भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-२, आ.-२, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १९१ आचार्य एव—'भेदाभेदात्मसम्बन्धसहसर्वार्थसाधिता। लोकयात्राकृतिर्यस्य स्वेच्छया....' ॥ इति, अतः सम्बन्धमेव प्रथमं निरूपयितुम् आह— स्वात्मनिष्ठा विविक्तभा भावा एकप्रमातरि । अन्योन्यान्वयरूपैक्ययुजः सम्बन्धधीपदम् ॥ ४ ॥ राजा पुरुषश्च बहिस्तटस्थौ स्वात्मैकपरिसमाप्तौ प्रमातृभूमौ यद्वैक्यं गच्छतः, न च ऐक्य- मात्रं—तयोः भेदविगलनापत्तेः, अपि तु परस्पररूपश्लेषात्मकं युगपदेव निमज्जदुन्मज्जद्भेदाभेद- कोटिद्वयदोलारोहणलक्षणम् अन्वयरूपं, तदा तावेव सम्बन्धधिय आलम्बनं भवतो 'राज्ञः पुरुष' इति, तथा हि—राजा यदा पूर्वं धिया गृहीतोऽपि न स्वात्मविश्रान्त्यौ तुष्यति तदा रूपान्तरेण पुंसा श्लेषं भजन् कृतार्थोभवति पुरुषोऽप्येवं, स च एष रूपश्लेष एकएव उभयोः चिदात्मनि तथा इसलिए यह सारा का सारा लोक व्यवहार सम्बन्ध के अधीन ही रहता है, उसके विषय में आचार्यपाद ने कहा है कि—भेद और अभेद के साथ समस्त अर्थों का साधन हो जाता है। अपनी इच्छा से लोक यात्रा का आकार-प्रकार बनता है। इसलिए सर्वप्रथम सम्बन्ध का ही निरूपण करते हुए कहते हैं— एक ही प्रमाता में भिन्न-भिन्न रूपों से भासनेवाले भाव-पदार्थ यदि उसमें भासित होते हैं, तो परस्पर अन्वयरूप से एकत्व को प्राप्त होकर सम्बन्धरूप का वाच्य बन जाते हैं ॥ ४ ॥ राजा और पुरुष ये दोनों परस्पर भिन्न-भिन्न हैं। वे अपने आप में तटस्थरूप से रहते हैं तथा प्रमातृभूमि में संमिलित होकर एकत्व की प्राप्ति कर लेते हैं और वे स्वयं तो एक नहीं हो पाते; क्योंकि तब तो भेद ही विनष्ट हो जायेगा, अपितु प्रमाता की बुद्धि में परस्पर मिल करके एक ही बार डूबते हुए एवं ऊपर की ओर उठते हुए भेद-अभेद कोटिरूपी झूले पर चढ़े हुए के समान हो जाते हैं, तब सम्बन्ध बुद्धि का आलम्बन होता है और यह राजा है तथा यह पुरुष है, देखिये—जब राजा पूर्व बुद्धि से गृहीत होता हुआ भी वह अपने में विश्रान्ति का अनुभव नहीं करता तब दूसरे रूप से पुरुष के साथ संपर्क कर कृतार्थ हो जाता है उसी प्रकार पुरुष भी कृतार्थ १. 'राज्ञः पुरुषः' इस वाक्य का यह आशय है—कि मन से भी चाक्षुष प्रत्यक्ष का परामर्श होता है, इसलिए राजा एवं पुरुष का एक पिण्डीभाव से ऐक्य नहीं बैठता है और न तो बाहर के जैसा तटस्थ रूप से ही भेद होता हुआ दिखाई देता है, अपितु यही वह सम्बन्ध प्रतीति कहलाती है जो यह भेद प्रथा सम्बन्धियों में दिख पड़ती है, वह भी बाह्य एवं आन्तररूप से ठीक ही बैठती है। इसमें कोई विरोध नहीं है और विमर्श बल से अन्वय प्रमाता के साथ नहीं बैठती है, इसलिए 'राज्ञः पुरुषः' ऐसा कहा जाता है। २. वस्तुतः प्रमाताओं की एकता को ही एकता कहा जाता है विशेषण और विशेष्य के कारण ही कभी 'राज्ञः पुरुषः' राजा का पुरुष है और कभी 'पुरुषस्य राजः' यह पुरुष का राजा है—ऐसा होता है नील एवं कमल, धव और खदिर इस से भिन्न इत्यादि, वैचित्र्यभाव से रहनेवाले के भेद को न छोड़ने- वाले विशेषण का ही विशेष में अन्तः प्रवेश से तद्रूप होकर एक भावपूर्वक परिणत होना और तरह- तरह के विरुद्धधर्मी के अध्यास दोष को छोड़ देना, फिर भी प्रमेयरूप से निर्मित होकर भासित होता रहता है।