भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

१८४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-१ द्विचन्द्रादेरपि अस्ति, नीलादेरपि, नीलादिनिष्ठस्य कर्मसामान्यसंबन्धादेरपि ततश्च 'असत्यं सत्यं संवृतिसत्यमिति' य एवंप्रायेषु व्यवहारः स कथं संगच्छेत—निर्मेयत्वाविशेषात् ? इत्याशङ्क्य— ‘क्रियादीनामसत्यत्वं तावत् नोपपन्नम्’ इति वदन्—द्विचन्द्रादीनां तु इत्थमपि असत्यत्वम्, इति सूचयन् आह— क्रियासम्बन्धसामान्यद्रव्यदिक्कालबुद्धयः । सत्याः स्थैर्योपयोगाभ्यामेकानेकाश्रया मताः ॥ १ ॥ चित्तत्त्वात् अन्यत्र या क्रियाबुद्धिः कर्तृकर्मकरणादिषु 'चैत्रो व्रजति' 'तण्डुला विक्लिद्यन्ते' ‘एधा ज्वलन्ति’ इति, तस्या एकानेकरूपश्चैत्राद्यर्थ आश्रय आलम्बनम्, तथाहि—तत्तद्देशकाला- कारभिन्नः तत्र चैत्रदेहोऽनेकस्वभावोऽपि 'स एवायम्' इति एकरूपताम् अपरित्यजन्नेव निर्भासते, स एव च एकानेकरूपोऽर्थः क्रिया तथैव प्रतिभासनाच्च पारमार्थिकी, द्विचन्द्रादि तु तथा भास- जिसका भासना ही एक प्रकार निर्माण माना जाता है, अवभासन से अतिरिक्त नहीं, और वह तो द्विचन्द्रादि में भी भासन-शक्ति रहती है, एवं नील-सुखादि में भी होती है, नीलादि-पदार्थों में रहनेवाले कर्म [ क्रिया ] सामान्य [ जाति ] के सम्बन्ध में भी रहती है और इससे सिद्ध होता है कि 'असत्य, सत्य और संवृत्तिसत्य ये जो तीन प्रकार के व्यवहार देखे जाते हैं वे कैसे संभव हो सकते हैं; क्योंकि सब जगह निर्माण तो एक सा ही दिखायी पड़ता है ? अर्थात् सर्वत्र द्विचन्द्रादि में भी तो अवभासन एक सा ही होता हुआ दिखायी देता है ] ऐसी आशङ्का कर ‘क्रियादि का जो सत्यत्व है वह उपपन्न नहीं होता’, यह कहते हुए—किन्तु द्विचन्द्रादि में तो सब तरह असत्यत्व सिद्ध होता है, यह सूचना देते हुए कहते हैं— स्थिरता एवं उपयोग के द्वारा, क्रिया और उसका द्रव्यों के साथ सम्बन्ध तथा जाति, द्रव्य, दिशा, कालादि का ज्ञान, ये सभी प्रायः सत्य ही है; एक या अनेक दोनों के आश्रय से माने हुए हैं ॥१॥ चेतन में क्रिया नहीं रहती, अन्यत्र कर्ता, कर्म, करणादि में तो क्रिया बुद्धि रहती है 'चैत्रो व्रजति' चैत्र जाता है, 'तण्डुला विक्लिद्यन्ते' चावल पक रह हैं, 'एधा ज्वलन्ति' लकड़ियाँ जलती हैं इत्यादि, उसका एक या अनेकरूप से चैत्रादि के अर्थ का विषयत्व होता है । देखिये— वहाँ पर उन-उन देश, काल एवं आकारों से भिन्न चैत्र का देह अनेक रूपों में रहता हुआ ‘स एवायम्’ वही यह चैत्र है, इस प्रकार एकरूपता को न छोड़ता हुआ ही निर्भासित होता रहता है और एक से अनेक रूपों में भासित होना ही क्रिया है, उसी प्रकार वह भासित होने से १. निर्माण-शक्ति का अवभास क्रम तो देखा जाता है और नीलादि-पदार्थों में भी रहनेवाले कर्म-सामान्यादि का व्यवहार कैसे रहेगा ? दो चन्द्रमा में तो असत्यरूप से रहते हैं, नीलादि-पदार्थों में सत्यरूप से रहती हैं और क्रियादि में संवृत्ति सत्यरूप से रहती हैं, जैसे रूपादि पदार्थ भिन्न-भिन्न रहते हुए भी ज्ञान को उत्पन्न करते हैं और बहुत से परमाणु समूह नियम से अर्थक्रिया संपादित करते हैं तथा भिन्न-भिन्न क्षणों का समुदाय ओदनरूप फल को निष्पत्ति कर देता है, उसी प्रकार संवृत्ति सत्य भी है, जैसे अपने धर्म से अर्थ का अवच्छेदन कर दूसरे स्वरूप में परिणत कर देती है जिस कारण धर्म से आवृत हो जाता है, इस प्रकार संवृत्तिसत्य भ्रान्ति से भिन्न है, संवृत्तिसत्य ही कुछ नहीं होता—क्योंकि सामान्यादि का सत्यत्व उसमें रहता है, द्विचन्द्रादि तो असत्य ही होता है ।