ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ ] ईश्वर्प्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ श्रीत्रैयम्बकसद्वंशमध्यमुक्तामयस्थितेः । श्रीसोमानन्दनाथस्य विज्ञानप्रतिबिम्बकम् ॥ २ ॥ अनुत्तरानन्यसाक्षिपुमर्थोपायमभ्यधात् । ईश्वरप्रत्यभिज्ञाख्यं यः शास्त्रं यत्सुनिर्मलम् ॥ ३ ॥ श्री त्र्यम्बक के विशिष्ठगुणों वाले वंश के मध्य में रखे गये मुक्तामणि के सदृश श्रीसोमानन्द- पाद विराजमान रहें ॥ २ ॥ अनुत्तर, स्वसंवित्, अनन्यसाक्षी एवं मोक्ष का उपाय दिखाने वाला जो अत्यन्त निर्मल शैव आगम रहस्य ‘शिवदृष्टिाशास्त्र’ है उसे आचार्य उत्पलदेव ने ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञा’ के रूप में विरचित किया है ॥ ३ ॥ होते रहे और उसके बाद ‘अहम्’ और ‘इदम्’ परामर्शरूप इन दो शाखाओं को भासित किया। एवं शुद्ध चिन्मय के अधिकरण ‘अहम्’ अंश में ही जब परमेश्वर ‘इदम्’ अंश को उल्लसित करते हैं, तब तो उसका पदार्थों में खींचे गये चित्र के तुल्य ही मात्र अस्फुट स्वरूप रहता है इसी कारण सदाशिव तत्त्व कहलाता है। जो कि उसमें इच्छा विशेष रखते हैं, ‘अहमिदम्’ सदाशिव ईश्वर के पदार्थवर्ग में स्फुटित होने पर उसी के ही अधिकरण ‘इदम्’ भाग में ‘अहम्’ भाग को सींचता है, तब फिर उसमें उस समय ज्ञानशक्ति की प्रधानता रहती है इसी को ‘इदमहम्’ ईश्वर तत्त्व कहा जाता है, इसीलिए अहं विमर्श की विशेषता न रहने पर भी ‘इदमहम्’ में ‘इदम्’ भाग की स्फुट और अस्फुट रूप से भी प्रधानता रहती है। जब फिर पदार्थों में बढ़े हुए भेद-भाव वाले ‘इदम्’ अंश की स्फुरण अवस्था में शुद्धचिन्मात्र का उसमें चले जाने पर ‘अहम्’ अंश उल्लासित होता है, तब तो फिर द्वैतवादियों के ईश्वर के समान ‘समधृत तुला’ न्याय से शुद्ध विद्या तत्त्व में ‘अहम्’ और ‘इदम्’ ये दोनों परामर्श समान होते हैं, जैसे तुला के दोनों पलड़े। जिस अभेद ज्ञान की भूमिका में समान स्फुट रूप से ‘अहम् और इदम्’ रूप प्रकाश में अंशों का जो प्रत्यवमर्श होता है उसका नाम ही शुद्ध विद्या है। इस दशा में क्रिया- शक्ति की प्रधानता रहती है। मंत्र और विद्येश्वर इसके प्रमाता है। ‘अहम्’ ऐसा ही परामर्श होगा; जिसमें क्रिया शक्ति की प्रधानता रहती है—इसलिए इसे विद्या तत्त्व कहा जाता है। यद्यपि परमशिव का ही यह सारा ऐश्वर्य है तो भी उसका ही यह सारा का सारा स्वरूप बाहर की ओर जिस तरह से दिखायी देता है वही शक्तितत्त्व का व्यापार है। उसी प्रकार सदाशिव और ईश्वर में भी विद्यातत्त्व रहता है। इस प्रकार किसी भी प्रकार की आकांक्षा न रखते हुए अहन्ता-इदन्ता के प्रतिभास न रहने पर भी बाहर की ओर सृष्टि शक्ति के उन्मेष और निमेष रूप अवस्था के तारतम्य से उद्भासनरूप चमत्कार करने वाले और वहाँ पर अपने अन्तर्गत जो शक्तिभाग है उसका शिवभाग से पृथक् भासन करना ही प्रसरण कहलाता है जिसका शिव आदि से लेकर पृथिवी तत्त्व तक संचार होता रहता है और अपने अन्तर भाग में मिला देने से निमेष स्थिति कहलाती है। एवं चिदानन्दमय अपने स्वरूप से अभिन्नरूप होने के कारण पूर्ण अहन्ता के उद्भासन करने में स्वातन्त्र्य शक्ति रूप अपनी कला को भासित करने के लिए सदाशिव और ईश्वर इन दोनों स्वरूपों की इच्छा प्रकट की। अर्थात् अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति से ही यह सारा-का-सारा विश्व बिना किसी सामग्री