ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-२, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १८५ मानमपि उत्तरकालं प्रमाव्यापारानुवृत्तिरूपस्य स्थैर्यस्य उन्मूलनेन 'द्विचन्द्रो नास्ति' इत्येवंरूपेण असत्यम्, इह पुनः 'चलति चैत्रः' इत्येवंभूतो विमर्शः अनुवर्तमानो न केनचित् उन्मूल्यमानः संवेद्यते, द्विचन्द्रादि च यद्यपि ह्लादोद्वेगयोः उपयुज्यते, तथापि द्विचन्द्राभिमानी न तावतीं तत्र अर्थक्रियाम् अभिमन्यते अपि तु यादृशी एकेन शशिना कर्तव्या-तिमिरापसारणादिरूपा, तादृश्येव अपरेण, इति न तद्दिगुणाम् अर्थक्रियाम् तत्र अध्यवस्यति, तस्यां च असौ न उपयुज्यते, व्रज्यायां तु यामेव ग्रामप्राप्तिम् अध्यवस्यति तस्याम् अविकलायाम् उपयोगोऽस्या, इति- स्थैर्यात् उपयोगच्च एकानेकरूपक्रियातत्त्वावलम्बना बुद्धिः सत्यैव, एवं संबन्धादिषु कालपर्यन्तेषु वाच्यम् उत्तरकारिकासु स्फुटीभविष्यति ॥ १ ॥ ननु एकत्वम् अनेकत्वं च परस्परं विरुद्धे, कथम् एकत्र वस्तुनि स्यातां, ततश्चायं बाधक- प्रमाणकृतः स्थैर्योन्मूलनप्रकारः ? इत्याशङ्कयाह- तत्रैकमान्तरं तत्त्वं तदेवेन्द्रियवेद्यताम् । संप्राप्यानेकतां याति देशकालस्वभावतः ॥ २ ॥ इह तावत् चैत्रे चलति दृष्टे न जातुचित् न चलति अयम् इति बुद्धिः जायते-न रजतम् इतिवत्, द्विचन्द्रेऽपि नायं द्विचन्द्रः तिमिरवशात्, अहम् उपप्लुतनायनः परम् एवं वेद्मि इति भवति ही पारमार्थिक कही जाती है किन्तु द्विचन्द्रादि तो वैसा भानमान होता हुआ भी उत्तरकाल में यथार्थ प्रमाज्ञान के हो जाने पर उन्मूलित हो जाता है, जिससे 'द्विचन्द्रो नास्ति' ऐसा बोध होने लग जाता है इसी कारण असत्य माना जाता है, क्रिया में तो 'चलति चैत्रः' अर्थात् चैत्र जाता है, ऐसा जो विमर्श होता है उसका उन्मूलन कोई कभी भी नहीं करता हुआ जाना जाता है । यद्यपि द्विचन्द्रादि आनन्द एवं उसके अभाव उद्वेग का उपयोगी होता है, तो भी 'द्विचन्द्रादि' का अभिमान करनेवाला मानता है कि यह 'द्विचन्द्रः' है, उतनी अर्थक्रिया का उसमें अभिमान नहीं रहता; जितना एक चन्द्रमा से अन्धकार दूर करना रखता है, वैसी दूसरे चन्द्रमा से नहीं होती, दुगुनी अर्थक्रिया 'प्रकाश' देने में उसे विश्वास नहीं होता; क्योंकि वह इसके लिए उपयोगी नहीं है, इसीलिए उसमें असत्य बुद्धि उत्पन्न होती है, किन्तु चैत्र विषयक गमन में तो ग्राम की प्राप्ति में अर्थक्रिया प्रत्यक्ष फल के रूप में दिखायी देती है, उपयोग भी तो अर्थक्रिया का सत्य अविकल है, इसलिए स्थैर्य और उपयोगी होने के कारण एक और अनेकरूप क्रियातत्त्व का आलम्बन करनेवाली बुद्धि सत्य ही होती है, इस प्रकार सम्बन्धादि से लेकर काल पर्यन्त कहना चाहिए यह बात हम आगे कारिकाओं में स्पष्ट करेंगे ॥ १ ॥ अब प्रश्न करते हैं कि एकत्व और अनेकत्व इन दोनों का स्वभाव परस्पर विरुद्ध सा ही लगता है; एक ही वस्तु में दोनों कैसे रह पायेंगे ? इसलिए स्थिरता के खण्डन करने का प्रकार बाधक मूलक है ? इस पर आशङ्का कर कहते हैं- उसमें एक ही आन्तरिक तत्त्व इन्द्रियों के द्वारा वेद्य होकर देश और काल के स्वभाव भेद से अनेकरूपता को प्राप्त कर लेते हैं ॥ २ ॥ चैत्र चलता है-इस प्रकार देखने पर नहीं कह सकते हो कि यह नहीं चलता है; ऐसी बुद्धि नहीं उत्पन्न होती, जैसी शुक्तिका को देखने पर यह रजत नहीं है, दो चन्द्रमा को भी देख २४