भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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१९२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-५ अवस्थानरूपः पूर्वप्रतिलब्धसंवित्प्रतिष्ठे तत एव अधिकसंविन्मज्जनात् अनाभासमानपृथग्भवन- लक्षणस्वातन्र्त्ये विश्राम्यति, इति तत्रैव निर्भासिते समास्कन्दितपुरुषपरमार्थोऽपि, एवं बहिरनेकता, अन्तस्तु परस्पररूपश्लेषेणैक्यम्, इति सम्बन्धस्य रूपम् ॥ ४ ॥ जातिद्रव्यावभासानां बहिरप्येकरूपताम् । व्यक्त्येकदेशभेदं चाप्यालम्वन्ते विकल्पनाः ॥ ५ ॥ जात्यवभासस्य—अवभासमानरूपायाः जातेः ग्राहिकायाः कल्पनाः, ता न केवलं सम्बन्ध- वत् अन्तर् एकरूपतां बहिश्च अनेकरूपताम् आलम्बन्ते, यावत् बहिरपि व्यक्तिभेदलक्षणम् अनैक्यं बहिरेव च तदनुस्यूततारूपाम् एकताम् आलम्बनत्वं नयन्ति, 'गाव' इति हि प्रतिभासे पृथक् च ता बहिर् व्यक्तयो भान्ति, येन च बहुवचनम्, अनुयायि च आसां भाति वपुः यत एकप्रातिपदि- कार्थपरामर्शानुगमः, उभयं च तद्बहिरेव 'इमा' इति अङ्गुल्या निर्देशात्, केवलं बाह्यत्वमपि स्थिते परमार्थप्रकाशान्तर्भावि, इति न तत्र भेदाभेदौ दूषणं—चित्रसंवेदन इव, अनेन द्रव्येऽपि रक्तरक्तादिविरोधः कृतप्रतिविधानः, आन्तरं तु ऐक्यं सम्बन्धद्वारेण तद्वदेव सर्वत्र, एवम् अवभास- मानस्य घट इति अवयविद्रव्य ग्राहिका याः कल्पनाः ता न केवलं सम्बन्धवत् अन्तर्बहोरूपतया हो जाता है और यही दोनों का एकरूप में श्लेष होना कहा जाता है जो कि चिदात्मा में दोनों की स्थिति हो जाती है पूर्व से प्राप्त प्रतिष्ठित ज्ञान में अच्छी तरह डूब जाने के कारण, भिन्नरूप में न आभासित होने से परम स्वातन्त्र्य में विश्रान्त हो जाता है और उसी में पुरुष के साथ निर्भासित होकर एकरूप में रहता है एवं बाहर में तो अनेकरूपों में भासता है, आन्तर की तो परस्पर सम्बन्धरूपता होने से ऐक्य अवस्था में रहता है, यही सम्बन्ध का स्वरूप है ॥ ४ ॥ जाति और द्रव्य के अवभासों की बाहर में भी एकरूपता रहती है और व्यक्ति के एक देश भेद से तरह-तरह के विकल्प भेद भी रहते हैं ॥ ५ ॥ जाति का अवभास वस्तु है और अवभासमान होते हुए जाति की ग्रहण करने को कल्पना होती है, वे कल्पनाएँ केवल सम्बन्ध के जैसे भीतर एकरूपता से और बाहर में अनेकरूपता से आलम्बन करती हैं, किन्तु बाहर में भी व्यक्ति के भेदरूप होकर ऐक्यरूप में नहीं रहती और बाहर में भी उससे अनुस्यूत होकर एकता का आलम्बन ले आती हैं गावः अर्थात् ये गायें हैं इस प्रकार भिन्नरूप से भासित होने पर बाहर में व्यक्तियों के रूपों में भासती हैं और जिससे बहुवचन का प्रयोग हुआ है और इन्हीं के पीछे इनका एक शरीर भी भासता है जो कि प्रातिपदिकार्थ का परामर्श करनेवाला होता है और ये दोनों बाहर की ही वस्तुएँ हैं जिनको अङ्गुलिनिर्देश कर कहा जाता है कि यह ऐसा ही है, बाह्यत्व भी मात्र परमार्थ प्रकाश के अन्तर्भूत बना रहता है, इस प्रकार उसमें भेद-अभेद का बना रहना चित्र ज्ञान के समान दोष युक्त नहीं होता, इसी प्रकार द्रव्य में भी रक्त-अरक्तादि का विरोध ठीक बैठ जाता है, किन्तु भीतर की एकता तो सम्बन्ध के द्वारा उसी प्रकार सर्वत्र बनी हो रहती है, इस प्रकार अवभासमान घट भी अवयवी द्रव्य है उसमें ग्राहिका बुद्धि की कल्पनाएँ होती हैं, वे केवल सम्बन्ध के समान नहीं होती, आन्तर और बाह्यरूप से एक एवं अनेक विषय वाली हैं; क्योंकि