ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-३ चैत्रो विचित्रदेशक्रः परम् अनुभूयते, न तु अनेकाभाससंमिश्रीकारे बाह्येन्द्रियस्य अविकल्पकस्य व्यापारः—संनिहितविषयबलोत्पत्तेः अविचारकत्वात् इत्याहुः, विकल्पेनापि मानसेन तथाभूतं वस्तु नैव स्पृश्यते इति कया धिया वस्तु एकानेकरूपं गृह्येत ? इति परव्यामोहनिवर्हणाय आह— तद्द्वयालम्बना एता मनोऽनुव्यवसायि सत् । करोति मातृव्यापारमयीः कर्मादिकल्पनाः ॥ ३ ॥ इह ‘ज्ञानमालाया अन्तःसूत्रकल्पः स्वसंवेदनात्मकः प्रमाता जीवितभूतः’ इति उपपादितं प्राक्, स च ‘स्वतन्त्र’ इत्यपि निर्णीतम्, स तु विशुद्धस्वभावः शिवात्मा, मायापदे तु संकुचित- स्वभावः पशुः, तदस्य मनःसमुल्लासावसरे विकल्पभूमिकायां स्फुट उल्लासः, ऐन्द्रियके निर्वि- कल्पके सदाशिवेश्वरदशाभ्युदयात्, अविकल्पकबोधाबहिर्भूतविमर्शव्यापारस्य पश्चाद्भाविनं व्यवसायं निश्चयात्मकं विकल्पकम् अनुव्यवसायशब्दवाच्यं विदधदन्तःकरणम् एतान् क्रिया- सम्बन्धादिविकल्पान् सम्पादयति, ते च विकल्पाः तद्द्वयम् एकत्वानेकत्वरूपम् अवलम्बन्ते, न हि विकल्पेषु प्रतिभासमानम् अवस्तु तत्—इति हि उक्तम् ‘प्रकाशतैव वस्तुत्वम्’ इति, न च विकल्पस्य प्रकाशरूपतां मुक्त्वा आरोपणाध्यवसायाभिमानादिनामधेयं व्यापारान्तरं युक्तम्, नहीं होता, इस प्रकार वस्तु एक—अनेकरूप कैसे होगी ? देखिये—बाह्य-इन्द्रिय [ चाक्षुष अनुभव ] से चैत्र एक देश को छोड़कर दूसरे देश में चला गया—ऐसी प्रतीति होती है, किन्तु अनेक आभासों को मिला देने पर बाह्येन्द्रिय जन्य अविकल्पक व्यापार नहीं हो सकता; क्योंकि संनिहित विषय के बलोत्पत्ति का ज्ञान नहीं होता है, यह कह सकते हैं, मानस विकल्प से भी एक एवं अनेकरूप वस्तु का बोध नहीं हो सकता तब फिर किस बुद्धि [ अनुभव ] से एक-अनेकरूप वस्तु को ग्रहण करेंगे ? यह दूसरों के ऊपर मोह के आवरण को हटाने के लिए कहते हैं— इसलिए अनुव्यवसाय करनेवाला स्थिर मन इन एकत्व और अनेकत्व का आधार लेकर प्रमाता के व्यापारमय कर्मादि की कल्पना करता है ॥ ३ ॥ यहाँ पर ‘ज्ञानमाला का आभ्यन्तरीय स्वसंवेदनरूप प्रमाता ही जीवन है, इसका हमने ज्ञानाधिकार के द्वितीय आह्निक में विवेचन कर दिया है और वह ‘स्वतन्त्र’ है इसका भी निर्णय कर दिया है, वह तो विशुद्ध स्वभाववाला शिवात्मा है, किन्तु मायायी जगत् में तो संकुचित- परिच्छिन्न स्वभाववाला पशु हो जाता है, इसलिए इसका मन के समुल्लास अवसरकाल में, जो विकल्प भूमिका है उसमें स्फुटरूप से उल्लास होता है; क्योंकि इन्द्रियजन्य निर्विकल्प दशा में सदाशिव और ईश्वर दशा का उदय होता है, अविकल्प बोध से बाहर में नहीं होनेवाला जो विमर्श का व्यापार है उसके बाद में होनेवाला निश्चयात्मक व्यवसायरूप विकल्प को अनुव्यवसाय शब्द का वाच्य होता है, उसी को करनेवाला अन्तःकरण क्रिया सम्बन्धादि विकल्पों को सम्पादन करता है, और वे सब के सब विकल्प उन एकत्व और अनेकत्वरूप द्वित्व का ही अवलम्बन करते हैं, इसलिए विकल्पों में प्रतिभासित होनेवाली अवस्तु नहीं हो सकती; यही हमने कहा है कि ‘प्रकाशतैव वस्तुत्वम्’ आभास को ही वस्तु कहा जाता है और विकल्प के प्रकाशरूप को छोड़कर आरोप करना, अध्यवसाय करना और अभिमानादि नामक दूसरा व्यापार युक्त नहीं बैठता है,