भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 343 में से

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अ.-२, आ.-२, का.-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९३ एकानेकविषया यावत् बहिरप्येकं निःसन्धिबन्धरूपत्वेन भिन्नं च अवयवलक्षणैकदेशद्वारेण स्वीकुर्वते, घट इति हि निःसन्धिबन्धनैकघनात्मा विततरूपश्च भाति इति ॥ ५ ॥ क्रियाविमर्शविषयः कारकाणां समन्वयः । अवध्यवधिमद्भावान्वयालम्बा दिगादिधीः ॥ ६ ॥ कारकाणां कर्त्रादिशक्त्याधाराणां द्रव्याणां च योऽन्योन्यं समन्वयो दृश्यते, यथा मातृ- मेयमानानां मिथः, सोऽन्तर्लीनप्रमात्मकक्रियाविशेषपरामर्शकनिमित्तकः, नहि प्रमापरामर्शम् अन्तर्वर्तिनं विहाय वस्तुनः साक्षात् अन्वयोऽत्र संवेद्यते, अनन्यत्र भावरूपतानिमित्तता अत्र विषयार्थः, कारकणक्तीनामपि यः स्वाश्रयैः संबन्धः सोऽपि क्रियापरामर्शनिमित्तकः, द्रव्याणां च शक्तीनां च क्रियया साकं साक्षात् संबन्धः, इति इयं क्रियैव भगवती एतावद्विजृम्भितं संबन्धम् आविर्भावयति अस्मादिदं पूर्वं परं दूरे इत्येवं बहिर्भिन्नतया परामृश्यमानयोः भावयोरन्तर् अभेदपूर्वकं भेदावमर्शमध्यम् अभेदविश्रान्तं च यत् रूपम् आमृश्यते तत् दिग् इत्युच्यते, अत्र हि तयोः मुखाद्यवयवविशेषपरामर्शदरः तत्संमुखत्वपराङ्मुखत्वादि निश्चयः संयोगसंयुक्तसंयोगाल्प- तादिपरिग्रहश्च उपयोगी, कालपरामर्शस्य पूर्वपरादिरूपत्वे जन्मस्थित्यल्पतादिविमर्शाश्चिर- क्षिप्रदिरूपत्वे च, पक्ष्यति पचति अपाक्षीत् इत्यादौ तु संभावितस्य स्फुटस्य स्फुटभूतपूर्वस्य बाहर में भी ऐक्यरूप से और भिन्न-भिन्न अवयवों के रूपों में एक देश द्वार से जब स्वीकार करेंगे तब घटरूपी बुद्धि होगी। वही ऐक्यरूप और विस्तृत एकत्व की दृढता से भासती है ॥ ५ ॥ जो क्रिया के विमर्श का विषय है वही कारकों का समन्वय है । अवधि और अवधिमान् के भाव का अवलम्बन करनेवाली दिशादि की बुद्धि होती है ॥ ६ ॥ कारकों का और कर्तादि शक्ति के आधारभूत द्रव्यों का परस्पर समन्वय देखा जाता है, जैसे प्रमाता, प्रमेय, प्रमाणों का परस्पर समन्वय होता है, वह भीतर में रहनेवाले प्रमाणरूप क्रिया- विशेषण का एक परामर्श निमित्तक है, प्रमापरामर्श जो अन्तर्वर्ती है उसे छोड़कर साक्षात् वस्तु का अन्वय इसमें नहीं ज्ञात होता है अर्थात् अन्तर्वर्ती वस्तु का ही साक्षात् अन्वय होता है, यहाँ पर भावरूपता एवं अनिमित्तता ही क्रियाविमर्श विषयार्थ माना जाता है, कारक शक्तियों का भी जो अपने आश्रयों से सम्बन्ध है, वह भी क्रिया परामर्श के निमित्त से होता है और द्रव्यों के तथा शक्तियों का क्रिया के साथ साक्षात् सम्बन्ध होता है, इस प्रकार यह भगवती क्रिया का ही सारा का सारा विस्तार है । वह आविर्भूत करती है कि—इससे यह पूर्व है तथा पश्चिम है एवं दूर-समीपवर्त्ती है । बाहर में भिन्नरूप से परामर्श होनेवाले दो भाव-पदार्थों का भीतर अभेदपूर्वक भेद अवमर्श के बीच में और अभेद विश्रान्तरूप का जो आमर्शन करता है उसे दिशा कहा जाता है; क्योंकि इसमें इन दोनों भाव-पदार्थों के मुखादि अवयवविशेष परामर्श का आदर तथा उसके सन्मुखत्व या पराङ्मुखत्वादि का निश्चय और संयोग संयुक्त के संयोग की अल्पता का परिग्रहज्ञान उपयोगी होता है । कालपरामर्श का भी पूर्वोत्तरादिरूप से उत्पत्ति और स्थिति की अल्पता का विचार चिरकाल और शीघ्रकाल के रूप में होता है, पकायेगा, पकाता है और पका दिया इत्यादि में तो संभावित स्पष्टता का और उस स्पष्टता से पहले होनेवाले अपना २५

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