ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-२, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १८९
ततोऽबाह्यं बाह्यम् आरोपयन्ति इत्यादि वचोवस्तुशून्यम्, तच्च एतत् उक्तम् 'भ्रान्तित्वे चाव- सायस्य…………' इत्यत्र। अथ ब्रूयात्—परो यत् इन्द्रियज्ञानेन प्रकाशनीयं स्वलक्षणं तत् कथं विकल्पः स्पृशेदिति, भवेदेवं—यदि विकल्पो नाम स्वतन्त्रो भवेत्, यावता प्रमातुरसौ व्यापारः प्रमाता च पूर्वानुभवान्तःस्वसंवेदनरूपः तदस्य च अयमेव पूर्वानुभवसंस्कारो—यत् विकल्पन- व्यापारकालेऽपि पूर्वानुभवात्मत्वम् अनुज्झन्नेव आस्ते, ततः पूर्वानुभवतादात्म्यापन्नप्रमातृत्त्व- व्यापारोऽपि विकल्पस्तद्विषय एव, अत एवमुक्तम् आचार्येण—'पूर्वानुभवसंस्कारः प्रमातुरयमेव सः। यदपोहनकालेऽपि स पूर्वानुभवः स्थितः ॥' इति, तस्मात् प्रमातुः यो व्यापार एकत्वानेकत्व- संयोजनात्मा स एव प्रकृतो यत्र तादृशीः क्रियादिकल्पना एकानेकवस्तुविषया 'एता' इति ग्रहणकवाक्यसूचिता मन एव करोति इति स्थितम्, यद्यपि अविकल्पेऽपि सामान्याद्यवभासो घटमात्रावभासादौ, तथापि न तदा सामान्यादि स्फुटं—समानोपरञ्जकत्वे सम्बन्धिद्वयोद्भूवे क्रमिकक्षणसन्तानात्यागे अवयवकदम्बकस्वीकारे अवध्यवधिमत्परिग्रहादौ सामान्यसम्बन्धक्रिया- द्रव्यादिगादिपदार्थस्य परमार्थतः स्फुरणात्, इति, 'मानसविकल्पग्राह्या एकानेकरूपाः सामान्यादय' इति स्थितम्। एवं च संवृतिः विकल्पबुद्धिः, तद्वशात् उच्यतां संवृतिसत्यत्वं सत्यत्वस्यैव तु प्रकारः तत्, इति द्विचन्द्रादिवत् न असत्यता ॥ ३ ॥ इसलिए अबाह्यरूप आन्तर तत्त्व को बाह्यरूप में देखते हैं इत्यादि कहना ही वस्तु शून्य हो जाता है, इसी कारण यह कह दिया है 'भ्रान्तित्वे चावचायस्य ˙।' इस कारिका में अब भी कोई दूसरा यदि कहे कि जो इन्द्रिय ज्ञान से प्रकाशित होनेवाला निर्विकल्पक ज्ञान है वह कैसे विकल्प को स्पर्श करेगा, ऐसा तब होता जबकि विकल्प का कोई अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रहता—किन्तु ऐसी तो कोई बात दिखती नहीं, जब तक प्रमाता का वह व्यापार और प्रमाता दोनों पूर्व स्वसंवेदन- रूप होते और उसका यह पूर्व के अनुभव संस्कार जो कि विकल्प व्यापार काल में भी पूर्वानुभव- रूप को नहीं छोड़ता हुआ रहता है, इससे यह सिद्ध होता है कि जब तक पूर्वानुभव अपने स्वरूप को प्रकाश करता रहता है तब तक ही पूर्वानुभव के साथ तादात्म्य को प्राप्त होकर, प्रमाता और उसका व्यापार भी विकल्प पूर्व के अनुभव का ही विषय होता है, इसलिए आचार्य ने कहा कि—'पूर्व के अनुभव का संस्कार प्रमाता का ही विषय है। विकल्प दशा में भी पूर्व का अनुभव स्थिर रहता है।' इसलिए प्रमाता का जो व्यापार एकत्व और अनेकत्व का संयोजनरूप है वही प्रकृत प्रसङ्ग में आ रहा है जिसमें ऐसी एक एवं अनेक वस्तु विषयक क्रियादि की कल्पना है, उसे 'एता' इस शब्द से सूचित किया गया है, जब कि वह मन ही करता है यह बात स्थिर हुई, यद्यपि अविकल्प दशा में भी केवल घटादि के अवभास में सामान्यादि का अवभास होता है, तो भी सामान्यादि का उसमें स्फुटाभास नहीं होता; दो सम्बन्धियों से उत्पन्न होनेवाले समानतः उपरञ्जकता में क्रमिक क्षण-सन्तान छोड़ देने पर एवं अवयव समूह के स्वीकार करने पर अवधि और अवधिमान् के ग्रहण करने में सामान्य सम्बन्ध, क्रिया, द्रव्य, दिशा, कालादि पदार्थों का परमार्थतः स्फुरण होने से मानस विकल्प से गृहीत होनेवाले एकरूप और अनेकरूप सामान्यादि होते हैं यही सिद्ध होता है। इस प्रकार संवृति विकल्पबुद्धि, उसी कारण से संवृति है और सत्यत्व का प्रकार भी सत्य होता है, उसमें द्विचन्द्रादि की जैसी असत्यता नहीं रहती, अपितु सत्य रहता हुआ सत्यरूप में भासित भी होता है ॥ ३ ॥