवात्मा अपने स्वरूप को भूल जाता है । देह, इन्द्रिय, आदि को अज्ञान के कारण अपना स्वरूप मान बैठता है कि मैं देहरूप हूँ । स्थूल, कृश, युवा, सुन्दर इत्यादि अनित्य धर्मों को नित्य मान लेता है । यह शास्त्र स्व-स्वरूप की पहचान कराता है इसलिए इसका नाम प्रत्य- भिज्ञा शास्त्र [ दर्शन ] पड़ा है । इसकी व्युत्पत्ति ऐसी है कि प्रत्यभिज्ञायते उपायभावेन प्रत्यभिज्ञापदं प्राप्यते, अनया इति, अनेन शास्त्रेण इति । प्रति + अभि + ज्ञा + अङ् + टाप् = प्रत्यभिज्ञा जानना इस अर्थ में निष्पन्न है । प्रति शब्द का अर्थ होता है प्रतीप [ विपरीत-उलटा-प्रतिकूल ] जो वस्तु जैसी है उससे भिन्न समझना- देखना । अभि का अर्थ यह है—अभिमुख-सम्मुख रूप से अर्थात् सुस्पष्ट रूप से । "ज्ञा" का अर्थ है ज्ञान-प्रकाश । हृदय पट में भलीभाँति बोध हो जाना ही प्रत्यभिज्ञा कहलाती है यानी ईश्वर तत्त्व का विस्तृत भाव से अभिमुख प्रकाश हो जाना ही ईश्वर प्रत्यभिज्ञा कहा जाता है ।