भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 343 में से

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पृष्ठ 206

अथ द्वितीये क्रियाधिकारे भेदाभेदविमर्शानाख्यं द्वितीयमाह्निकम् विरोधमविरोधं च स्वेच्छयैवोपपादयन्। भेदाभेदौ च यो मन्त्रतत्त्ववित् तं स्तुमः शिवम् ॥ १ ॥ यदुक्तम्—अप्रतिहतसामर्थ्यात् भगवतो निर्माणशक्तिः इति, तदेव बाह्यवाददर्शनान्रुपपद्य- मानक्रियासंबन्धसामान्यादिपदार्थराशिसमर्थनमुखेन निर्वाहयितुं 'क्रियासंबन्धसामान्य............' इत्यादि '...................तेन न भ्रान्तिरीदृशी।' इत्यन्तं श्लोकसप्तकेन आह्निकं प्रस्तूयते। तत्र प्रथमश्लोकेन सूत्रकल्पेन 'एकानेकरूपस्य क्रियादेः बाह्यवादे विरुद्धधर्माध्यासदोषेणानुपपद्य- मानस्याप्यवश्यसमर्थनीयं वपुः' इति दृश्यंते। द्वितीयेन 'तत्र उपपत्तिः' सूच्यते। तृतीयेन 'निर्विकल्पकसंवेदनसंवेद्यत्वेऽपि विकल्पकाले एव स्फुटमेषां रूपम्' इत्युच्यते। चतुर्थपञ्चमाभ्याम् 'एकानेकस्वरूपताया विषयविभागः' चिन्रत्यते। षष्ठेन 'ग्रहणकसूत्रसूचितसंबन्धस्वीकृतानां क्रिया- कारकभावादीनां स्वरूपम्' उच्यते। सप्तमेन 'अर्थक्रियोपयोग' इति संक्षेपः। ननु एवं तया निर्माणशक्त्या अवभासनारूपया यत् निर्मीयते तस्यावभासनैव निर्माणं, न अन्यत्, सा च जो विरोध और अविरोध को तथा भेद और अभेद को अपनी इच्छामात्र से ही संपादन करते हैं; उस मन्त्र तत्त्ववेत्ता शिव की हम स्तुति करते हैं ॥ १ ॥ जिसके विषय में कहा गया है कि अप्रतिहत सामर्थ्यवाले भगवान् की निर्माण-शक्ति अर्थात् जिसका अप्रतिहत स्वातन्त्र्य रहता है ऐसी वह निर्माण-शक्ति है। जो कि जगत् का निर्माण करती रहती है, इसी को न्यायादि दर्शनों के सिद्धान्तों में नहीं घटनेवाली निर्माण-शक्ति कहा जाता है और क्रिया सम्बन्ध का सामान्यादि पदार्थ-समूह के पहले समर्थन करते हुए निर्वाह करने के लिए क्रियासम्बन्धसामान्य .....' । इत्यादि से लेकर '.....तेन न भ्रान्तिरीदृशी।' इन सात श्लोकों से इस आह्निक का प्रस्ताव करते हैं। प्रथम श्लोक से सूत्ररूप में हो 'एकानेकरूपस्य क्रियादेः- बाह्यवादे विरुद्धधर्माध्यासदोषेणानुपपद्यमानस्याप्यवश्यसमर्थनीयं वपुः' अर्थात् एक एवं अनेक- रूप क्रियादि का बाह्यवाद में विरुद्धधर्म के अध्यास का दोष दिखा करके नहीं घटनेवाले पदार्थों का भी अवश्य समर्थन करनेवाला विषय दिखायेंगे। द्वितीय श्लोक से 'तत्र उपपत्तिः' उसमें [ समर्थन की ] उपपत्ति दिखायेंगे। तृतीय श्लोक से 'निर्विकल्पकसंवेदनसंवेद्यत्वेऽपि विकल्पकाले एव स्फुटमेषां रूपम्' अर्थात् निर्विकल्पक ज्ञान संवेद्य वस्तु के भी विकल्पकाल में भी पदार्थों का स्फुटरूप रहता है [ निर्विकल्पक अनुभव के वेद्यकाल में यह पदार्थ वर्ग जिस स्थिति में रहता है उसी प्रकार विकल्पकाल में भी स्फुटरूप से रहता है ] यह दिखायेंगे। चतुर्थ एवं पञ्चम श्लोक से एकत्व और अनेकत्व का विषय विभाग करते हुए उन पर विचार प्रकट करेंगे। षष्ठ श्लोक द्वारा 'ग्रहणकसूत्रसूचितसंबन्धस्वीकृतानां क्रियाकारकाभावादीनां स्वरूपम्' अर्थात् 'ग्रहणक सूत्र से सूचित सम्बन्धों का जो क्रियाकारकादि भाव है उनका स्वरूप' कहेंगे। सप्तम श्लोक से 'अर्थक्रियोपयोगः' अर्थात् अर्थ क्रिया का उपयोग इस प्रकार संक्षेप में कह दिया। अत्र शङ्का उठती है कि इस प्रकार उस निर्माण-शक्ति से, जो कि निरन्तर अवभासित होती रहती है,

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