भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३ तत्प्रशिष्यः करोम्येतां तत्सूत्रविवृतिं लघुम् । बुद्ध्वाभिनवगुप्तोऽहं श्रीमल्लक्ष्मणगुप्ततः ॥ ४ ॥ वृत्त्या तात्पर्यं टीकया तद्विचारः सूत्रेष्वेतेषु ग्रन्थकारेण दृब्धम् । तस्मात्सूत्रार्थं मन्दबुद्धीन्प्रतीत्थं सम्यग्व्याख्यास्ये प्रत्यभिज्ञाविविक्तयै ॥ ५ ॥ सर्वत्रालपमतौ यद्वा कुत्रापि सुमहाधियि । न वान्यत्रापि तु स्वात्मन्येषा स्यादुपकारिणी ॥ ६ ॥ ग्रन्थकारः अपरोक्षात्मनि दृष्टशक्तिकां परमेश्वरतन्मयतां परत्र संचिक्रमिषिषुः, स्वता- दात्म्यसमर्पणपूर्वम् अविघ्नेन तत्सम्पत्तिं मन्यमानः, परमेश्वरोत्कर्षप्रह्वतापरामर्शशेषतया परमेश्वरतादात्म्ययोग्यतापादनबुद्ध्या प्रयोजनम् आसूत्रयति— श्री उत्पलदेव के शिष्य श्री लक्ष्मणगुप्त से उक्त ईश्वरप्रत्यभिज्ञा दर्शनशास्त्र का अध्ययन कर, मैं श्री आचार्य उत्पलदेव का प्रशिष्य अभिनवगुप्त ईश्वरप्रत्यभिज्ञा की, सूत्ररूप कारिकाओं की विवृत्ति ( टीका ) का निर्माण करता हूँ ॥ ४ ॥ यहाँ पर वृत्ति शब्द से तात्पर्य लेना है एवं टीका से उसका विचार ग्रहण करना होगा । ग्रन्थकार ने स्वयं इसे सूत्ररूपी कारिकाओं में गूँथ दिया है । मतिमन्द लोगों को इस शास्त्र का ठीक-ठीक बोध हो जाये इसीलिए हम इसका विवेचन प्रत्यभिज्ञा की व्याख्या करते समय करेंगे ॥ ५ ॥ ईश्वर प्रत्यभिज्ञा को लेकर विमर्शिनी नामक व्याख्या की जा रही है; इससे सर्वसामान्य मन्दमति को या कहीं, किसी भी प्रतिभाशाली को या अन्यत्र दूसरों को लाभ न भी हो; किन्तु 'स्वान्तःसुखाय' अपने आपके लिए उपकार करनेवाली तो अवश्य होगी ॥ ६ ॥ जिसकी अपरोक्षरूप में शक्ति दृढ़तया देखी हुई है उस परमेश्वर की तन्मयता का दूसरे लोगों में भी संक्रमण हो जाय, अपने आप में परमेश्वर की तादात्म्यस्थिति समर्पित कर निर्विघ्नरूप से प्राप्त होनेवाली परमेश्वर की सम्पत्ति का अनुभव करते हुए, परमेश्वर सम्बन्धी प्रकर्षगुणों का श्रद्धा भावपूर्वक परामर्श करते हुए, उसके साथ तादात्म्यभाव प्राप्त करना ही एकमात्र प्रयोजन है इसको ग्रन्थकर्ता सूत्ररूप में कहते हैं— की अपेक्षा रखते हुए स्व-स्वरूप से अभिन्न होने पर भी भिन्न दर्पण में दिखायी पड़ने वाली नगरी के समान चित्र-विचित्र रंग-ढंग से मिला हुआ भासता है । भिन्न-भिन्न रूपों वाले पदार्थों में व्यक्त हो जाना ही द्वैत कहलाता है और जिसमें द्वैत भाव का अभाव हो वही अद्वैत है, वस्तुतः अहन्ता और इदन्ता से रहित जो ज्ञान है वही अद्वैत ज्ञान है । अथवा दो प्रकार से प्राप्त होता हो, उसमें होने वाले को द्वैत कहते हैं; संशय-विपर्ययादि ज्ञान से वर्जित अद्वैत ज्ञान है, संपूर्ण विश्व पर निर्भर होकर देहादि परिमित प्रमातृभावरूप कलंक को दबाकर, मैं उस परमशिव तत्त्व में प्रवेश करता हूँ—ऐसा कहना ही अद्वैत है ।