भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

१९४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-७ आत्मीयसंवेदनस्पन्दितप्राणादित्वादिक्रियान्तरस्य फलविशेषस्य च ओदनादेः परामर्श उपयुज्यते, एवं संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागप्रभृतिषु संबन्धरूपतैव वाच्या, सर्वथा अयं संक्षेपः, यत्र पदार्थाभासस्य आत्मविश्रान्त्या सन्तोषमपुष्यतः आभासान्तरपरामर्शविश्रान्तिसाकाङ्क्षतया स्वरूपनिष्ठा तत्र संबन्धरूपतैव क्रियाशक्तिविजृम्भामयी, तत्रापि भावान्तरापेक्षया संबन्धान्तरमपि अस्तु, यथा संख्यादौ समवायं मन्यन्ते, न च अनवस्था भवन्ती अपि दोषाय, पूर्वापरकल्पसृष्ट्य- नवस्थेव, नहि उत्तरसंबन्धसृष्ट्या विना पूर्वसंबन्धावभासे हानिः काचित् येन मूले क्षतिः शंक्येत ॥ ६ ॥ एवं सकललोकयात्रानुप्राणितकल्पानल्पसंबन्धबन्धुरीभावभावं क्रियाशक्तिविजृम्भात्मकम् अभिधाय, तस्य स्थैर्योपयोगो पूर्वसूचितो निरूपयितुमाह— एवमेवार्थसिद्धिः स्यान्मातुरर्थक्रियार्थिनः । भेदाभेदवतार्थेन तेन न भ्रान्तिरीदृशी ॥ ७ ॥ इह भावानां न सत्तासंबन्धः, सत्त्वम्—अव्यापकत्वात् अनवस्थावैयर्थ्यादिदोषात्, आत्मीय संवेदन ज्ञान, स्पन्दन, प्राण इत्यादि से भिन्न-भिन्न क्रियाओं के फलविशेष ओदनादि हैं, उन सब का परामर्श उपयुक्त ही होता है । इस प्रकार संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभागादि गुणों में सम्बन्ध रूपता ही कहनी चाहिए, यही संक्षेप में इसका सार है। यहाँ पर पदार्थ आभास की अपने स्वरूप में विश्रान्ति हो जाने से भली भाँति सन्तोष का अनुभव न मिलने के कारण दूसरे आभास के परामर्श को जो विश्रान्ति है उसकी आकांक्षा से अपने स्वरूप में रहता ही उसमें सम्बन्ध रूपता मानी जाती है और वही क्रिया-शक्ति का विलास भी है, उसमें भी दूसरे आभास की अपेक्षा से दूसरा सम्बन्ध भी भले ही प्रतीत हो, जैसे संख्यादि में समवाय सम्बन्ध मानते हैं, इस प्रकार अनवस्था का दोष आ भी जाय तो भी कोई दोष नहीं माना जाता, जैसे पूर्वोत्तरकल्प की सृष्टि में अनवस्था आ जाती है, उत्तर सम्बन्ध की सृष्टि के बिना पूर्व सम्बन्ध के अवभास में कोई हानि नहीं होती, जिससे कि मूल में क्षति की शंका खड़ी हो ॥ ६ ॥ इस समस्त लोक व्यवहार से अनुप्राणित प्रायः अनन्तर सम्बन्ध का मिश्रणरूप क्रिया- शक्ति के विचार को कह कर, उसकी स्थिरता एवं उपयोगिता को भी हम पहले कह चुके हैं । पुनः उसका निरूपण करने के लिए कहते हैं— पदार्थक्रिया के अर्थी प्रमाता की ऐसी अर्थसिद्धि होती है । इसी कारण भेद और अभेदवाले अर्थ के साथ ऐसी भ्रान्ति नहीं खड़ी होती ॥ ७ ॥ यहाँ पर पदार्थ-भावों की सत्ता का सम्बन्ध नहीं बैठता है; क्योंकि अव्यापक होने से तथा अनवस्था और व्यर्थता इत्यादि दोषों से सत्ता भी नहीं होती और उससे कोई कार्यत्व की सिद्धि भी नहीं दिखती; क्योंकि उसमें उसका मिश्रण नहीं देखते [ अव्याप्यवृत्ति का नाम सम्बन्ध है और पदार्थों का सत्ता सम्बन्ध है । वह व्यापक नहीं होता, इसीलिए सत्ता के सम्बन्ध से पूर्व पदार्थ रहते हुए भी न रहने के ही बराबर होते हैं ? यदि वे नहीं होते हैं तो न रहने के कारण शशशृङ्ग के सदृश ही है और उसका न रहना ही अव्यापक-भाव कहलाता है, यदि वे रहते हैं ऐसा मानते हो, तब तो अनवस्थादि दोषों से ग्रस्त हो जायेंगे ]