ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन्मूलनाबुद्धिः, यत्तु उक्तम्—एकमेव कथम् अनेकं भवति इति, तत्र उच्यते—इह कारणमेव कथम् अकारणं भवति, अथ उच्यते—विषयभेदात् तथा, इति तद्विषयभेदे एतत् न विरुध्यते, इति केन अयं विनीर्णो वरः ? संवेदनेन इति चेत् ‘चलति’ इत्यादौ संवेदनमेव अस्माभिः प्रमाणी- कृतं किमिति न सह्यते, विषयभेदोऽपि च अत्र वक्तुं न शक्यते, तथाहि—आभासान्तरेण असंभेदने तदेकाभासमात्रम्, अत एव अन्यापेक्षावियोगात् अन्तरङ्गत्वात् आन्तरम् अनुवर्तमानं तथाभूता- भासमात्रग्रहणोचितान्तःकरणवेद्यतया च आन्तरं तथा स्वरूपापरिच्युतेः तत्त्वम् आभासान्तर- योगेन तननसहिष्णुत्वाच्च तत्त्वम् ‘एकम्’ इति प्रतीयते, तदेव देशाभासेन इह अमुत्र इति, कालाभासेन अधुना तदानीमिति, स्वभावाभासेन कृशः स्थूल इत्यादिना, मिश्रतया अनेकमिति बाह्येन्द्रियवेद्यतायां प्रतीयते, तथा ‘स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य…………… १’ इति उक्तनीत्या विश्वमेव आन्तरं सत् एकम्, तदेव सान्तर्विपरिवर्तिनः उभयेन्द्रियवेद्यत्वम्, इति वक्ष्यमाणकार्यकारणभाव- तत्त्वदृष्ट्या इन्द्रियवेद्यतायामनेकम्—देशाद्याभासमिश्रणात् इति, एकत्वम्—आभासान्तरामिश्र-
कर यह ‘द्विचन्द्रः’ नहीं हैं, ऐसा बोध अपने को हो जाता है; नेत्र दोष से दूषित होने के कारण मैं चकाचौंध हो गया हूँ, इसलिए ऐसा समझता हूँ अतः यह दो चन्द्रमा नहीं हैं—ऐसी बुद्धि हो जाती है, किन्तु यह जो कहा गया है कि एक ही अनेक कैसे हो जाता है, वहाँ पर यह कहना है कि कारण [ बीजादि ] कैसे अकारण [ अङ्कुरादि ] बन जाते हैं, इसके समाधान में उत्तर देते हैं कि विषय भेद से वैसा हो जाता है, [ कारण-अकारण ] विषय के भेद हो जाने पर कोई विरोध नहीं होता, यदि यह कहो कि विषय भेद से ऐसा हो जाता है तो मैं भी कहूँगा कि यह भी तो विषय भेद से हो जाता है, इसको किसने वरदान दिया है कि यह इसके लिए नहीं होगा ? यदि कहो कि संवेदनरूप ज्ञान से ऐसा होता है तब तो हम लोगों ने भी ‘चलति’ इत्यादि ज्ञान को जो प्रमाणित किया है इसको क्यों नहीं मान लेते हो ? इसमें विषय भेद भी नहीं हैं, ऐसा नहीं कह सकते, देखिये—दूसरे आभास से न ज्ञान होने पर एक ही आभास मात्र रहता है, इसीलिए किसी अन्य की अपेक्षा न रहने के कारण अन्तरंग हो जाने से वह अपने भीतर स्थिर रहा करता है । उसी प्रकार आभास ग्रहण में समर्थ अन्तःकरण से वेद्य होकर उसका अपने स्वरूप से च्युत न होना ही आन्तरतत्त्व कहलाता है; उसको तत्त्व इसलिए कहते हैं कि दूसरे आभास के सम्बन्ध से अपने विस्तार को सह सकता है जिससे ‘एकम्’ एक प्रतीत होता है, उसी को देश आभास से यहाँ और वहाँ कहा जाता है, काल आभास से ‘अधुना’ अब और ‘तदानीन्तन’ तब कहा जाता है, स्वभाव के आभास से कृश एवं स्थूल इत्यादिरूपों से कहा जाता है, मिले-जुले अनेकरूपों में बाह्येन्द्रियों के ज्ञान से प्रतीत होते हैं, वैसा कहा भी है ‘स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य’ अर्थात् अपनमें रहनेवाले स्वामी का……। इस कही हुई नीति से यह सारा का सारा विश्व ही आन्तरतत्त्व में एक सद्रूप होकर रहता है, उसी अन्तर्वर्ती परिवर्तन के साथ दोनों इन्द्रियों से वेद्य होकर आगे कहनेवाले कार्य- कारणभाव यथार्थ दृष्टि से इन्द्रियों के द्वारा वेद्य होने पर अनेकता को प्राप्त हो जाते हैं—देशादि आभास के मिल जाने से, ‘एकत्व’—दूसरे आभास के मिल जाने पर केवल अन्तःकरण से वेद्य
१. बाह्य-इन्द्रियों से वेद्य होने के कारण सभी प्रमाणों का आसाधारण रूप बाहर में रहने पर अकेला आ जाता है ।