ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-२, का.-७] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९५ न अर्थक्रिया—वस्त्वन्तरत्वात्, न तत्कारित्वं—सर्वदा तदावेशादर्शनात्, उक्तं हि—'अर्थ- क्रियापि सहजा नार्थानाम्·····॥' इति, तत्कारित्वस्य च प्रत्यक्षानुपलम्भात्मकान्वयव्यतिरेकगम्यस्य अप्रत्यक्षत्वे सतोऽपि अप्रत्यक्षत्वप्राप्तेः न अर्थक्रियाकरणयोग्यत्वम्—तस्य सत्यासत्यके निश्चयकाले दुरवधानत्वात्, सर्वस्य च अस्य अप्रकाशमानत्वे नरशृङ्गप्रायत्वम्, अर्थक्रियाकारितान्तरपर्येषणे च अनवस्था, इति प्रकाशमानतैव अनुन्मूल्यमानतयोचित-विमर्शपरिस्यन्दा भावस्य सत्त्वम्, सा च भेदाभेदवपुषां सम्बन्धादीनामस्ति, इति—निराशङ्कमेव सत्यत्वमेव तेषाम्, अथापि यदि परोऽनुबन्धीयात्—इह लोकः प्राचुर्येण अर्थक्रियार्थी तत्कारिणि सत्यत्वं व्यवहरति तत् किं सम्बन्धादीनाम् अस्ति इति, तदस्य हृदयम् आश्वास्यते, यदि न कुप्यसि तत् सर्वत्रैव व्यवहारे यत्रापि स्फुटा सम्बन्धादिधीः न उदेति एवमेव तत्रापि, इति सम्बन्धादिरूपतया भेदाभेदवान् योऽर्थः तेनैव अर्थक्रिया, न तु स्वात्ममात्रविश्रान्तेन काचिदपि कदाचिदपि अर्थक्रिया, तथाहि—सुखेन स्मर्यमाणेन अभिलाषः, इत्यादिक्रमेण सर्वो व्यवहारः सुखाभासश्च योऽनुभूतः स एव अभिलष्यते न तु अन्योऽननुभूतः, स एव च यदि प्राप्यते तदभिलषितं प्राप्तम् इति तुष्यते यदि च तत् तदेव र्तार्ह किम् अभिलष्यते—प्राप्तत्वात्, अथ अतदेव, तथापि कथम् अर्थ्यते—अज्ञातत्वात्, तस्मात् एतत् एवं भवति—यदि तदेव च अतदेव च तदपि च अतदपि च इति, एवं सुखसाधनेषु इसलिए कहा भी गया है—'अर्थक्रिया भी पदार्थों के साथ नहीं उत्पन्न होती है' और इसी कारण उसका कार्यत्व प्रत्यक्षरूप से उपलब्ध नहीं होता है किन्तु अन्वय-व्यतिरेक से ज्ञात होनेवाले पदार्थ के प्रत्यक्ष न होने पर रहते हुए भी उसका अभाव हो जाता है और वह अर्थ- क्रिया करने के योग्य नहीं रहता; सत्यता और असत्यता के निश्चयकाल में ध्यान न देने के कारण इन सबों का अप्रकाश हो रहता है। मनुष्य के शृङ्ग के समान और दूसरी अर्थक्रिया के अन्वेषण में अनवस्था हो जाती है, इसलिए प्रकाशमान रहना एवं उन्मूलित न हो जाना तथा समुचित विमर्श होते रहना ही पदार्थ को सत्ता मानो जाती है और वह प्रकाशमानता भेद एवं अभेद शरीरवाले सम्बन्धादिकों की होती है, इस प्रकार उनकी सत्यता निश्चितरूप से हो रहती है अर्थात् बिना शङ्का की ही सत्यता उनमें रहतो है, फिर भी यदि कोई दूसरा आग्रह करे और दोष दिखाये—यहाँ पर अधिकतया लोग पदार्थक्रिया के ही अर्थी होते हैं और उस क्रिया के कर्त्ता में सत्यता का व्यवहार करते हैं तब क्या वह अर्थक्रियाकारित्व सम्बन्धादिकों में रहता है ? इसलिए दूसरों के हृदय में विश्वास होता है, यदि क्रोध नहीं करते हो तो सब जगह व्यवहार में जहाँ पर भी सम्बन्ध बुद्धि स्फुटरूप से रहती है वहाँ पर भेद एवं अभेदमय सम्बन्ध के बिना कोई भी अर्थक्रिया व्यवहारभूमि में नहीं हो सकती, इस प्रकार सम्बन्धादिरूप से भेद और अभेदवाले जो पदार्थ हैं उसी से अर्थक्रिया होती है अपने में ही रहनेवाले पदार्थ की तो कोई भो—कभी भी अर्थक्रिया नहीं होती । देखो—सुखपूर्वक स्मरण करने से अभिलाषा होती है इत्यादि क्रम से समस्त व्यवहार और सुखाभास जो अनुभव में आता है उसी की अभिलाषा की जाती है किसी अन्य की नहीं, चाहे वह अनुभूत भी क्यों न हो ? और वह यदि मिल जाता है तब अभिलषित प्राप्त हुआ ऐसा समझ करके सन्तुष्ट हो जाता है, यदि वह वही है, तब फिर क्या अभिलाषा होगी ? क्योंकि वह तो रहता ही है, यदि वह नहीं है, तो उसकी चाह क्यों करेंगे ? क्योंकि वह तो अज्ञात है, इसलिए यह ऐसा होता है—यदि वही है और वह नहीं है और वही