ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 219, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ें१९६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२ वाच्यम् तदुक्तम् आचार्येण 'इष्टार्थितायामिष्टं वा विमृश्येतेष्टकारि वा । न चाप्यदृष्टमिष्टं द्यौरपोष्टा दृष्टभोगभूः ॥ दृष्टं च सह दृष्टचैव विनष्टमिति कार्थता । द्रष्ट्रैकेन विमृष्टं तत्.........॥' इत्यादि, एवं च आभासात्मनि अस्मिन् असंवैद्यमपि आभासान्तरं सामान्यसम्बन्धरूपतया अनुप्रविष्टम्, अन्यथा न कथंचिद्व्यवहारः इति सकलदेशकालदशापुरुषोपयोगी यदि एषः व्यवहारो न सत्यः तर्हि न अन्यस्य सत्यत्वं विद्मः —इति न अत्र भ्रान्तिः इति भ्रमितव्यम् । इति शिवम् ॥ ७ ॥ आदितः ॥ १०४ ॥ इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवपादविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभिनवगुप्त- पादकृतविमर्शिन्याख्यटीकोपेतायां क्रियाधिकारे भेदाभेदविमर्शनं नाम द्वितीयमाह्निकम् ॥ २ ॥ अथ द्वितीये क्रियाधिकारे मानतत्फलमेयनिरूपणाख्यं तृतीयमाह्निकम् प्रमाणानि प्रमावेशे स्वबलाक्रमणक्रमात् । यस्य वक्रावलोकीनि प्रमेये तं स्तुमः शिवम् ॥ १ ॥ है और नहीं भी है इत्यादि भाव बनते हैं, ऐसा सुख के साधनों में भी करना होगा। इसलिए आचार्य ने इसका प्रतिपादन भी किया है— अभीष्ट पदार्थ को चाह में इष्ट का विचार करें अथवा इष्टकारी जो सुख साधन है उसका विचार करें और इसमें अदृष्टरूप जो स्वर्गादि है उसकी इच्छा नहीं होती है, दृष्ट तो दृष्टमात्र से ओझल हो जाता है इसी कारण उसकी चाह क्यों होगी ? इसलिए एक द्रष्टा से ही वह विमृष्ट हुआ करता है..। इत्यादि कहा है । इस प्रकार आभासरूप इस भाव-समूह में सूक्ष्मता के कारण ठीक-ठीक उसका ज्ञान न होने से दूसरा आभास भी सामान्य सम्बन्धरूप से उसमें प्रविष्ट रहता है, अन्यथा किसी प्रकार भी व्यवहार नहीं हो पायेगा । इस प्रकार सकल देश, काल, दशा पुरुष के उपयोगी यह व्यवहार सत्य नहीं है तो फिर अन्य को सत्यता को हम नहीं जानते हैं—इस प्रकार इसमें कोई भ्रान्ति नहीं उठती है और न भ्रम में पड़ना ही चाहिए ॥ ७ ॥ द्वितीय आह्निक समाप्त जिस शिव के मुखावलोकन करके सभी प्रमाण प्रमा की प्राप्ति के लिए प्रमेय में अपने बल के आक्रमण क्रम से प्रवृत्त होते हैं, उस शिव को हम स्तुति करते हैं ॥ १ ॥ १. उस महेश्वर का यह स्वरूप स्वतः ही सिद्ध है। 'आदि सिद्धः कर्ता ज्ञाता चैक एव महेश्वरः । ऐसा जो महेश्वर के विषय में बताया गया है कि एक महेश्वर ही कर्ता और ज्ञाता है । प्रमाणसिद्धं यत्किञ्चित्सत्सत्यमिति कथ्यते । प्रमाणाविषयं यत्तु तत्खपुष्पेण संमतम् ॥ जो कुछ प्रमाण के द्वारा सिद्ध होता है वह सत्य कहलाता है और जो प्रमाणभूत नहीं है अर्थात् प्रमाण का अविषय है वह तो आकाश कुसुम के समान है। इत्यादि युक्ति की संभावना करके अन्य लोग कहते