भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

१९० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-४ तत्र च अयं संविदवतरणक्रमो—यत् क्रियाशक्तेरेव अयं सर्वो विस्तारः, तत्रापि सम्बन्ध एव मूलभूतः तथाहि—समानानां यत् एकं भाति तत् सामान्यम्, देवदत्तस्य यत् वैतत्यं सा क्रिया, अवयवानां यदैक्यं वैतत्यं च देशतः सोऽवयवी, इमम् अवधिं कृत्वा अयम् इत्थम् ततोऽ य अयं पुरस्तात् इत्यादिर्र्दिक्, अस्यायं क्रियाप्रतानः सहभावेन आस्ते विनाभावेन वा इति वर्तमानादिः कालः, यावत् हि प्रातिपदिकार्थस्य पृष्ठपाति वपुः भाति तदतिरिक्तं सर्वं सम्बन्ध एव इति कारकाणामपि सम्बन्धरूपतैव, केवलं क्वचित् असौ सम्बन्धो व्यपदेशान्तरग्रंन्थि सहते, यथा सास्नादिमतां सम्बन्धो 'गाव' इति एकव्यपदेशसहिष्णुः तत्र सामान्यादिव्यवहारः, व्यपदेशान्तर- ग्रन्थिभङ्गे तु सम्बन्धवाचोयुक्तिरेव, अत एव मुष्टिप्रस्थपलादिप्रमाणपरिमाणोन्मानरूपं तत्र अन्तर्गतं वा अणुमहदादि संख्यापृथक्त्वादि च यत् तत् सर्वं सम्बन्धस्यैव विजृम्भितम्, येऽपि सामान्यादि वस्त्वन्तरम् अमंसत तेऽपि तत्र समवायम् अभ्युपजग्मुः जीवितत्वेन, समवायश्च सम्बन्धात्मा तदनुग्राह्यो वा केषाञ्चित्, यत आहुः 'तां शक्तिं समवायाख्यामनुगृह्णाति सम्बन्धः।' इति, यदपि च कारकं तदपि क्रियामुखप्रेक्षि, सापि कालं प्राणेश्वरम् आश्रयति, सोऽपि क्रिया- द्वारेण सर्वभावान्, सापि सम्बन्धम् उद्धुरयति इति सम्बन्धाधौनैव इयं चित्रा लोकयात्रा, तदाह इस प्रकार [ क्रियादि संवृतिसत्य में द्विचन्द्रादि के समान असत्यता का निराकरण कर देने पर ] कहते हैं कि वहाँ पर संवित् ज्ञान का जो क्रम है, वह सब क्रिया-शक्ति का ही विस्तार है, उसमें भी एक-अनेकरूप सम्बन्ध हो मूलभूत कारण माना जाता है, देखिये — समान पदार्थों में जो एकरूपता दिखती है वही सामान्य कहलाता है, देवदत्त का विस्तार दिखायी पड़ता है वही तो क्रिया है अवयव पदार्थों में जो एकता का विस्तार दिखायी देता है वही देशभाव से अवयवी माना जाता है, इसी को सीमित मान करके यह ऐसा है, इसके पूर्व में यह है, इत्यादि भावों को लेकर दिशाएँ बन जाती हैं। इसी के साथ क्रिया के विस्तार से वर्तमानादि काल का भाव होता है, जब तक प्रातिपदिकार्थ पोषक-शरीर का भाव होता है तब तक ही उसकी स्थिति रहती है, उससे अतिरिक्त सब सम्बन्ध ही रहता है इसीलिए कारकों की भी सम्बन्धरूपता मानी जाती है । वह सम्बन्ध केवल कहीं पर ही दूसरे नाप से अभिहित होता है। जैसे सास्नादि के सम्बन्ध से 'गौ' यह नाप कहा जाता है और उसमें सामान्यादि का भी व्यवहार होता है, दूसरा कोई प्रकार नहीं होता है और यही कहने का व्यवहार जगत् का नियम है, इसलिए एक मुट्ठी, प्रसर, पलादि परिमाणों से और उसके अन्तर्गत अणु, महान्, संख्या-पृथक्त्वादि जो कुछ छोटा या बड़ा है वह सब सम्बन्ध को ही लेकर होता है और सारा का सारा विस्तार सम्बन्ध का ही है, [ अधिक परिमाण, कम-परिमाण, पूरा-परिमाण। लम्बाई चौड़ाई ये सब बाह्य संख्या ही कही जाती हैं ] जो लोग सामान्यादि [ द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, सम्बन्ध और विशेष ] पदार्थों को दूसरी वस्तु के रूप में मानते हैं। वे भी उसमें समवाय को ही जीवनरूप से माने हुए हैं और समवाय भी तो एक प्रकार से सम्बन्धरूप ही है अथवा किसी के मन में समवाय के द्वारा ही उत्पन्न होता है; क्योंकि उन लोगों का कथन भी है— सम्बन्ध ही समवाय नामक शक्ति पर अनुग्रह करता है और जो कारक है वह भी तो क्रिया की उन्मुखता रखता है, क्रिया भी अपने प्राणेश्वर काल का आश्रय लेती है, वह काल भी क्रिया के द्वारा समस्त पदार्थ राशि को देखता है, इस प्रकार क्रिया सम्बंध को जगाता है,